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सोमवार

हिन्द-युग्म का नायाब तोहफा: सुशील कुमार का काव्य-संग्रह ‘तुम्हारे शब्दों से अलग’


सांस्कृतिक बंजरपन के विरूद्ध उम्मीद की कुछ कोमल-मुलायम पत्तियों के साथ सुशील कुमार का अद्यतन प्रकाशित कविता संग्रह ‘तुम्हारे शब्दों से अलग’ अभी-अभी ‘हिन्द युग्म’ (संपादक: शैलेश भारतवासी) द्वारा मिला। यह कवि और प्रकाशक का साहित्य के पक्ष में साझा भावनात्मक इंतसाब का प्रतीक है जो आत्मीयता व प्रेम से लबरेज़ बतौर संग्रह मूर्त्त हो उठा है। शोर-शराबे और भीड़तंत्र से अलग सुशील कुमार के शब्दों की अपनी दुनिया है जो भाषाओं की काली रात के विरूद्ध बगावती अंदाज में खड़ी है। कवि ने जीवन जगत के नये पहलुओं को नई दृष्टि से देखा है, परखा है और नये चित्रों, प्रतीकों और अलंकारों द्वारा उसे अभिव्यक्त किया है। इनकी कविताओं में विषयगत वैविध्य के साथ-साथ गहन सूक्ष्मता संजोए बिंव और चित्रों का भी बहुरंगी फलक है, कविता को सादगी युक्त एक नई भाषा देने के इनका आत्म विश्वास इनके साथ है। इनकी कविताओं का संसार हम सब का जाना पहचाना रोज व रोज का संसार है। कवि की भावधारा विशुद्ध जनोमुखी है। वरिष्ठ कवि अरुण कमल मानते हैं कि ‘उनकी कविताओं की कल्पना-शक्ति बिम्ब बहुलता एवं भावनात्मक आर्द्रता निश्चिय ही सहृदय पाठकों को अपनी ओर खींच लेगी। देखें कविताओं की एक बानगी- दुनिया में चाहे जितनी गहरी रात पसरी हो  / हमारे घरों में निरंतर आशा के दीप जलते रहते हैं  / साँसों के ढोल बजते रहते हैं / ठीक वहीं लौटना है हमें, अपने शांतिनिकेतन में । वहाँ अपने दुखों को फाँककर हम फकीर हो जाएँगे  / और अलमस्ती के गीत गाएँगे।
 इसमें तनिक भी संकोच नहीं होना चाहिए कि सुशील कुमार की कविताएं समय की आहट को पहचानती है। किसी भाषिक चमत्कार से बचते हुए सीधे-साफ लफ्जों में अपनी बात रखते हुए भी ये कविताएं काल के कुंद कपाल पर सूराख करने की कूबत रखती है।
तुम्हारे शब्दो से अलग / सुशील कुमार
1, जिया सराय, हौज खास, नई दिल्ली-16.
मोबाइल-09873734046 / 09968575908.

शुक्रवार

हबीब तनवीर ने कहा था - एक निबाला कम खाओ, ताकि याद रहे कि भूख किस चीज को कहते हैं, भूख कैसा होता है?

कालजयी रंगयोद्धा हबीब तनवीर के साथ
 अरविन्द श्रीवास्तव

- हमारे छत्तीसगढ़ के ग्रामीण कलाकारों को भात न मिले तो पेट ही नहीं भरता।  उनको रोटी एक बार न हो तो न सही लेकिन भात डटकर खायेंगे- अक्सर कम पड़ गया है 25-30 आदमियों के लिए जो चावल पकाया गया, तो दुबारा पकाया उन्होंने और उनको इन्तजार करना पड़ा है.... असल भूख नहीं होती, ओरल नीड होती है- मूँह चलाने की जरूरत। जब तक कि वे पेट भर न खायें, उनका काम नहीं चलता है। अब कम खाने वाले एलीट किस्म के, जो डाइट का सन्तुलन जानते हैं, वे कमोवेश कुछ चीजें डरते-डरते और कम खाते हैं। भूख को जरा-सा कम खाना मज़हब में भी आया है। ज़रा-सा भूख को कायम रखते हुए एक निबाला कम खाओ, ताकि याद रहे कि भूख क्या शह है, किस चीज़ को कहते है, भूख कैसा होता है? हमारे यहाँ सरकारों में अंधविश्वास है वो भूख को नहीं पहचानते, बिलो दि मार्जिन पावर्टी को नहीं जानते। वहाँ जाकर देखा नहीं उन्होंने। और चुनांचे इसीलिए ये परिर्वतन नहीं कर सकते अपनी तमाम नेकनीयती के बावजूद माइण्ड सेट ही रहता है। वे बेचारे मासूम, इनोसेन्ट हैं। उनको समझ में नही आता कि ये क्या हो रहा है। क्यों हमारे शाटर्स, इतने लोंग्स लोन्स,  इतनी योजनाएँ जो उद्धार के लिए है गरीबों के- इसके बावजूद क्यों इतना हैजीटेशन हो रहा है? क्यो आजादी महसूस नहीं कर रहे हैं?

रविवार

वैश्विक कला द्वार पर खड़ी मंजूषा


मंजूषा कला के अपने प्रतीक हैं और अपना ग्रामर. बिहुला की नगरी चम्पापुरी को दिखाने के लिए माली कलाकार चम्पक पुष्प के पेड़ दिखाते हैं. चांदो सौदागर को दर्शाने के लिए पगड़ी चन्द्राकार तिलक बनती है प्रतीक. बाला वह है, जिस पुरूष आकृति के पैर के समीप मुंह खोले सांप का चित्र है. इंद्र को समझना है, तो देखना होगा कि किस आकृति के दाहिने हाथ में कडक़ती हुई विजली है. बिहुला वह है, जो हमेशा खुले बालों में होती है और सामने मंजूषा या फिर नागिन का चित्र होता है. विषहरी देवी को दिखाने के लिए एक हाथ में कलश तथा दूसरे हाथ में सांप, या फिर दोनों हाथ में सांप बनाए जाते हैं. देवी मैना के दाहिने हाथ पर मैना बैठी होती है.। 
इस कला में रेखाएं सांप सी आगे बढ़ती है, लहराती हुई, बलखाती हुई. मानव चित्रों की आकृति कुछ पात्रों को छोडक़र हमेशा एक आंखवाली होती है. अंग्रेजी के एक्स अक्षर की तरह होती है मानव आकृति. आंखें बड़ी होती हैं. कपाल में कान नहीं होते. मर्द आकृति मूंछ और शिखा से पहचानी जाती है. महिला के छाती के उभार के लिए दो वृत बनते हैं. पुरुष के गर्दन मोटे होंगे और स्त्री के पतले. गर्दन बनाने के लिए आधे वृत की तरह कई रेखाएं खींची जाती हैं. लेकिन मंजूषा कला का मोहक ग्रामर हिंदी के उस व्याकरण की तरह नहीं है, जो अडिग है. सालों से चली आ रही इस कला परंपरा में बहुत कुछ छूटा है, तो बहुत कुछ जुड़ा भी है. लोक का एक स्वभाव यह भी है कि जो छूट गया, उसे कौन याद रखे. लेकिन क्या चक्रवर्ती देवी को हम भूल पाएंगे. उस कृतज्ञ समाज को भी उन्हें याद याद रखना होगा, जिसके लिए चक्रवर्ती देवी ने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी. बिना किसी पुरस्कार और प्रोत्साहन की अपेक्षा करते हुए, कुछ हद तक लोगों की उपेक्षा से बचते हुए वह औरत पूरी जिंदगी मंजूषा कला से जुड़ी रहीं.
लहसन माली को याद करें तो हमें लगभग छठी शताब्दी में लौटना होगा और चक्रवर्ती देवी की बात करें तो कुछ साल पीछे के अंग जनपद की डायरी के पन्ने पलटने होंगे. लेकिन बीच के 14 सौ बर्षों में इस कला यात्रा में क्या-क्या हुआ, इसका लेखा-जोखा अंग जनपद के पास नहीं हैं. अंगजनपद का इकलौता संग्रहालय, जो भागलपुर के सैंडिस कंपाउंड में है, इन 14 सौ वर्षों में, मंजूषा कला यात्रा पर आपसे कुछ नहीं कह पाएगा. 
इतिहास के पन्नों को आप बहुत खंगालेंगे तो आपको एक नाम मिलेगा- डब्ल्यू जी. आर्चर का. 1940 के आसपास अंग इलाके के अभिभावक थे ब्रिटिश अधिकारी डब्ल्यू जी. आर्चर. कहते हैं कि इलाके के दौरे के दौरान उन्हें एक बार मंजूषा मिला था और उसपर बने चित्रों को देखकर वे चकित भी हुए थे. बाद में उन्होंने मंजूषा के छाया चित्र लंदन भिजवाए थे और लिखा था कि अंग जनपद में एक ऐसी कला रची जाती है जिसमें सांप बनते हैं. 
लंदन म्यूजियम के इंडिया हाउस में उन छायाचित्रों के संग्रहित होने की बात आज भी कही और सुनी जाती है, लेकिन इन बातों की कहीं कोई लिखित गवाही नहीं मिलती

मंगलवार

डा. मृदुला शुक्ला की पुस्तक ‘हिरनी बिरनी’ -अंग प्रदेश की लोककथा


‘हिरनी बिरनी’, अंगप्रदेश की दो बनजारन युवतियों की लोकगाथा का हिन्दी उपन्यास है, जिसका नायक है पोषण सिंह। कथा के ये तीनों पात्र अंगप्रदेश की गंगा और कोशी के मिजाज को निचोड़ कर गढ़े गए हैं। हिरनी-बिरनी में कोशी नदी बहती है, और कोशी के पोषण सिंह में गंगा। और उपन्यास के आखिरी में कोशी गंगा में मिलकर गंगा की तरह शांत-गंभीर हो उठती है। उपन्यास का विषय और इसके पात्र, उपन्यास के शिल्प और इसकी शैली को अपने प्रभाव में लिए प्रवाहित होते रहते हैं; इसी से ‘हिरनी-बिरनी’ में शिल्प और शैली की कहीं तो झील है, कहीं भवरें, कहीं तो बाढ़ का बहाव और कहीं शरत काल की शांत धारा। इस छोटे-से उपंन्यास में पात्र, शिल्प-शैली का ऐसा रोचक संगठन, सिर्फ डा. मृदुला शक्ला से ही संभव था। एक पंक्ति में कहूँ, तो कहूँगा कि ‘हिरनी-बिरनी’ उपन्यास के काव्यशास्त्र के किसी आर्चाय की कृति है। - डा. अमरेन्द्र, भागलपुर.
लेखिका - डा. मृदुला शुक्ला, क्वा. नं. इ बी-10, 
चन्द्रपुरा, बोकारो (झारखंड) मोबाइल- 09934611146. 

सोमवार

पाखी (जन.-11) में प्रकाशित ‘युवा कहानी का चेहरा यह भी’ ब्लागर मित्रों के लिए....

                                  

कहानी अभिव्यक्ति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण माध्यम रही है। समय व काल को व्यक्त करने के लिए यह विधा सनातन हो चली है। स्वातंत्रोत्तर हिन्दी कहानी ने अपनी भाषाई सरलता एवं यथार्थपरक विषयों पर आधारित होने एवं सम्प्रेषणीयता की वजह से आमजन की संवेदनाओं को गहराई से स्पर्श किया है। कहानियों को समय के साथ-साथ कई-कई प्रयोगों के दौड़ से गुजरना पड़ा है। समय की चाक पर गढ़ी गयी कहानियों को अपनी सर्जनात्मक भाषा के साथ साथ बिम्बों में भी पैनापन लाना पड़ा है। साठोत्तरी कविता की तरह समय के साथ कहानियों की रोमानी उड़ान वाली नकेल कसी गयी। समय के साथ-साथ कहानियाँ आसपास बिखड़े घटनाक्रमों पर केन्द्रित होने लगी जिससे देशज व आंचलिक शब्द लुप्त होने से बचे रहे, उनमें जीवंतता आयी और उन्हें व्यापक स्पेश भी मिला। कहानियाँ कुलीन कक्षों से निकलकर खेत-खलिहानों का सफर तय करने लगी। हिन्दी कहानियों का जलवा ऐसा रहा कि देवकीनंदन खत्री की चन्द्रकांता संतति पढ़ने के लिए गैर हिन्दी भाषी हिन्दी सीखते और प्रेमचंद के उपन्यास लड़कियों को दहेज में दिए जाते अथवा वे स्वंय छिपा कर मायके से ससुराल लाती। 
       बहरहाल कहानियों का यह सफर दलित लेखन और स्त्री लेखन-सी ‘प्रेतछायाओं’ से आगे बढ़कर

लो, नष्ट होने से इसे मैंने बचा लिया....

तेरे जैसा यार कहाँ कहाँ ऎसा याराना.........



तेरे जैसा यार कहाँ कहाँ ऎसा याराना....... लगभग बीस वर्षों पूर्व ली गयी इस तस्वीर में, बाँये से -
     कवि विनय सौरभ, शहंशाह आलम, अविनाश ( मोहल्ला लाइव ) एवं ऊपर पसरे अरविन्द श्रीवास्तव।
नये वर्ष में इससे बेहतरीन तोहफ़ा और क्या हो सकता है मित्रों के लिए..
                                                                             - अरविन्द श्रीवास्तव

मंगलवार

कवि सोमदेव को प्रबोध साहित्य सम्मान स्वरूप एक लाख की राशि और स्मारक।



मैथिली के प्रतिष्ठित कवि 76 वर्षीय सोमदेव को वर्ष 2011 के लिए प्रबोध सहित्य सम्मान दिए जाने की धोषणा स्वास्ति फाउन्डेशन की ओर से की गयी है। ज्ञातव्य है कि आचार्य सोमदेव इसके पूर्व साहित्य अकादमी द्वारा भी सम्मानित हो चुके हैं। चानोदाइ, होटल अनारकली (उपन्यास), चैरेवेति, काल ध्वनि, लाल एशिया, मेघदूत, सहस्त्रमुखी चैक पर, सोम सतसई जैसे काव्यग्रंथों के रचयिता सोमदेव साठ वर्षों से अनवरत साहित्य सेवा में रत हैं।
1955 में मिथिला विश्वविधालय, दरभंगा से हिन्दी विभाग के उपाचार्य पद से निवृत होकर साहित्य साधना में निमग्न हैं। प्रबोध साहित्य सम्मान के रूप में उन्हें 19 फरवरी को पटना स्थित कालीदास रंगशाला में 1 लाख नगद और प्रतीक चिन्ह दिया जायेगा।

रविवार

लोक चेतना की साहित्यिक पत्रिका ‘कृति ओर’ का यह अंक-


लोक धर्मिता की हृदय-स्पर्शी कविताओं और लोक दृष्टि के तत्वों से सम्पूरित आलेखों से संकलित ‘कृति ओर’ का अक्टूबर-दिसम्बर ’10 का 58 वाँ अंक कई अर्थों में विशेष उल्लेखनीय हैं। लोक, जनपद और काव्यभाषा पर संदर्भित संपादक विजेन्द्र का आलेख ‘कृति ओर’ से जुड़े कवि, लेखक तथा पठकों को यह सोचने को विवश कर देता है कि हिन्दी और संस्कृत की कविता तथा उसका काव्यशास्त्र या आलोचना की आत्मा भारतीय आत्मा से भिन्न नहीं है- फिर भी जनजातियांे की जीवनशैली और संस्कृति इस कथित भारतीयता से मेल नहीं खाती। इस अभिप्राय का मंथन सदियों से चला आ रहा है। संपादक का विचार इस संबन्ध में वही है- जो कबीर का था- 
गंग तीर मोरी खेती बारी
जमुन तीर खरियाना
सातों बिरही मेरे निपजै
पंचू मोर किसाना।
सत्येन्द्र पाण्डेय का आलेख ‘समकालीन कविता में लोक दृष्टि’ तथा रामनिहाल गुंजन की ‘केशव तिवारी की काव्य चेतना’ में जहाँ कविता में लोक तत्व की मुखरता है वही सामाजिक कुरीतियाँ एवं राजनैतिक पाखण्ड के प्रति विद्रोह के शब्द गरजते हैं। 
हसी तरह शहंशाह आलम की कविता ‘धार्मिक विचारों को लेकर’ उसी धार्मिक ढोंग को रेखांकित करती है - जो अभी सम्पूर्ण विश्व की ज्वलन्त समस्या है। अन्य कविताएँ भी पठनीय है। संपर्क- ‘कृति ओर’ संपादकः रमाकांत शर्मा, ‘संकेत’ ब्रह्मपुरी-प्रतापमंडल, जोधपुर-342 001.(राजस्थान) मोबा.- 09414410367.

शुक्रवार

दिवंगत शिवराम की सृजनशीलता को समर्पित ‘प्रतिश्रुति’ का यह अंक


ऐसा सोचा कीजिए, जब मन होय उदास
एक सुंदर-सा स्वप्न है,अब भी अपने पास
                                                     
जोधपुर के मरुस्थल से भारतीय विद्या भवन द्वारा प्रकाशित ‘प्रतिश्रुति’ (त्रैमासिक) का अक्टूबर-दिसम्बर ’10 अंक विचारोत्तेजक आलेख एवं मर्मस्पर्शी कविताओं के कारण हिन्दी पत्रिकाओं की शीर्ष पँक्ति में स्थान पाने को सक्षम है। संपादक डा. रमाकांत शर्मा ने अपने संपादकीय में आज की मुखर और वाचाल कविता ही नहीं, जिन फूहर कविताओं की ओर अंगुली उठाई है- वस्तुतः वह सपाटबयानी है और ऐसी कविताओं ने हिन्दी साहित्य का घोर अनिष्ट किया है। यही नहीं ‘उद्वोधन’ और ‘उपदेश’ भी कविता का क्षेत्र नहीं है। संपादक के अनुसार जीवन और जगत के मार्मिक चित्र मनुष्य को क्रियाशील बनाती है कविता। कविता अनुभव का हिस्सा बनकर संवेदनात्मक और इन्द्रियबोधात्म रूप में प्रस्तुत होती है तब वह प्रभावी, विश्वसनीय और आत्मीय हो जाती है। यह मार्गदर्शन भावी काव्यकारों के लिए सर्वथोचित है।
इस अंक के आलेख ‘पाठकों की बदलती रूचि और सृजन का संकट’ मे लेखक प्रेमपाल शर्मा अपने लंबे शैक्षणिक प्रशासनिक अनुभवों के आधार पर बेखौफ कह सकते हैं कि अनेकानेक वैज्ञानिक उपकरणों के कारण अब सृजन भी ‘हईटेक’ हो चुके हैं। फिर भी सृजन में संकट है- किन्तु सर्जक का संकट नहीं। निर्माण और ध्वंस का क्रम चलता रहेगा, लाख संकट में भी सृजन होते रहेंगे। 
सुप्रसिद्ध रंगकर्मी, साहित्यकार और माक्र्सवादी विचारक शिवराम जी पर महेन्द्र नेह का स्मृति शेष आलेख ‘नहीं बुझेगी दृढ़ संकल्पों की मशाल’ उनके संघर्षशील और क्रांतिकारी विचारों को सलाम करता है। अंक से सुधीर विद्यार्थी की एक छोटी कविता ‘बीज’ 
-यदि मैं कठफोड़वा होता /तो दुनिया भर के /काठ हो चुके लोगों के / सिरों को फोड़ कर / भर देता जीवन के बीज  

डा. रमाकांत शर्मा 
संपादकः प्रतिश्रुति
‘संकेत’ ब्रह्मपुरी-प्रतापमंडल,
जोधपुर-342 001.(राजस्थान) मोबा.- 09414410367.

गुरुवार

हिन्दी में उदय प्रकाश सहित विभिन्न भाषाओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कारों की सूची


वर्ष 2010 में 20 दिसंबर को साहित्य अकादमी पुरस्कारों की घोषणा की गई। इस बार तीन कहानीकारों, चार उपन्यासकारों 8 कवियों और सात समालोचकों को यह पुरस्कार प्रदान किया गया।

उदय प्रकाश (हिंदी) कहानी (मोहनदास)
मनोज (डोगरी) कहानी
नांजिल नाडन (तमिल) कहानी
अरविन्द उजीर (बोडो) कविता
अरूण साखरदांडे (कोंकणी) कविता
गोपी नारायण प्रधान (नेपाली) कविता
वनीता (पंजाबी) कविता
मंगत बादल (राजस्थानी) कविता
मिथिला प्रसाद त्रिपाठी (संस्कृत) कविता
लक्ष्मण दुबे (सिन्धी) कविता
शीन काफ निजाम (उर्दू) कविता
बानी बसु (बांग्ला) उपन्यास
एस्थर डेविड (अंग्रेजी) उपन्यास
धीरेन्द्र महेता (गुजराती) उपन्यास
एम. बोरकन्या (मणिपुरी)
केशदा महन्त (असमिया) समालोचना
बशर बशीर (कश्मीरी) समालोचना
रहमत तरिकरे (कन्नड़) समालोचना
अशोक रा. केलकर (मराठी) समालोचना

उदय प्रकाश को प्राप्त सम्मान -भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार,
ओम प्रकाश सम्मान,
श्रीकांत वर्मा पुरस्कार,
मुक्तिबोध सम्मान,
साहित्यकार सम्मान
द्विजदेव सम्मान
वनमाली सम्मान
पहल सम्मान
SAARC Writers Award
PEN Grant for the translation of The Girl with the Golden Parasol, Trans. Jason Grunebaum
कृष्णबलदेव वैद सम्मान
महाराष्ट्र फाउंडेशन पुरस्कार, 'तिरिछ अणि इतर कथा' अनु. जयप्रकाश सावंत
2010 का साहित्य अकादमी पुरस्कार, ('मोहन दास' के लिये)

रविवार

किस्सा दुख नामक बेटी- मंगलेश डबराल संदर्भः सारा शगुफ्ता! उर्दू की पहली ‘एंग्री यंग पोएटस’


  सारा हमारे वक़्त की एक शायरा और एक इंसान का इक़बालिया बयान है, जिसे शाहिद अनवर ने एक लंबे एकालाप की तरह दर्ज किया है। लेकिन यह भीषण, परेशानकुन और ज़मीर को झकझोर देने वाला क़बूलनामा दरअसल एक बड़ा अभियोग-पत्रा है, जिसमें एक मासूम औरत और एक बेमिसाल शायरा अपनी त्रासद मृत्यु के लिए पुरुष जाति को गुनहगार ठहराती है। सारा के पति और सरपरस्त मर्द उसे हर बार सिर्फ इसलिए सज़ा देते रहे कि वह एक औरत थी और इसलिए भी कि वह शायरी करती थी। प्रेम की एक बेचैन तलाश में सारा ने चार विवाह किए और हर बार उसे अपमान और उत्पीड़न और क्रूरता का शिकार होना पड़ा। उसके पतियों में कुछ अच्छे-ख़ासे शायर भी थे, लेकिन वे भी मर्द ही साबित हुए और उन्हें भी सारा का शायरी करना गवारा नहीं हुआ। इसलिए नहीं कि वे शायरी के विरोध्ी थे, बल्कि इसलिए कि वे एक शायरा को अपनी बीवी बेशक बनाना चाहते थे, उस बीवी को आज़ाद रह कर शायरी करते हुए नहीं देख सकते थे। ‘मेरे क़बीले की कोख से / जब सिर्फ चीख पैदा हुई / तो मैंने बच्चे को गोद से फेंक दिया / और चीख़ को गोद ले लिया’ कहने वाली सारा आखि़रकार मौत को गोद ले लेती है, लेकिन यह मामूली मौत नहीं है, बल्कि यह किसी ज़मीर, किसी पाकीज़गी, किसी कायनात, किसी ख़ुदाई के और उसके परे भी कोई है तो उसके सामने और उसके भीतर गूंजते हुए अभियोगों और लानतों का एक दस्तावेज़ है। तमाम मर्दों और उनकी सामंती-बेरहम-ज़ालिम सत्ता के ख़िलाप़फ तमाम आज़ाद आत्माओं वाली औरतों की तरफ से एक अभियोग-पत्र !
इस एकल नाटक में सारा एक जगह अपने शौहर को ‘यज़ीद’ कहकर बुलाती है तो एक और जगह कहती हैः ‘तुम्हें जब भी कोई दुख दे / तो उस दुख का नाम ‘बेटी’ रखना।’ सारा के चार विवाह असल में चार मौतें, चार खुदकुशियां हैं और पांचवीं बार जब वह सचमुच ज़िंदगी की तरप़फ जा रही होती है, जब उसे अपनी मासूमियत और अपने प्रेम का कोई प्रतिबिंब और प्रतिरूप किसी सईद के भीतर नज़र आने लगता है तो वह ख़ुद अपना ख़ात्मा कर लेती है।...
क्या यह ‘दुख’ नामक बेटी की नियति है जिसका ज़िक्र सारा ने अपनी शायरी में किया है या सारा इस दुनिया में, जहां तमाम पुरुष उसे एक आसान शिकार की तरह देखते हैं, उसे हासिल करना चाहते हैं, लेकिन उसके भीतर किसी दुख, किसी विकलता, किसी स्वप्न को नहीं पहचान सकते, एक ऐसी दुनिया जिसमें प्रेम को पहचानने की संवेदना और मासूमियत नहीं बची है, और पति या प्रेमियों के द्वारा किए जा रहे बलात्कारों को ही प्रेम माना जाता है, अपने ख़ात्मे से कुछ सवाल छोड़े जा रही है, जो उसकी क़ब्र से भी उठते हुए आएंगे।

गुरुवार

बीकानेरी समाज, संस्कृति और परिवार के बड़े कैनवस का नाम है ‘इस शहर के लोग’ संदर्भ मानिक बच्छावत की नई कृति



पिछले वर्ष 2009 मे ‘पेड़ों का समय’ और अभी-अभी ‘इस शहर के लोग’ ने कविता जगत में मानिक दा की मिल्कियत को पुख्ता किया है। उम्र के इस मुकाम पर ‘जड़’ के प्रति उनका सम्मानपूर्वक स्नेह, प्रेम व उदगार अचानक नहीं फूटा है। फीजी, मारीशस और सुरीनाम सदृश्य देशों में फैले सभी सचेतन नागरिक अपने इतिहास से उतना ही जुड़ाव महसूस कर सकते हैं  जितना मानिक बच्छावत सहित हम। बाजारवाद और महानगरीय भागम भाग में देशज संवेदनाओं को बचाये रखने की जिजीविषा कि जैसे छिपा रहता है गन्ने में रस, मेंहदी में रंग और रेत में असंख्य जलस्रोत, कवि ने बीकानेरी माटी की सोंधी खुश्बू संग्रह की 45 कविताओं में उड़ेल दिया है - लूण जी बाबा, हसीना गूजर, तीजा बाई रोवणगारी, खुदाबक्स फोटोग्राफर, भूरजी छींपा, गपिया गीतांरी, तोलाराम डाकोत, मियां खेलार, जिया रंगारी, नत्थु पहलवान, जेठो जी कोचवान, जेसराज जी की कचैड़ियाँ, हमीदा चुनीगरनी जैसे अनेक पात्र, जो बीकानेर की यादों के साथ कवि के कवित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा बन ताउम्र जुड़े रहने को संकल्पित दिखते हैं। देखें बानगी - कविता ‘मेहतरानी’ -........ मेरी पत्नी आए दिन उसे/ कुछ न कुछ देती है/ कहती/ उसका कर्ज इस जन्म में/ नहीं चुकेगा/ राधारानी भी कहती/ अपना फर्ज निबाहेगी/ जब तक जिएगी/ बाईसा की हवेली पर आएगी। 
गोदना गोदने की कला में माहिर ‘नैणसी गोदारा’ के हुनर का किस तरह बाजारीकरण हुआ है, कवि मर्माहत हो लिखाता है - अब यह पेशा नैणसी से छूटकर/ ब्यूटी पार्लरों और फैशन की दुनिया में/ पहुँच गया/वह हजारों का खेल बन गया/ अब / यह प्राचीन गोदना कला से/ आर्ट आफ टैटूइंग होकर/अपना करिश्मा दिखा रहा है/ ऐसे में अब नैणसी कहाँ होगा ? बीकानेर की महान विरासत में जो साझी संस्कृति रही है उसकी मिसाल ‘पीरदान ठठेरा’ में दिख जाता है - पीरदान/ आधा हिंदू था आधा मुसलमान/वह ठठेरा कहता मैं/ इस बर्तनों की तरह हूँ जिनका/ कोई मजहब नहीं होता। वहाँ ‘हसीना गूजर’ बेरोक-टोक लोगों तक / दूध पहूँचायेगी/ कौमी एकता का गीत गायेगी। यहाँ कवि वर्तमान के जटिलतर रिश्तों के लिए गरिमायम आश्वस्ति प्रदान करता दिखता है। कवि अपने कोमल अनुभूतियों, स्मृतियों तथा बीकानेर के समाज संस्कृति और परिवार को बड़े कैनवस पर सजीवता से पेश कर ‘अपनी माटी’ (बीकानेर) को समर्पित कर उऋण होने का प्रयास किया है। मानिक बच्छावत देश के चर्चित कवि रहे हैं, इनकी कविताएं तमाम स्तरीय पत्रिकाआ में प्रकाशित होते रही है ‘इस शहर के लोग’ साहित्य जगत के लिए एक नायाब तोहफा है।

मानिक बच्छावत
समकालीन सृजन
20, बालमुकुंद मक्कर रोड
कोलकाता- 700 007
मोबाइल - 09830411118.
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मंगलवार

शीतल वाणीः शमशेर बहादुर सिंह स्मृति अंक



ज्ञेय, मुक्तिबोध और शमशेर शिल्प में एक अर्थ में जयशंकर प्रसाद के बहुत करीब हैं। तीनों ही जटिल संवेदनाओं के कवि हैं। तीनों की मित्रता भी अनायास नहीं है। तीनों की जटिलता तीन तरह की है। मुक्तिबोध मार्क्सवाद का सिद्धांत-कथन करते हैं। उनकी कविता में पैठ के लिए मार्क्सवाद का अध्ययन आधार बनता है। समाज और जीवन की समझ सहायक बनती है। बहुत बड़ा फलक है वहाँ। निजी चिंताओं को भी वह सामाजिक समस्या के बीच में रख कर पेश करते हैं। इसके विपरीत शमशेर अपने में डूबे हुए । प्रकृति उन्हें अपने अंदर ले जाती है। कवि का ‘मैं’ और उसकी कविता एक हो जाते हैं सब कुछ एक हो जाता है। अतीत की स्मृतियां, अपनी रचना प्रक्रिया, प्रकृति और अपनापन सब एकमएक हो जाते हैं। मुक्तिबोध बाहर जाते हैं, शमशेर अंदर। एक को रोशनी पसंद है दुसरे को अंधेरा। एक में समाज ही समाज, दूसरे में मैं ही मैं।
                                                                                                                                                - इब्बार रब्बी
शमशेर की कविता

धूप कोठरी के आइने में खड़ी

धूप कोठरी के आइने में खड़ी
हँस रही है

पारदर्शी धूप के पर्दे
मुस्कुराते 
मौन आँगन में

मोम-सा पीला
बहुत कोमल नभ

एक मधुमक्खी हिलाकर फूल को 
बहुत नन्हा फूल 
उड़ गई

आज बचपन का  
उदास मा का मुख
याद आता है।

शीतल वाणी
संपादक‘ डा. वीरेन्द्र ‘आज़म’
2 सी/175 पत्रकार लेन, प्रद्युमन नगर,
मल्हीपुर रोड, सहारनपुर, उ.प्र.
मोबाइलः 09412131404.  

पूनम सिंह की ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’



र्जन भर कहानियों  को खूबसूरत फ्रेम में जड़ कर समकालीन कथा-परिदृश्य को समृद्ध व गतिशील बनाते हुए कथा लेखिका पूनम सिंह की कथाएँ-
‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ संग्रह के रूप में  सामने आयी है। उन्होंने इस माध्यम से स्त्री-विमर्श पर एक नयी दृष्टि के साथ एक और सांकल खोलती है। अपनी कहानियों में वे जहाँ स्त्री-पुरूष के रिश्तों पर पुरूष की वर्चस्ववादी नजरिये को चुनौती देते दिखती है वहीं कहानी ‘कैंसर’ में स्त्री की व्यामोहिक महत्वाकांक्षी उड़ान से खंडित होते परिवार का चित्रण करती है। संग्रह की अधिकांश कहानियाँ भूमंडलीयकरण और बाजारवाद के यथार्थ से उत्पन्न ‘माल-कल्चर’ वाले ऐसे वर्ग की कहानियाँ है जहाँ, ‘प्रेम, सेक्स और धोखा’ के साथ भौतिकता का ताना बाना है, जो अक्सर संवेदनाओं में सूराख करती दिखती  है। गहन सूक्ष्मता संजोए संग्रह की तमाम कहानियों की भाषा में प्रवाह, सुदृढ़ शिल्प एवं फलक बहुरंगी हैं। औरत-मर्द के सम्बन्ध, पारिवारिक जीवन, ग्रामीण राजनीति जैसे विषयगत वैविध्यता का एक नया अध्याय खोलता है यह संग्रह। कहानियों की अन्तर्वस्तु इस समय और भावी समय की भयावहता की बारीकियों से विश्लेषण करते दिखती है।
कविता सहित कहानियों में समान दखल रखनेवाली पूनम की रचनाएँ - हंस, वसुधा, दोआबा, अक्षरा, वागर्थ’ वर्तमान साहित्य व जनमत सदृश्य पत्रिकाओं में सराही गयी हैं। ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ ’ कथा-जगत के लिए पूनम सिह का एक नायाब तोहफा है जिसका पुरजोर स्वागत किया जा सकता है...।

संपर्कः पूनम सिंह
प्राघ्यापकः हिन्दी विभाग,
एम.डी.डी.एम. कालेज, मुजफ्फरपुर, बिहार
मोबाइलः 09431281949.

शुक्रवार

जर्मन कवि हास्ट्र बिंगेल की एक कविता-


घटनास्थल

यह घटनास्थल
घृण्य है हम काफी कुछ मिलते हैं
बिल्लियों और कुत्तों से प्यार
बेजान सुबहें
एक आदमी मर जाता है
यहाँ
वे पेड़ लगाते हैं मौत
कोई विश्ष्टि व्यक्ति नहीं
कल स्कूल से छुट्टी हुई ही थी
एक लड़का गाड़ी के नीचे कुचला गया
पौन घंटे पड़ा रहा पटरी पर अगर मुझे
डर न होता कि कोई देख लेगा
मैं उसे कम्बल ओढ़ा आता ।

हास्ट्र बिंगेलः जन्म - 6.10.1933., हेस्सेन, फ्रेंकफुर्त्त में निवास, संपादन, कहानियाँ एवं कविता की कई पुस्तकें प्रकाशित।1965 में ‘फ्रांकफुर्त्त-साहित्य-गोष्ठी’ की स्थापना।
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