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शनिवार

अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान एवं पद्मानंद साहित्य सम्मान 2011 पर ज़ारी स्मारिका।


लेखक आत्मा के कॊफी हाउस का परिचारक ही होता है - विकास कुमार झा 

इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट के मुख्य न्यासी तेजेन्द्र शर्मा के लंदन में आप्रवासी भारतीय के रूप में बस जाने के बाद कथा यू के के बैनर तले यह संस्था कार्य करने लगी। कथा यू के यूनाइटेड में बसे दक्षिण एशियाई मूल के लेखकों के समूदाय की संस्था है और भारत के मुंबई शहर से जुड़ी साहित्यिक, सामाजिक संस्था इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट इसकी मूल इकाई है। नई शताब्दी यानि 2000 से इंदु शर्मा कथा सम्मान को अंतराष्ट्रीय स्वरूप दिया गया साथ ही उम्र सीमा हटा दी गई तथा उपन्यास विधा को भी सम्मान हेतु शामिल किया गया। भारत से आनेवाले सम्मानित लेखक को भारत-लंदन/लंदन-भारत का हवाई जहाज का टिकट, लंदन में एक सप्ताह रहने व आसपास के दर्शनीय स्थानों का भ्रमण करवाया जाता है। अब तक यह अंतराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान चित्रा मुद्गल, संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, विभूतिनारायण राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असगर वजाहत, महुआ माजी, नासिरा शर्मा, भगवानदास मोरवाल और विकास कुमार झा को प्रदान किया जा चुका है।
    इंग्लैण्ड के हिन्दी साहित्यकारों को सम्मानित करने हेतु पद्मानंद साहित्य सम्मान पाने वालों में डाक्टर सत्येन्द्र श्रीवास्तव, दिव्या माथूर, नरेश भारतीय, भारतेन्दु विमल, अचला शर्मा, उषा राजे सक्सेना, गोविन्द शर्मा, गौतम सचदेव, उषा वर्मा, मोहन दवेसर दीपक, कादम्बरी मेहरा और नीना पाल को प्रदान किया जा चुका है।
    लंदन में आयोजित इस सम्मान समारोह में भारत के उच्चायुक्त श्री नलिन सूरी ने ब्रिटिश संसद के हाउस आफ कामन्स में हिन्दी लेखक विकास कुमार झा को उनके कथा उपन्यास ‘मैकलुस्कीगंज’ के लिए ‘सतरहवां अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान’ तथा लेस्टर निवासी ब्रिटिश हिन्दी लेखिका श्रीमती नीना पॊल को बारहवां पद्मानंद साहित्य सम्मान प्रदान करते हुए कहा कि ‘ हिन्दी अब आहिस्ता-आहिस्ता विश्व भाषा का रूप ग्रहण कर रही है। बाजार को इस बात की खबर लग चुकी है कि यदि भारत में पांव जमाने हैं तो हिन्दी का ज्ञान जरूरी है।
विकास कुमार झा ने कहा कि ‘एक कवि या लेखक आत्मा के कॊफी हाउस  का परिचारक ही होता है। आत्मा के अदृश्य कॊफी हाउस का मैं एक अनुशासित वेटर (परिचारक) हूँ और अगला आदेश लेने के लिए प्रतीक्षा में हूँ।’ अपने उपन्यास पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा- ‘मैकलुस्कीगंज’ मेरे लिए जागी आंखों का सपना है।’ .....
यह महज संयोग ही है कि जिस वक्त इस स्मारिका का पैकेट विकास दा को मिला, मैं उनके साथ आवास पर था और उनके हाथों से इस स्मारिका को पाने वाला मैं (अरविन्द श्रीवास्तव) पहला व्यक्ति बना !! विकास कुमार झा को पुनः बधाई, अशेष शुभकामनाएं। 



सोमवार

‘अघोषित युद्ध की भूमिका’ से अजित कुमार आजाद की दो कविताएँ

 मैथिली कविता में नव्यतम पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले अजित कुमार आजाद  की कविताओं का बहुरंगी फलक समकालीन काव्य परिदृश्य में नवीनता का अहसास कराती है। इनकी कविताएँ समय से सीधा-सीधा संवाद और मुठभेड़ करती है। मैथिली कविता संग्रह ‘युद्धक विराधमे बुद्धक प्रतिहिंसा’ का हिन्दी अनुवाद ‘अघोषित युद्ध की भूमिका’ इनकी महत्वपूर्ण कृति आयी है। अजित की दो कविताएँ मित्रों के लिए:
पृथ्वी की कोख में सुरक्षित है भ्रूण 

सुरक्षित है पृथ्वी की कोख में भ्रूण
जन्म देने के लिए जगह
सुरक्षित है अभी भी
कास की फुनगी पर आस की हरियाली
सूर्य के चारों ओर नाचती है पृथ्वी
पृथ्वी के चारों ओर प्रक्षेपास्त्र
मनुष्य ने किया प्रत्यारोपित
पृथ्वी की कोख में बारूद
बावजूद इसके
सुरक्षित है नींद में सोये बच्चे का भविष्य
और स्वप्न देखने का उसका अधिकार

धरती का ताप बढ़ता जा रहा
अबाह-घबाह पैरों से नापता है इतिहास
जबकि लिप्त हैं लोग
भ्रूण हत्या के आदिम षड्यंत्र में
अपनी सम्पूर्ण आस्था के साथ रखा है सुरक्षित
नवसृष्टि का भ्रूण पृथ्वी ने अपनी कोख में...

अखबार में प्रेम

एक सनसनीखेज समाचार की
सभी शर्तें पूरा करने के बावजूद
प्रथम पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक
भटकता रह जाता है प्रेम

महानगर के पृष्ठ पर
कभी-कभी झाँकने वाला प्रेम
अंचल के पृष्ठों पर घिसटते हुए
बलात्कार के खबर में बदलकर
अर्थ-व्यापार के पन्ने में गायब हो जाता है

खेल पृष्ठ पर खिलवाड़-सा लगता है प्रेम
एक विज्ञापनी मुद्रा से बढ़कर
और कुछ भी नहीं
अखबार को बाजार दिलाती है प्रेम
लेकिन प्रेम को थोड़ी भी जगह
नहीं देता अखबार

प्रेम यदि आ भी जाए
समाचार डेस्क तक
तो संपादक से
बिना बलत्कृत हुए नहीं छपता है
आश्चर्य कि
अखबार भी तभी बिकता है...!
संपर्कः 21, एम.आई.जी., हनुमान नगर, पटना-20
मोबाइल- 09234942661.

मंगलवार

वन्दना राग को पहला कृष्ण प्रताप कथा सम्मान / केदार सम्मान वर्ष 2011 हेतु प्रविष्टियां आमंत्रित


       समकालीन हिन्दी  कहानी के चर्चित कथाकार कृष्ण प्रताप की स्मृति में वर्ष 2010 का  कृष्ण प्रताप कथा सम्मान  युवा एवं चर्चित कहानी कार वन्दना राग को पहला कृष्ण प्रताप  कथा सम्मान उनके वर्ष 2010 में प्रकाशित  प्रथम कहानी संग्रह यूटोपिया को प्रदान किया जाता है । यह निर्णय श्री विभूति नारायण राय, ममता कालिया एवं श्री दिनेश कुमार शुक्ल निर्णायक समिति के सदस्यों के व्दारा लिया गया । यह कथा सम्मान आगामी  अक्टूबर माह में  प्रदान किया जायेगा जिसमें कथाकार को 11000/- ग्यारह हजार की धनराशि ,प्रशस्ति पत्र ,पदक एवं शाल आदि भेंट किये जायेंगे । निर्णय की प्रशस्ति में कहा गया है कि युटोपिया की कहानियों  में कहानी के स्थापित ढ़ाचों  को तोड़ कर  कहानी कार  ने अपनी  कहानियों के लिए रचना की नई जमीन तैयार की है । बन्दना की कहानियों की संवेदना दृष्टि अति सूक्ष्म होने के साथ - साथ दृष्टि प्रदान करती है । जो भीतर तक जाकर टोहती है। इन कहांनियों में बन्दनाराग कुशल किस्सागो नजर आती हैं।

मकालीन हिन्दी  कविता का महत्वपूर्ण  सम्मान केदार सम्मान, वर्ष 2011 हेतु प्रकाशकों, कविता के शुभचिन्तकों  एवं कवियों  से प्रवृष्टियां आमंत्रित की जाती हैं ।  वर्ष 2006 से 2011 के मध्य प्रकाशित  कविता संकलन दो प्रतियों में आमत्रित किये जाते हैं । इस महत्वपूर्ण सम्मान में आजादी के बाद जन्में  रचना कार ही शामिल हो सकतें हैं । इसमें वहीं प्रवृष्टियां स्वीकार होगी जिनकी रचनाधर्मिता केदारनाथ अग्रवाल की  परम्परा में  वैज्ञानिक चेतना के हिमायती  हो । प्रविष्टियां  30 नवम्बर 2011 तक शामिल की जायेंगी । 
संयोजक:
नरेन्द्र पुण्डरीक
कृष्ण प्रताप कथा सम्मान / केदार सम्मान 
डी0 एम0 कालोनी ,सिविल लाइन
बांदा - 210001 उ0 प्र0,  मो0 9450169568


     

शुक्रवार

विश्व प्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन की यादों को समर्पित कविता-संग्रह (पुस्तक) हेतु कविताएँ सादर आमंत्रित:

तूलिका के धनी मकबूल फिदा हुसैन मानवीय रचनात्मकता, परंपरा तथा आधुनिकता के सेतु थे। हुसैन ने बौद्ध काल के बाद से छूटी हुई कला की कडिय़ों को जोडऩे का प्रयास किया था। रामायण मेलों के लिए हजारों चित्र बनाये थे। हुसैन सर्वधर्म समभाव और गंगा जमुनियत के प्रतीक थे। कवि मुक्तिबोध की यात्रा से लौटकर उन्होंने चप्पलें पहनना छोड़ दिया और अंत तक इस प्रतिज्ञा को निभाया...

    विश्व प्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन की यादों को समर्पित कविता-संग्रह (पुस्तक) हेतु  कविताएँ सादर आमंत्रित:-
    
        अपनी दो कविताएँ इस संग्रह में प्रकाशनार्थ भेज सकते हैं।
                 अन्तिम तिथि - 15 जुलाई 2011.
         पताः  राजेन्द्र शर्मा, जेड-320, सेक्टर-12, नोएडा (उ.प्र.)
                    मोबाइल- 09891062000.
             e.mail- pratibimb22@gmail.com

बुधवार

न्यू मीडिया कंपोजिट मीडिया है: देवेन्द्र कुमार देवेश


 देवेन्द्र कुमार देवेश, उप संपादक











साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली.


नुष्यमात्र की भाषायी अथवा कलात्मक अभिव्यक्ति को एक से अधिक व्यक्तियों तथा स्थानों तक पहुँचाने की व्यवस्था को ही मीडिया का नाम दिया गया है। पिछली कई सदियों से प्रिंट मीडिया इस संदर्भ में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही है, जहाँ हमारी लिखित अभिव्यक्ति पहले तो पाठ्य रूप में प्रसारित होती रही तथा बाद में छायाचित्रों का समावेश संभव होने पर दृश्य अभिव्यक्ति भी प्रिंट मीडिया के द्वारा संभव हो सकी। यह मीडिया बहुरंगी कलेवर में और भी प्रभावी हुई। बाद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी साथ-साथ अपनी जगह बनाई, जहाँ पहले तो श्रव्य अभिव्यक्ति को रेडियो के माध्यम से प्रसारित करना संभव हुआ तथा बाद में टेलीविजन के माध्यम से श्रव्य-दृश्य दोनों ही अभिव्यक्तियों का प्रसारण संभव हो सका। प्रिंट मीडिया की अपेक्षा यहाँ की दृश्य अभिव्यक्ति अधिक प्रभावी हुई, क्योंकि यहाँ चलायमान दृश्य अभिव्यक्ति भी संभव हुई। बीसवीं सदी में कंप्यूटर के विकास के साथ-साथ एक नए माध्यम ने जन्म लिया, जो डिजिटल है। प्रारंभ में डाटा के सुविधाजनक आदान-प्रदान के लिए शुरू की गई कंप्यूटर आधारित सीमित इंटरनेट सेवा ने आज विश्वव्यापी रूप अख्तियार कर लिया है। इंटरनेट के प्रचार-प्रसार और निरंतर तकनीकी विकास ने एक ऐसी वेब मीडिया को जन्म दिया, जहाँ अभिव्यक्ति के पाठ्य, दृश्य, श्रव्य एवं दृश्य-श्रव्य सभी रूपों का एक साथ क्षणमात्र में प्रसारण संभव हुआ।
जी हाँ, यह वेब मीडिया ही न्यू मीडियाहै, जो एक कंपोजिट मीडिया है, जहाँ संपूर्ण और तत्काल अभिव्यक्ति संभव है, जहाँ एक शीर्षक अथवा विषय पर उपलब्ध सभी अभिव्यक्यिों की एक साथ जानकारी प्राप्त करना संभव है, जहाँ किसी अभिव्यक्ति पर तत्काल प्रतिक्रिया देना ही संभव नहीं, बल्कि उस अभिव्यक्ति को उस पर प्राप्त सभी प्रतिक्रियाओं के साथ एक जगह साथ-साथ देख पाना भी संभव है। इतना ही नहीं, यह मीडिया लोकतंत्र में नागरिकों के वोट के अधिकार के समान ही हरेक व्यक्ति की भागीदारी के लिए हर क्षण उपलब्ध और खुली हुई है।वेब मीडियापर अपनी अभिव्यक्ति के प्रकाशन-प्रसारण के अनेक रूप हैं। कोई अपनी स्वतंत्र वेबसाइटनिर्मित कर वेब मीडिया पर अपना एक निश्चित पता आौर स्थान निर्धारित कर अपनी अभिव्यक्तियों को प्रकाशित-प्रसारित कर सकता है। अन्यथा बहुत-सी ऐसी वेबसाइटें उपलब्ध हैं, जहाँ कोई भी अपने लिए पता और स्थान आरक्षित कर सकता है। अपने निर्धारित पते के माध्यम से कोई भी इन वेबसाइटों पर अपने लिए उपलब्ध स्थान का उपयोग करते हुए अपनी सूचनात्मक, रचनात्मक, कलात्मक अभिव्यक्ति के पाठ्य अथवा ऑडिया/वीडियो डिजिटल रूप को अपलोड कर सकता है, जो तत्क्षण दुनिया में कहीं भी देखे-सुने जाने के लिए उपलब्ध हो जाती है।
बहुत-सी वेबसाइटें संवाद के लिए समूह-निर्माण की सुविधा देती हैं, जहाँ समान विचारों अथवा उद्देश्यों वाले लोग एक-दूसरे से जुड़कर संवाद कायम कर सकें। वेबग्रुपकी इस अवधारणा से कई कदम आगे बढ़कर फेसबुक और ट्विटर जैसी ऐसी वेबसाइटें भी मौजूद हैं, जो प्रायः पूरी तरह समूह-संवाद केन्द्रित हैं। इनसे जुड़कर कोई भी अपनी मित्रता का दायरा दुनिया के किसी भी कोने तक बढ़ा सकता है और मित्रों के बीच जीवंत, विचारोत्तेजक, जरूरी विचार-विमर्श को अंजाम दे सकता है। इसे सोशल नेटवर्किंग का नाम दिया गया है।वेब मीडियासे जो एक अन्य सर्वाधिक लोकप्रिय उपक्रम जुड़ा है, वह है ब्लॉगिंगका। कई वेबसाइटें ऐसी हैं, जहाँ कोई भी अपना पता और स्थान आरक्षित कर अपनी रुचि और अभिव्यक्ति के अनुरूप अपनी एक मिनी वेबसाइट का निर्माण बिना किसी शुल्क के कर सकता है। प्रारंभ में वेब लॉगके नाम से जाना जानेवाला यह उपक्रम अब ब्लॉगके नाम से सुपरिचित है। अभिव्यक्ति के अनुसार ही ब्लॉग पाठ्य ब्लॉग, फोटो ब्लॉग, वीडियो ब्लॉग (वोडकास्ट), म्यूजिक ब्लॉग, रेडियो ब्लॉग (पोटकास्ट), कार्टून ब्लॉग आदि किसी भी तरह के हो सकते हैं। यहाँ आप नियमित रूप से उपस्थित होकर अपनी अभिव्यक्ति अपलोड कर सकते हैं और उस पर प्राप्त प्रतिक्रियाओं को इटरैक्ट कर सकते हैं। ब्लॉगनिजी और सामूहिक दोनों तरह के हो सकते हैं। यहाँ अपनी मौलिक अभिव्यक्ति के अलावा दूसरों की अभिव्यक्यिों को भी एक-दूसरे के साथ शेयर करने के लिए रखा जा सकता है।
बहुत से लोग ब्लॉगको एक डायरी के रूप में देखते हैं, जो नियमित रूप से वेब पर लिखी जा रही है, एक ऐसी डायरी, जो लिखे जाने के साथ ही सार्वजनिक भी है, सबके लिए उपलब्ध है, सबकी प्रतिक्रिया के लिए भी। लेकिन मैं समझता हूँ कि ब्लॉगनियमित रूप से लिखी जानेवाली चिट्ठी है, जो हरेक वेबपाठक को संबोधित है, पढ़े जाने के लिए, देखे-सुने जाने के लिए और उचित हो तो समुचित प्रत्युत्तर के लिए भी। ब्लॉगको डायरी कहा जाना बिलकुल उचित नहीं, क्योंकि डायरी हमेशा आत्मावलोकन और आत्मालोचन के लिए लिखी जाती है, जो सर्वथा निजी भी होती है।
और यहीं जब मैं यह कह रहा हूँ कि ब्लॉगडायरी नहीं चिट्ठी है, तभी इसका स्वरूप और दायित्वपूर्ण भूमिका भी निश्चित हो जाते हैं; क्योंकि वेब मीडियापर प्रस्तुत होनेवाली सामग्री पर कोई अंकुश नहीं, यहाँ कोई भी, कुछ भी, कैसा भी अभिव्यक्त करने के लिए स्वतंत्र है; इसलिए मैं कहना चाहूँगा कि न्यू मीडियाका यह स्वरूप और इसकी प्रकृति ही इसके महत्त्व और भूमिका के निर्धारण के लिए हमें अनेक सूत्र देते हैं। मित्रो, समुद्र जितना शांत होता है, उतना ही तूफान की प्रबल आशंका होती है; जो पक्ष जितना सकारात्मक होता है, उसकी नकारात्मकता भी उतनी ही प्रबल होती है; इसलिए वेब मीडियाअपनी उपयोगिता में जितना ज्यादा प्रभावी है, यदि कोई इसका दुरुपयोग करे तो इसका प्रभाव भी उतना ही गहरा होगा। इसलिए इस मीडिया का प्रयोक्ता जो भी व्यक्ति है, उसे ही अपनी सचेत और दायित्वपूर्ण भूमिका निर्धारित करनी होगी और मीडिया के सकारात्मक प्रयोग पर बल देना होगा। दुनिया में वेब मीडियाका प्रथम प्रयोग अमेरिका में 29 अक्तूबर 1989 को अर्पानेटके नाम से हुआ। भारत में इसका आरंभ 1994 में हुआ, जिसे 15 अगस्त 1995 को व्यावसायिक रूप दिया गया। वेबसाइटों पर निःशुल्क रूप में निजी अभिव्यक्ति का आरंभ 1994 में geocities.com एवं tripod.com के द्वारा हुआ। पहला अंग्रेजी ब्लॉग 1997 में शुरू हुआ, जबकि हिन्दी में ब्लॉगिंग की शुरुआत श्री आलोक कुमार द्वारा 2 मार्च 2003 को हुई। वर्तमान में अनुमानतः 15 करोड़ ब्लॉग हैं। भारत में प्रायः सवा करोड़ ब्रॉडबैंड उपभोक्ता हैं, लेकिन हिन्दी ब्लॉगों की संख्या कुछेक हजार ही है, जो अपेक्षाकृत बहुत ही कम है। फिर भी हिन्दी ब्लॉगिंगके भविष्य को लेकर निराश होने की जरूरत नहीं है। इंटरनेट-साक्षरता और उपयोग में निरंतर वृद्धि ही होनी है। मोबाइल के माध्यम से प्राप्त इंटरनेट सुविधाओं ने भी न्यू मीडियामें प्रवेश, प्रयोग और उपयोग को व्यापक बनाया है। हिन्दी के ब्लॉग निजी और सामूहिक तौर पर निरंतर तैयार किए जा रहे हैं। एग्रीगेटर और सोशल नेटवर्किंग के माध्यम से उन्हें लोकप्रिय बनाने के प्रयत्न भी किए जा रहे हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को इस न्यू मीडियाने आकर्षित ही नहीं, वरन प्रभावित भी किया है। अधिकांश हिन्दी ब्लॉगनिजी अभिव्यक्तियाँ हैं, बहुत-सी सामूहिक। इन ब्लॉगों के माध्यम से सूचना, समाचार, साहित्य और कला की तमाम अभिव्यक्तियाँ वेबपाठकों को परोसी जा रही हैं। साहित्य की हर विधा, कला का हर रूप, समाचार-विचार के तमाम विन्दु और सूचनाओं का भंडार इनके माध्यम से हमारे सामने आ रहा है। कुछ ब्लॉग साहित्यिक पत्रिका के रूप में हैं, तो कुछ समाचारपत्रिका के रूप में। यहाँ लेखक एवं प्रस्तोता पाठक/दर्शक/श्रोता सभी अपने सोच-विचारों, वाद-प्रतिवादों के साथ एक साथ-एक जगह समेकित रूप में उपस्थित हैं-एक-दूसरे से संवाद करते हुए, जो संवाद सर्वसुलभ भी हैं।
चूँकि अभिव्यक्ति के संपादन, प्रकाशन और प्रसार के अंकुश से युक्त सीमित मीडिया की अपेक्षा इस न्यू मीडिया ने अभिव्यक्ति के निरंकुश प्रसार की असीमित संभावनाओं की विस्फोटक स्थिति को जन्म दिया है, इसलिए इसका प्रारंभिक तेवर आक्रामक है, अराजक भी। इसे संयमित, संतुलित किए जाने के साथ-साथ इसका नियमन भी जरूरी है। मौलिक अभिव्यक्ति के स्वत्वाधिकार की रक्षा के साथ मर्यादित भाषा के प्रयोग और शुद्ध पाठ की प्रस्तुति के प्रयत्न भी यहाँ निश्चित रूप से किए जाने चाहिए; जिसके लिए दुनिया के तमाम मीडिया-विशेषज्ञ चिंतित हैं। लेकिन फिलहाल अपनी मर्यादा का नियमन न्यू मीडियाके प्रयोक्ताओं को स्वयं ही करना होगा, क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संतुलित और सकारात्मक प्रयोग न्यू मीडियाका सर्वाधिक उज्जवलतम पक्ष है।


सोमवार

'उद्भ्रांत की काव्य-प्रतिभा का विस्फ़ोट रवीन्द्रनाथ जैसा’- नामवर


यी दिल्ली। ‘‘कवि उद्भ्रांत की एक साथ तीन नयी काव्य-कृतियों का लोकार्पण अद्भुत ही नहीं ऐतिहासिक भी है। इतनी कविताओं का लिखना उनकी प्रतिभा का विस्फोट है रवीन्द्र्नाथ मे भी ऎसा ही विस्फॊट हुआ था, साथ ही इनमें रचनाकार की सर्जनात्मक ऊर्जा की भी दाद देनी होगी।’’ ये बातें मूर्द्धन्य आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने उद्भ्रांत की तीन काव्य-कृतियों ‘अस्ति’ (कविता संग्रह), ‘अभिनव पांडव’ (महाकाव्य) एवं ‘राधामाधव’ (प्रबंध काव्य) के लोकार्पण के अवसर पर शुक्रवार दिनांक 17 जून, 2011 को हिन्दी भवन, दिल्ली में आयोजित ‘समय, समाज, मिथक: उद्भ्रांत का कवि-कर्म’ विषयक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कहीं। नामवर जी ने उद्भ्रांत के पूरे रचनात्मक जीवन पर प्रकाश ड़ालते हुए कहा कि उनकी ‘सूअर’ शीर्षक कविता नागार्जुन की मादा सूअर पर लिखी कविता के बाद उसी विषय पर ऐसी कविता लिखने के उनके साहस को प्रदर्शित करती है जिसके लिये वे बधाई पात्र हैं। उनकी सर्जनात्मक ऊर्जा की दाद देनी होगी। हिन्दी भाषा में पांच सौ पृष्ठों के पहले वृहद्काय कविता संग्रह ‘अस्ति’ का लोकार्पण करते हुए उन्होंने कहा कि कवि अपने शब्दों के द्वारा इसी दुनिया में एक समानान्तर दुनिया रचता है, जो विधाता द्वारा रची दुनिया से अलग होकर भी संवेदना से भरपूर होती है। मिथकों को माध्यम बनाकर उन्होंने जो रचनाएं की हैं, वे भी उनकी समकालीन दृष्टि के साथ उनकी बहुमुखी उर्वर प्रतिभा को प्रदर्शित करती हैं। मुख्य वक्ता वरिष्ठ आलोचक डॉ. शिवकुमार मिश्र ने ‘अभिनव पांडव’ (महाकाव्य) का लोर्कापण करते हुए कहा कि इसमें कवि ने महाभारत का एक तरह से पुनर्पाठ आधुनिक संदर्भ में बेहद गंभीरता के साथ किया है। युधिष्ठिर को केन्द्र में रखकर जिस तरह से उनको और उनके माध्यम से महाभारत के दूसरे महत्त्वपूर्ण चरित्रों को वे प्रश्नों के घेरे में लाये हैं, वह अद्भुत है और इससे युधिष्ठिर औरअन्य मिथकीय चरित्रों के दूसरे पहलुओं के बारे में जानने का भी हमें मौक़ा मिलता है। महाकवि प्रसाद की ‘कामायनी’ से तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि वह महाकाव्य नहीं है, लेकिन महत् काव्य ज़रूर है। ‘अभिनव पांडव’ को कवि ने महाकाव्य कहा है और अपनी भूमिका ‘बीजाक्षर’ में इस सम्बंध में बहस की है और अपने तर्क दिये हैं, लेकिन मैं इसे विचार काव्य कहूँगा जो महत् काव्य भी है और मेरा विश्वास है कि आने वाले समय में हिन्दी के बौद्धिक समाज में यह व्यापक विचारोत्तेजना पैदा करेगा। उन्होंने कहा कि ‘राधामाधव’ काव्य बहुत ही मनोयोग से लिखा गया काव्य है, जिस पर बिना गहराई के साथ अध्ययन किए जल्दबाजी में टिप्पणी नहीं की जा सकती। इनकी रचनाएं समय की कसौटी पर खरी उतरी हैं। अपनी पचास वर्ष से अधिक समय की रचना-यात्रा में उनके द्वारा पचास-साठ से अधिक पुस्तकें लिखना सुखद आश्चर्य का विषय है। वरिष्ठ आलोचक डॉ. नित्यानंद तिवारी ने ‘राधामाधव’ का लोकार्पण करते और कवि की अनेक रचनाओं के उदाहरण देते हुए कहा कि उनके पास कहने को बहुत कुछ है और लिखने की शैली भी अलग है। मिथकों को लेकर उन्होंने कई रचनाएं की हैं जो अपने आप में महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें संदेह नहीं कि वे हिन्दी के सुप्रतिष्ठित कवि हैं। उनका रचनात्मक आवेग बहुत तीव्र है और उनके पास अक्षय भंडार है। पूतना के माध्यम से आदिवासी स्त्राी जीवन का चरित्रा-चित्राण अनोखा है। कवि ने अपने सम्पूर्ण काव्य-सृजन को समकालीन बनाने की हर संभव कोशिश की है जिसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। सत्यप्रकाश मिश्र, राममूर्ति त्रिपाठी और रमाकांत रथ जैसे अनेक भारतीय विद्वानों ने उनकी इस विशिष्टता को रेखांकित भी किया है। कवि लीलाधर मंडलोई ने कहा कि बिना राधा के आख्यान को रचे राधाभाव को रचना ‘राधामाधव’ का महत्त्वपूर्ण तत्व है। इसमें स्त्री विमर्श भी है जिससे कवि की अलग पहचान बनती है। इनके समूचे साहित्य में मूल पूंजी आख्यान है और आख्यान को साधना बहुत बड़ी बात है। आलोचक डॉ. संजीव कुमार ने कहा कि विवेच्य संग्रह ‘अस्ति’ में इतनी तरह की और इतने विषयों की कविताएं हैं जो पूरी दुनिया को समेटती हैं। उद्भ्रांत जी की कविताओं में पर्यावरण के साथ-साथ पशु-पक्षियों और संसार के समस्त प्राणियों की संवेदना को महसूस किया जा सकता है। संग्रह की अनेक कविताएं अद्भुत हैं। साहित्यकार धीरंजन मालवे ने कविता संग्रह ‘अस्ति’ पर केन्द्रित आलेख का पाठ करते हुए कहा कि कवि ने कविता की हर विधा को सम्पूर्ण बनाने में अपनी भूमिका निभाई है और उनकी कृतियों से यह साफतौर पर ज़ाहिर होता है कि उद्भ्रांत नारी-सशक्तीकरण के प्रबल पक्षधर हैं। इसके साथ ही उन्होंने दलित चेतना के साथ अनेक विषयों पर बेहतरीन कविताएं लिखीं हैं। संगोष्ठी का बीज-वक्तव्य देते हुए जनवादी लेखक संघ की दिल्ली इकाई के सचिव प्रखर आलोचक डॉ. बली सिंह ने कहा कि आज के दौर में इतने तरह के काव्यरूपों में काव्य रचना बेहद मुश्किल है, लेकिन उद्भ्रांत जी इसे संभव कर रहे हैं। उनकी कविताएं विचारों से परिपूर्ण हैं। यहाँ सांस्कृतिक मसले बहुत आये हैं और पहले की अपेक्षा उनकी कविताओं में स्मृतियों की भूमिका बढ़ी है। ‘राधामाधव’ स्मृतियों का विलक्षण काव्य है। ‘अभिनव पांडव’ में स्त्रियों के प्रति बराबरी के दर्जे के लिये कई सवाल उठाये गये हैं जो आज के दौर में अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने इस उत्तर आधुनिक समय में आई उद्भ्रांत की मिथकाधारित और विचारपूर्ण समकालीन कविताओं को बहुत महत्त्वपूर्ण बताया। प्रारम्भ में, कवि उद्‍भ्रांत ने तीनों लोकार्पित कृतियों की चुनिंदा कविताओं और काव्यांशों का प्रभावशाली पाठ करने के पूर्व ‘अस्ति (कविता-संग्रह)’ जिसे उन्होंने ‘कविता और जीवन के प्रति आस्थावान’ अपने सुधी और परम विश्वसनीय पाठक-मित्र के निमित्त ‘समर्पित किया है- की प्रथम प्रति बड़ी संख्या में उपस्थित सुधी श्रोताओं में से एक वरिष्ठ कवि श्री शिवमंगल सिद्धांतकर को तथा ‘राधा-माधव’- जिसे उन्होंने पत्नि और तीनों बेटियों के नाम समर्पित किया है- की प्रथम प्रति श्रीमती उषा उद्‍भ्रांत को भेंट की। कार्यक्रम का कुशल संचालन करते हुए दूरदर्शन महानिदेशालय के सहायक केन्द्र निदेशक श्री पी.एन. सिंह द्वारा कवि के सम्बंध में दी गई इन दो महत्त्वपूर्ण सूचनाओं ने सभागार में मंच पर उपस्थित विद्वानों और सुधी श्रोताओं को हर्षित कर दिया कि वर्ष 2008 में ‘पूर्वग्रह’ (त्रौमासिक) में प्रकाशित उनकी जिस महत्त्वूपर्ण लम्बी कविता ‘अनाद्यसूक्त’ के पुस्तकाकार संस्करण को लोकार्पित करते हुए नामवर जी ने उसे उस समय तक की उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति घोषित किया था-को वर्ष 2008 के ‘अखिल भारतीय भवानी प्रसाद मिश्र पुरस्कार’ से सम्मानित करने की घोषणा हुई है। इसके अलावा उडीसा से पद्मश्री श्रीनिवास उद्गाता जी-जिन्होंने रमाकांत रथ के ‘सरस्वती सम्मान’ से अलंकृत काव्य ‘श्रीराधा’ का उड़िया से हिन्दी में तथा धर्मवीर भारती की ‘कनुप्रिया’ का हिन्दी से उड़िया में काव्यानुवाद किया था-ने कवि को सूचित किया है कि वे आज लोकार्पित ‘राधामाधव’ का भी हिन्दी से उड़िया में काव्यानुवाद कर रहे हैं जो बहुत जल्द उड़िया पाठक-समुदाय के समक्ष आयेगा। धन्यवाद-ज्ञापन हिन्दी भवन के प्रबंधक श्री सपन भट्टाचार्य ने किया।
प्रस्तुतकर्ता
तेजभान
ए-131, जहांगीरपुरी, नई दिल्ली-110033
मोबाईल: 9968423949

बुधवार

उर्दू में गुलज़ार का नया काव्य-संग्रह पंद्रह पांच पचहत्तर


मुझे अफ़सोस है सोनां
कि मेरी नज़्म से होकर गुज़रते वक्त बारिश में
परेशानी हुई तुमको
बड़े बेवक्त आते हैं यहां सावन
मेरी नज़्मों की गलियां यों भी अक्सर भीगी रहती है
कई गड्ढों में पानी जमा रहता है
अगर पांव पड़े तो मोच आ जाने का ख़तरा है

मुझे अफ़सोस है लेकिन-
परेशानी हुई तुमको कि मेरी नज़्म में कुछ रोशनी कम है
गुज़रते वक्त दहलीजों के पत्थर भी नहीं दिखते
कि मेरे पैरों के नाख़ून कितने बार टूटे हैं-
हुई मुद्दत कि चैराहे पे अब बिजली का खंभा भी नहीं जलता
परेशानी हुई तुमको-
मुझे अफ़सोस है सचमुच!
 
प्रकाशकः उर्दू मरकज़ अजी़माबाद
247 एम आई जी लोहियानगर
पटना-800 020. मोबाइल- 09431602575.

सोमवार

अंधेरे में रोशनी की सेंध लगाने को बेचैन कविताएँ

रश्मिरेखा की अधिकांश कविताएं स्त्री सुलभ गहरे विषाद के साथ अपनी सीधी-सादी बनावट में दूर तक असर करती है। यानी अक्षर कम अर्थ अधिक। ‘अरथ अधिक आखर अतिथोरे’।  अँधेरे में रोशनी की सेंध लगाने वाली इस कवयित्री की प्रगतिगामी उम्मीद से भरी कविताओं में युगबोध को उकेरने की अद्भुत क्षमता है। देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं यथा - पहल, आलोचना, हंस, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, इंडिया टुडे, पाखी, समकालीन भारतीय साहित्य आदि में प्रकाशित इनकी रचनाएँ समकालीन साहित्य-जगत में जोरदार उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। प्रकाशन संस्थान से प्रकाशित इनका काव्य-संग्रह ‘सीढि़यों का दुख’ महत्वपूर्ण कृति है। इनकी दो कविताएँ ‘जनशब्द’ पर सहर्ष प्रस्तुत है-  

राग-बीज

तुम्हारे नेह की रोशनाई ने
भर दिए मेरी कलम के अशेष शब्द
जिसे तुम्हीं ने दिया था कभी
बनाये रखने को वजूद
तुम्हारे नाम का एक-एक अक्षर
बोने लगा राग-बीज
बदलने लगे जीने का अर्थ
समय पर अंकित हो गया इंतज़ार
अच्छी लगने लगीं
किताबों की बातें
बेमतलब की बातें
दुनिया जहान की बातें
आत्मा में गहरे उतर आया
मेरे नाम में निहित तुम्हारा नाम

सीढि़याँ

सीढि़यों पर चढ़ते हुए
हमने कब जाना
सीढि़याँ सिर्फ चढ़ने के लिए नहीं
उतरने के लिए भी होती है

इतनी जद्दोजहद के बाद
चढ़ सके जितनी
हर बार उससे कहीं ज़्यादा उतरनी पड़ी सीढि़याँ

बचपन की यादों में
शामिल है साँप-सीढ़ी का खेल

फ़ासले तय करेंगे हौसले एक दिन
बस इसी इंतजार में
बिछी रहती है सीढि़याँ
पाँवों के नीचे सख़्त जमीन की तरह
....
संपर्कः निराला निकेतन के पीछे, झुनी साह लेन,
रामबाग रोड, मुजफ्फरपुर-842001. बिहार
मोबाइल- 09430051824
                                                                                  रश्मिरेखा की अन्य कविताएँ यहाँ भी


                                                

गुरुवार

मरना अब एक मामूली-सी लाचारी है... नीलाभ की कविता

दिल्ली-दर्शन

इस बस्ती में
ख़्वाब भी नहीं आते इस बस्ती में
आते हैं तो बुरे ही आते हैं
सोने को जाता हूँ मैं घबराहट में
आंख मूंदने में भी लगता है डर
जाने कैसी दीमकों की बांबी बनी है मस्ती में
हवा हो गए हैं नीले शफ़्फ़ाफ दिन
लो देखो गद्दियों पर आ बैठे वही हत्यारे
इस बार तो नकाबें भी नहीं है उनके चेहरों पर

जिंदगी मंहगी होती जाती है मौत सस्ती
मरना अब एक मामूली-सी लाचारी है
अक्सर दिन में कई-कई बार पड़ता है मरना

नीलाभ की कई अन्य कविताएँ ’दोआबा’ के ताजा अंक- 9 में

मंगलवार

केदार की कविताओं में प्रेम और जनमुक्ति का संघर्ष... मुजफ्फरपुर में केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती समारोह सम्पन्न!

समारोह का शुभारंभ करते डा.व्रजकुमार पाण्डेय, डा. खगेन्द्र ठाकुर, डा.विजेन्द्र्नारायण सिंह एवं नरेन्द्र पुण्डरीक


बिहार प्रलेस के महासचिव राजेन्द्र राजन
  नागार्जुन, केदार, त्रिलोचन, शमशेर और मुक्तिबोध हिन्दी में प्रगतिशील काव्य-सृष्टि के ‘पांच रत्न’ हैं। प्रगतिशील साहित्य का आन्दोलन भक्ति आन्दोलन के समान महाप्रतापी मान्य हुआ तो उसमें इन पाँच रत्नों की ऐतिहासिक भूमिका है। ये वस्तुतः इतिहास निर्माता कवि हैं। इनकी चौथे दशक की कविताएँ ही प्रगतिवाद की आधार-सामग्री थीं। इनमें केदारनाथ अग्रवाल, रामविलास शर्मा के सखा और कदाचित समकालीनों में सर्वाधिक प्रिय कवि थे। केदार साम्राज्यवाद, सामन्तवाद , पूँजीवाद, व्यक्तिवाद और संप्रदायवाद के शत्रु कवि थे... बिहार प्रगतिशील लेखक संध द्वारा मुजफ्फरपुर में आयोजित ‘केदारनाथ अग्रवाल की कविता और उसका समय’ विषयक परिचर्चा में आलेख पाठ करते हुए आलोचक रेवती रमण ने यह बात कही।
    इससे पहले डा. रानी श्रीवास्तव ने केदारनाथ अग्रवाल की कविता - हवा हूँ, हवा हूँ, वसंती हवा हूँ... का सस्वर पाठ किया।  डा. पूनम सिंह ने केदार के काव्य-व्यक्तित्व में मानवीय संवेदनाओ को रेखांकित करते हुए कहा कि केदार की कविता कठिन जीवन-संघर्षों के बीच अदम्य जिजीविषा बनाये रखने वाले स्त्रोतों की खोज करती है, वे मूलतः किसानी संवेदना के कवि हैं, उनकी कविताएँ उनके बाँदा जनपद की संस्कृति से जुड़ी हुई है। ‘नागार्जुन के बाँदा आने पर’ उन्होंने जो कविता लिखी उसमें उनके गाँव का पूरा चित्र प्रतिबिम्बित है। केदार का समस्त कविकर्म अभिजन के दायरे से बाहर जाकर गरीब किसानों, कामगार मजदूरों, दलित-स्त्रियों के पक्ष में खड़ा है। केदार का कवि सामंती वर्चस्व का अतिक्रमण कर मानव मूल्यों की वकालत करता है तथा मुक्तिबोध की तरह अभिव्यक्ति के खतरे उठाने को सदैव तत्पर है।
    बिहार प्रलेस के महसचिव राजेन्द्र राजन ने अपने संबोधन में कहा कि केदारनाथ अग्रवाल प्रगतिशीलता के प्रतिमान हैं। उनकी रचनाएँ प्रतिवद्ध साहित्य का नमूना है। वे परिवर्तन को अवश्यंभावी मानते थे, तभी तो उन्होंने लिखा भी - एक हथौड़े वाला घर में और हुआ / हाथी से बलवान जहाजी हाथों वाला / और हुआ / दादा रहे निहार सवेरा करने वाला /और हुआ / एक हथौड़ा वाला घर में और हुआ
    बाँदा से आये नरेन्द्र पुण्डरीक ने कहा कि केदारनाथ अग्रवाल की कविता हमारे समाज की विडम्बनाओं एवं त्रासदियें से सीधे साक्षात्कार कराते हुए जिस तरह से अपने परिवेश के उपादानों, नदी-पहाड़-खेत, पेड़ आदि को एक नयी पहचान देकर उनके प्राकृत सौन्दर्य को अपने यहाँ के आदमी को विसंगतियों से उवारने एवं उसकी पहचान को बनाने एवं उसे सामने लाने का जो कार्य केदार की कविता ने किया है, उसकी मिसाल प्रगतिशील हिन्दी कविता में दूसरी नहीं है।
    डा.विजेन्द्रनारायण सिंह ने  कहा कि केदार की कविताओं में प्रगतिशीलता प्रयोगवाद और नई कविता का समन्वित प्रवाह है। प्रो. तरुण कुमार ने केदार को किसानी संस्कृति  और चेतना में हिन्दी का सर्वाधिक प्रतिवद्ध कवि बताया। पूर्व कुलपति डा. रिपुसूदन श्रीवास्तव ने कहा कि प्रमाणिक मूल्यों एवं मानवीय  संदर्भ के दृष्टिकोण से केदारनाथ अग्रवाल की कविता हमें रास्ता दिखाती है।समारोह के उदघाटनकर्त्ता  डा. व्रजकुमार पाण्डेय ने कहा कि केदारनाथ अग्रवाल आजादी से लेकर साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए लड़ रही दुनिया के लिए काव्य रचनाएँ की है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए  वरिष्ठ आलोचक खगेन्द्र ठाकुर ने केदारनाथ अग्रवाल को ग्रामीण संवेदना के साथ ही क्रांतिकारी कवि की संज्ञा दी उन्होंने कहा कि उनकी कविताओ में लड़ाकू मनुष्य दिखायी पड़ता है, जो नये समाज के लिए लड़ रहा है। इस सत्र का मंच संचालन कवियत्री एवं कथालेखिका पूनम सिंह ने एवं धन्यवाद ज्ञापन श्रवण कुमार ने किया ।
    आयोजन के दूसरे सत्र में कवि-सम्मेलन आयोजित हुआ। जिसमें मुजफ्फरपुर सहित बिहार के विभिन्न हिस्सों से आये कवियों की भागीदारी रही। नरेन्द्र पुण्डरीक (बाँदा), शहंशाह आलम,  अरविन्द श्रीवास्तव, अरुण शीतांश,  अली अहमद मंजर, श्रीमती मुकुल लाल, अरविन्द ठाकुर, नूतन आनंद, देव आनंद, डा. विनय चौधरी, रश्मि रेखा, आशा अरुण, पुष्पा गुप्ता, श्वाति, सुनीता गुप्ता, संजय पंकज,  मीनाक्षी मीनल, श्यामल श्रीवास्तव, श्रवण कुमार, राजीव कुमार, रानी श्रीवास्तव, अंजना वर्मा आदि ने अपने काव्य-पाठ से आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया। इस सत्र का संचालन युवाकवि रमेश ऋतंभर ने किया तथा अध्यक्षता  प्रो. रवीन्द्रनाथ राय ने की। मुजफ्फरपुर में आयोजित इस आयोजन की धमक काफी समय तक महसूस की जायेगी।       

बिहार प्रगतिशील लेखक संध द्वारा प्रो. कमला प्रसाद एवं आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की स्मृति को समर्पित...

केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती संगोष्ठी एवं कवि सम्मेलन

विषयः       केदारनाथ अग्रवाल की कविता और उनका समय
अध्यक्षता:        डा. खगेन्द्र ठाकुर
आलेख पाठः     डा. रेवती रमण
मुख्य वक्ताः      प्रो. अरुण कमल
                       प्रो. तरुण कुमार
        
      रविवार, 8 मई 20011, समयः 11 बजे पूर्वाह्न

कवि सम्मेलन:- 4 बजे अपराह्न

आयोजन स्थल:- सीनेट हाल, विश्वविधालय परिसर, मुजफ्फरपुर, बिहार। आप सादर आमंत्रित हैं।
                                                      
                          आयोजक /मेजवान
            मुजफ्फरपुर प्रगतिशील लेखक संध एवं 
  केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती समारोह एवं तैयारी समिति

नोट - राज्य कार्यसमिति की बैठक 1.30 बजे से होगी। समिति सदस्यों के साथ ही जिले के पदाधिकारियों /प्रतिनिधियों की उपस्थिति अपेक्षित है। प्रतिनिधियों के लिए भोजन एवं ठहरने की व्यवस्था की गयी है।
                                         निवेदक
डा.व्रज कुमार पाण्डेय                                      - राजेन्द्र राजन
अध्यक्ष- बिहार प्रलेस                             महासचिवः बिहार प्रलेस
मोबाइल- 09934982306                    मोबाइल-09471456304

संपर्कः डा. पूनम सिंह                                  रमेश ऋतंभर
अध्यक्ष जिला प्रलेस                                सचिवः जिला प्रलेस,
मुजफ्फरपुर, बिहार                                मुजफ्फरपुर, बिहार
मोबाइल-09431281949.                   मोबाइल- 9431670598.
 


       
 

सोमवार

बिहार की समकालीन रचनात्मकता में ‘साँवली’ - उत्तिमा केशरी



‘इंसान को शब्द अपने विचारों को छिपाने के लिए नहीं दिये गये थे’ (जोसे सारामागे)। बिहार में शब्द सृजन एवं रचनात्मक साहित्यिक हस्तक्षेप की सुदीर्ध-सुदृढ़ परम्परा रही है। कभी गया, मुजफ्फरपुर, मुंगेर आदि जनपदों  की साहित्यिक धमक राष्ट्रीय स्तर पर महसूस की जाती थी। बिहार के ये साहित्यिक ‘हब’ अपने  साहित्य सृजन से साहित्य की राष्ट्रीय धारा को दिशा प्रदान करते थे। आज यह धुरी कमोवेश राजधानी पटना में आकर अटक गयी है। बावजूद इसके समकालीन लेखन की बोरसी आज आरा-भोजपुर में सुलगती है तो उसकी गर्माहट राष्ट्रीय स्तर पर महसूस की जाती है। बिहार में पश्चिम भोजपुर से लेकर सुदूर पूर्व में पूर्णिया तक लेखन-नवलेखन की सशक्त पीढ़ी अदम्य जिजीविषा के साथ पतझड़ के प्रतिरोध में खड़ी है। भोजपुर की धरती से जहाँ मित्र, जनपथ, देशज, रू और अभी-अभी सृजन लोक सदृश्य पत्रिकाएँ राष्ट्र की साहित्यिक क्षितिज पर अपनी जोरदार उपस्थिति के साथ डटी है, वहीं पूर्णिया अंचल से प्रकाशित - कला, मुहिम, संवदिया, परती-पलार, वर्तिका, हमसब, अर्य संदेश, लक्ष्य आदि पत्रिकाओं के साथ ‘साँवली’ का आगाज शुभ संकेत है, बिहार की समकालीन रचनात्मकता के लिए। 154 पृष्ठों की यह पत्रिका स्वस्थ साहित्यिक परंपराओं को कायम रखते हुए पूर्णिया अंचल को राष्ट्रीय-अन्तराष्ट्रीय  लेखन से जोड़ने की कवायद है। ‘साँवली’ का ताजा अंक कहानी, आलेख , कविता सहित सामाजिक सांस्कृतिक हलचल, पुस्तक समीक्षा व नवांकुर स्तम्भ का स्तवक है। 12 प्रकाशित कहानियों में देवेन्द्र सिंह की कहानी ‘कामरेड’ समय के जटिल होते परिवेश की अभिव्यक्ति है। डा. सरला अग्रवाल की कहानी ‘अपराधों की राजनीति’ भी छद्म दुनिया के कटु अनुभवों को व्यक्त करती है।  संवेदनात्मक रिश्तों की कहानी ‘ये जीने के रास्ते’ भी पठनीय है। कहानी की सरलता पाठकों को सरस अनुभूति दे जाती है। महत्त्वपूर्ण आलेखों में ‘पूर्णिया के हिन्दी साहित्य पर बंगला साहित्य का प्रभाव’ बंगला साहित्यकारों के पूर्णिया से ऐतिहासिक रिश्तों की बानगी प्रस्तुत करता है जो पाठको को विमर्श के लिए प्रेरित भी करता है। स्मरण है कि बंगला साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार पूर्णिया शहर के निवासी सतीनाथ भादुड़ी हिन्दी के अमर कथाशिल्पी फणीश्वर नाथ रेणु के कथा-गुरु थे। कविताओं की भीड़ में चेतन वर्मा, अनुज प्रभात, किरण झा ‘किरण’ देवेन्द्र सौरभ, डा.सुवंश ठाकुर अकेला, मलय और अरुणाभ सौरभ पठनीय हैं। पत्रिका संपादन में अरुण अभिषेक के जुड़ जाने से ‘साँवली’ के लिए और बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है, बेशक! - डा. उत्तिमा केशरी,भट्ठा दुर्गा बाड़ी, पूर्णिया- 854301. बिहार. दूरभाष - 06454 244776.
साँवली
प्रधान संपादकः जवाहर किशोर प्रसाद
माधुरी प्रकाशन, रामबाग, शिवनगर
मिल्लिया कानवेंट से पूरब
पूर्णिया-854 301. मोबाइल - 9931465695.   

मंगलवार

...जैसे गाँव में महाजन का उधार। धूप: अमरेन्द्र की कविताएँ


 मेरी सूरत भय से
पसीने से सनी हुई है;
    - वजह यह है
मेरे सर पर
धूप की तलवार तनी हुई है।

 ड़ी धूप का दिन
कुछ इस तरह से नागवार गुजरा,
    -जैसे मय्यत पर मुजरा

 क बात
जो अब सरे आम
जाहिर हो गयी है
कि जाड़े की धूप ने
अपना धर्म बदल लिया है
               - काफिर हो गई हैं।

जेठ की दुपहरी में
अंग-अंग पर धूप की यह मार,
बड़ी असहनीय है दोस्त
जैसे- गाँव में
    - महाजन का उधार। 
-डा. अमरेन्द्र, भागलपुर.
मोबाइल- 09939451323.

रविवार

कलम की जमीन से रू-ब-रू कराता ‘रू’


आज के हिन्दी साहित्य और गाँवों के यर्थाथ से रू-ब-रू करता हुआ ‘रू’ अपने आप में बेमिशाल है। गजव तेवर है इसका। ग्रामीण परिवेश को हिन्दी साहित्य में ढ़ालने के लिए टकसाल के बदले ‘लोहसारी’ का प्रयोग ग्राम्य यथार्थ को चित्रित करता है। विषय सूची में धार, फाल, चबूतरा, चास-दोखार, कछार, पैराव, चैता, पुरवा, अमोला, बाँगुर, वृक्षता, पतवार, जिरात, मंच एवं रोपनी शीर्षक देकर विषय-वस्तु को गाँव के करीब लाने का नितान्त अभिनव प्रयोग है। ‘रू’ ग्राम्य-यथार्थ का ऐसा ही पिटारा है- जिसमें खेतिहर समुदाय, मजदूर-किसान, किसान आन्दोलन, नगर बनाम आधुनिकता और परम्परा का अन्तर्द्वन्द, साहित्य सृजन में गाँवों की उपेक्षा, लोकधर्मी कविता में युवा परिदृश्य आदि वर्तमान समस्याओं पर विचार संकलित हैं, सुरक्षित हैं। कविताओं और कहानियों का चयन भी बहुत ही सलीके से किया गया है। सुदूर गाँव में अपने सम्पादकीय कार्यालय में बैठकर सम्पादक ने सृजन का जो ताना बाना बुना है वह उनकी अटल संकल्प शक्ति का परिचायक है। इस सफल आयोजन के लिए युवा कवि कुमार वीरेन्द्र को साधुवाद ।
रू
संपादकः कुमार वीरेन्द्र
ग्राम-भकुरा, पोस्ट-फरना
जिला-भोजपुर, आरा-802315. बिहार
मोबाइल-09199148586.

बुधवार

लोक संस्कृति के ऐतिहासिक विकास की दस्तावेज़ ‘मड़ई’- 2010



लोक संस्कृति की अस्तित्व रक्षा, उसके संरक्षण - संवर्द्धन की चिन्ता, उसकी सार्थकता को पग-पग पर चिह्नित करते हुए उसकी नई अवधारणा विकसित करने में ‘मड़ई’ की महती भूमिका है।
मड़ई-2010 का यह अंक लोकनाट्य पर केन्द्रित है। लोकनाट्य मानव जाति की सामूहिक सर्जनात्मकता को अभिव्यक्त करने में सर्वाधिक सक्षम विधा है। सैतालिस गवेष्णात्मक एवं शोधात्मक आलेखों से सुसज्जित इस अंक में लोकनाट्य के विभिन्न रूपों और शैलियों को रूपायित ही नहीं किया है- बल्कि लोक संस्कृति में आधुनिक चिन्तन एवं विचारों को भी विस्तार दिया गया है। इस प्रकार हम देख रहे हैं कि लोक संस्कृति की भूमिका की आधार भूमि अब ठोस धरातल का स्वरूप ग्रहण कर रही है। 
यह अंक सम्पूर्ण भारत की लोक संस्कृति के ऐतिहासिक विकास एवं वैभवशाली परम्परा का अनमोल दिग्दर्शन है। 
इस क्षेत्र में ‘मड़ई’ परिवार की अटल प्रतिवद्धता सफल हो, सार्थक हो,- यही कामना है।   

मड़ई
सम्पादक: डा. कालीचरण यादव
बनियापारा, जूना बिलासपुर, बिलासपुर-495001.
मो.- 098261 81513.

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