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रविवार

कलम की जमीन से रू-ब-रू कराता ‘रू’


आज के हिन्दी साहित्य और गाँवों के यर्थाथ से रू-ब-रू करता हुआ ‘रू’ अपने आप में बेमिशाल है। गजव तेवर है इसका। ग्रामीण परिवेश को हिन्दी साहित्य में ढ़ालने के लिए टकसाल के बदले ‘लोहसारी’ का प्रयोग ग्राम्य यथार्थ को चित्रित करता है। विषय सूची में धार, फाल, चबूतरा, चास-दोखार, कछार, पैराव, चैता, पुरवा, अमोला, बाँगुर, वृक्षता, पतवार, जिरात, मंच एवं रोपनी शीर्षक देकर विषय-वस्तु को गाँव के करीब लाने का नितान्त अभिनव प्रयोग है। ‘रू’ ग्राम्य-यथार्थ का ऐसा ही पिटारा है- जिसमें खेतिहर समुदाय, मजदूर-किसान, किसान आन्दोलन, नगर बनाम आधुनिकता और परम्परा का अन्तर्द्वन्द, साहित्य सृजन में गाँवों की उपेक्षा, लोकधर्मी कविता में युवा परिदृश्य आदि वर्तमान समस्याओं पर विचार संकलित हैं, सुरक्षित हैं। कविताओं और कहानियों का चयन भी बहुत ही सलीके से किया गया है। सुदूर गाँव में अपने सम्पादकीय कार्यालय में बैठकर सम्पादक ने सृजन का जो ताना बाना बुना है वह उनकी अटल संकल्प शक्ति का परिचायक है। इस सफल आयोजन के लिए युवा कवि कुमार वीरेन्द्र को साधुवाद ।
रू
संपादकः कुमार वीरेन्द्र
ग्राम-भकुरा, पोस्ट-फरना
जिला-भोजपुर, आरा-802315. बिहार
मोबाइल-09199148586.

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बिहार से सुखद सूचना...

Shivanjali srivastava ने कहा…

इन प्रयासों को देख खुसी होती है ! लगता है साहित्य के माटी की गर्माहट हमेशा बनी रहेगी !

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