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शुक्रवार

युवा कवि राजकिशोर राजन को ‘जनकवि रामदेव भावुक स्मृति-सम्मान’

 कवि राजकिशोर राजन

पटना, युवा कवि राजकिशोर राजन को वर्ष 2011 का ‘जनकवि रामदेव भावुक स्मृति-सम्मान’ दिए जाने की घोषणा ‘रचना’ (एक साहित्यिक मंच) की ओर से स्थानीय केदार भवन, अमरनाथ रोड, पटना के कविवर कन्हैया कक्ष में की गई। संस्था के अध्यक्ष तथा वरिष्ठ साहित्यकार छंदराज ने कहा कि युवा कवि राजकिशोर राजन के अबतक तीन कविता-संग्रह छपे हैं। इन्हें पूर्व में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद सहित अन्य महत्वपूर्ण संस्थाओं ने भी सम्मानित किया है। राजभाषा विभाग, पूर्व मध्य रेल, हाजीपुर में कार्यरत राजकिशोर राजन की कविताओं में मनुष्य की पक्षधरता धारदार रूप से दिखाई देती है।
    पुरस्कार चयन समिति के सदस्यों में चर्चित कवि शहंशाह आलम तथा राज्यवर्द्धन भी थे।
राजन की कविताएं ‘वर्तमान साहित्य’ व ‘दस्तावेज’ के ताजे अंक में भी ...

मंगलवार

डॉ. देवसरे को साहित्‍य अकादेमी का बालसाहित्‍य पुरस्‍कार 2011


    हिन्‍दी में साहित्‍य अकादेमी का बालसाहित्‍य पुरस्‍कार 2011 वरिष्‍ठ बालसाहित्‍यकार डॉ. हरिकृष्‍ण देवसरे को उनके आजीवन योगदान के लिए आज उनके आवास (ब्रजविहार, गाजियाबाद) पर साहित्‍य अकादेमी के उपसचिव श्री ब्रजेन्‍द्र त्रिपाठी के हाथों प्रदान किया गया। पुरस्‍कार के अंतर्गत 50,000 रुपये की राशि का चेक और प्रतीक चिह्न शामिल हैं। इसके पहले उन्‍होंने पुष्‍पगुच्‍छ और शॉल ओढ़ाकर डॉ. देवसरे का अभिनंदन किया। उन्‍होंने प्रशस्‍ति-पाठ करते हुए डॉ. देवसरे के अमूल्‍य योगदान को रेखांकित किया। इस अवसर पर उनके पुत्र श्री शशांक, पुत्री श्रीमती शिप्रा, पत्‍नी श्रीमती विभा देवसरे तथा बालसाहित्‍य लेखक श्रीमती शांता ग्रोवर, श्रीमती मधुमालती जैन एवं देवेन्‍द्र कुमार देवेश (तीनों अकादेमी में कार्यरत) उपस्‍थित थे। ध्‍यातव्‍य है कि अकादेमी के बालसाहित्‍य पुरस्‍कार 24 भारतीय भाषाओं के लिए 14 नवंबर 2011 को अकादेमी के अध्‍यक्ष श्री सुनील गंगोपाध्‍याय के हाथों कोलकाता में समारोहपूर्वक प्रदान किए गए थे, जिसमें अपनी अस्‍वस्‍थता के कारण डॉ. देवसरे नहीं पहुँच पाए थे। पुरस्‍कार-प्राप्‍ित के बाद डॉ. देवसरे ने बालसाहित्‍य को प्रोत्‍साहित करने के लिए अकादेमी के प्रति आभार व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि साहित्‍येतिहास के लोग अभी तक बालसाहित्‍य को साहित्‍य के इतिहास में सम्‍मिलित नहीं कर पाए, लेकिन अब निश्‍चित रूप से यह माना जाएगा कि बालसाहित्‍य साहित्‍य की एक ऐसी विधा है, जो निरंतर उन्‍नति कर रही है और अब वह ऐसे स्‍तर पर पहुँच गई है कि उसको इतिहास में भी महत्‍व मिलना चाहिए और मिलेगा, अवश्‍य मिलेगा। इस दिशा में काम भी हो रहा है और अच्‍छी बात ये है कि जो दृष्‍टिकोण है साहित्‍य अकादेमी का, वह नया है, आधुनिक है और वह समसामयिक है। 
- देवेन्‍द्र कुमार देवेश
उपसंपादक
साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली, मो.- 09868456153

शुक्रवार

बहुमुखी प्रतिभा के बेचैन कवि हैं उद्भ्रांत- शहंशाह आलम

 ‘समकालीन साहित्य मंच’ मुंगेर के तत्वावधान में स्थानीय बदरुन मंजि़ल, गुलज़ार पोखर,  में वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत के सद्यः प्रकाशित कविता-संग्रह ‘अस्ति’ पर एक सारगर्भित विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता चर्चित शायर डा. अनिरुद्ध सिन्हा ने की तथा संचालन युवा कवि शहंशाह आलम ने किया। विषय प्रवर्तन करते हुए शहंशाह आलम ने कहा कि उद्भ्रांत बहुमुखी प्रतिभा के एक बेचैन कवि हैं। उनकी बेचैनी का मुख्य कारण समाज और उनके आस-पास की त्रासदियाँ हैं और इन त्रासदियों में उनकी रचनात्मकता छटपटाहट की शक्ल अखि़तयार करती नज़र आती है। ‘अस्ति’ की सारी कविताएँ इन्हीं त्रासदियों की अभिव्यक्ति के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत होती हैं। कवि के हृदय में विद्रोह की आग है, वह आग जब पाठक आत्मसात करता है तब स्वतः ही उसके समक्ष अपने समाज और देश का एक नया क्षितिज उद्घाटित होता है। स्पष्ट है कि कवि ने अपनी कविताओं में सिर्फ़ विद्रोह के रूप में विध्वंस को ही निमंत्रित नहीं किया है, बल्कि प्रगतिशीलता की डोर पकड़कर बेहतर भविष्य की कल्पना भी की है। संगोष्ठी के अध्यक्ष डा. अनिरुद्ध सिन्हा ने कहा कि ‘अस्ति’ की कविताओं के सुर हमें ख़ामोशी की दलदल की ओर नहीं ले जाते हैं, बल्कि हमें उठ खड़े होने तथा समाज की बेहतरी के लिए कुछ कर गुज़रने को विवश करते हैं। कवि उद्भ्रांत की कविताएँ सामाजिक परिप्रेक्ष्य की कसौटी पर खरी उतरती हैं। इसके साथ ही, कविताओं की सार्थकता उस समय और अधिक हो जाती है जब वे हमें स्वयं को और गहराई से पढ़ने के लिए विवश कर देती हैं। हिन्दी कविता के समक्ष जो पठनीयता का संकट है, ‘अस्ति’ की कविताएँ उसका प्रतिवाद करती हैं। यह कवि की सफलता है जिसमें अभिव्यक्ति और पठनीयता साथ-साथ चलती है। हिन्दी ग़ज़ल के समर्थ ग़ज़लकार अशोक आलोक ने कहा कि हिन्दी कविता कथ्य और बड़े कैनवस के लिए जानी जाती है। समकालीन कोई भी समर्थ कवि घटनाओं के घटने से पूर्व ही उसका आभास पाठकों को कराते हुए अपने यथासंभव विरोध की उपस्थिति दर्ज़ करवा देता है। इस दृष्टि से ‘अस्ति’ की कविताएँ हमें उद्भ्रांत की प्रगतिशीलता से आश्वस्त करवाती हैं। 
     उर्दू के समर्थ रचनाकार प्रो. इमाम अनीस ने ‘अस्ति’ की कविताओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि हिन्दी और उर्दू में समकालीन विचारधाराओं का एक मज़बूत स्वर सुनाई दे रहा है। उस स्वर में हम अपने जीवन की कई झाँकियों की व्याख्या सुनते हैं। कवि उद्भ्रांत की कविताओं में आगत के स्वर तो हैं ही, साथ ही सकारात्मक वैचारिक सोच की अभिव्यक्ति भी है। युवा ग़ज़लकार विकास ने कहा कि उद्भ्रांत की कविताओं में समकालीन विद्रूपताओं का रुदन ही नहीं है, एक बेहतर भविष्य की कल्पना भी है। इससे स्पष्ट होता है कि कवि आग पर चलते हुए शीतलता की खोज में गतिमान हैं। इससे आने वाली पीढ़ी उनकी इस रचनात्मकता से लाभ उठाएगी।
इसके अतिरिक्त समाजकर्मी हबीब-उर-रहमान, युवा कवयित्री यशस्वी, युवा कवि समीर कुमार, धीरज कुमार आदि ने भी ‘अस्ति’ पर अपने-अपने विचार प्रकट किए।

                                                                            -अनिरुद्ध सिन्हा
                                                                           

बुधवार

बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का 14 वाँ राज्य सम्मेलन ... जुटेंगे साहित्यकार ।




बिहार प्रगतिशील लेखक संघ की पूर्णिया इकाई के प्रस्ताव पर दिनांक 11 एवं 12 फरवरी (रविवार) को बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का 14 वाँ राज्य सम्मेलन पूर्णिया में संयोजित होने जा रहा है। जिसमें प्रलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. नामवर सिंह, डा. खगेन्द्र ठाकुर, महासचिव प्रो. अली जावेद, समालोचक- चौथीराम यादव सहित अन्य प्रतिष्ठित साहित्यकार भाग लेंगे। 
इस प्रान्तीय सम्मेलन की रूपरेखा निर्धारित करने हेतु राज्य कार्यसमिति की एक आवश्यक बैठक दिनांक - 11 दिसम्बर 2011. रविवार को 12 बजे से प्रान्तीय कार्यालय - केदार भवन (जनशक्ति परिसर, अमरनाथ रोड, पटना -1) में होगी। आप सादर आमंत्रित हैं।
संपर्क: महासचिव (बिहार प्रलेस) मो.- 09471456304.


मंगलवार

साझे सपनों को साकार करता ‘दोआबा’ का यह अंक


'दोआबा' अंक - 10 अपने आकर्षक कलेवर और संपादक के रूचिकर रचना-चयन जैसे श्रमसाध्य अनुष्ठान का प्रतिफल है। यही कारण है कि दोआबा अपनी उपादेयता को मूल्यवान बनाने के साथ-साथ यह साहित्य जगत की अनिवार्य पत्रिका भी बन जाती है।
    'दोआबा' के इस अंक में सुचयनित कविता एवं कहानियों में सिएथल, मीरा कुमार, स्नेहमयी चैधरी, सोनिया सिरसाट, राजेन्द्र नागदेव, राजकुमार कुम्भज, रामकुमार आत्रेय, सुशील कुमार, अशोक गुप्त, भारत भूषण आर्य और ज्ञानप्रकाश विवेक सम्मलित हैं। मीरा कांत का एकल नाटक- गली दुल्हनवाली, आत्मगत में मधुरेश और मनमोहन सरल का आलेख - भारत की आत्मा के चितेरे थे हुसेन के साथ संवेदना व वैचारिकता से पूर्ण संपादक जाबिर हुसेन के संपादकीय- ... मैं तुम्हारे शहर आऊँगा, सोहा, फिर आऊँगा... गहन सूक्ष्मता संजोए यथार्थ व संवेदनाओं का खूबसूरत कोलाज है।
    इस अंक में प्रकाशित मीरा कुमार की कविता ‘साझा सपने’ की एक बानगी-
    है तुम्हारी पलकों पर इन्द्रधनुष
    उसके रंग मेरी आंखों में तैर रहे
    तुममें और मुझमें
    ये सपनों की कैसी साझेदारी है

    ...........
    ........            - अध्यक्ष, लोक सभा, नई दिल्ली।

दोआबा / संपादकः जाबिर हुसेन
सी-703, स्वर्ण जयंती सदन, डा बी डी मार्ग, नई दिल्ली 110 001.
मोबाइल- 09868181042.

शनिवार

जन - बातों को समग्रता से समेटने की सार्थक पहल है ‘प्रसंग’ का संस्मरण अंक


‘प्रसंग’ के इस अंक में प्रतिष्ठित लेखकों ने विभिन्न तरह की स्मृतियों को रचनात्मक वाणी दी है। शताब्दी पूरा करने वाले अपने दिवंगत महान रचनाकारों  में राधाकृष्ण, उपन्द्रनाथ अश्क, शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, फादर कामिल बुल्के और तेलगु के महाकवि श्री श्री के रचनात्मक व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत किया गया है। अंक में गोपाल सिंह नेपाली और फैज अहमद फैज़ की कविताए हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर की डेढ़ सौवीं जयन्ती के अवसर पर उनकी अति विशिष्ट कविता का शब्दान्तर प्रस्तुत है। साहित्य को नयी दृष्टि और दिशा देने वाले त्रिलोचन, अज्ञेय, राजकमल चैधरी, गोरख पाण्डेय, महेश्वर, भवानी प्रसाद मिश्र, कुँवरपाल सिंह और मार्कण्डेय जैसे कई शख्सियतों का मूल्यांकन एवं संस्मरण साहित्य पर आलेख हैं साथ ही मरुधर मृदंल, विजय बहादुर सिंह और वीर भारत तलवार से समकालीन रचनाधर्मिता पर बातचीत से अंक समृद्ध है। प्रसंग, पृ. 418. मूल्य- 50/ संपादक- शम्भू बादल, सूरज-घर, जबरा रोड, कोर्रा, हजारीबाग- 825301. झारखंड, मोबाइल- 09931182570.

उदय प्रकाश की रचनात्मकता पर केन्द्रित ’शीतल वाणी’ का अगला अंक... रचनाएं आमंत्रित।


बहुचर्चित कवि, कहानीकार और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित श्री उदय प्रकाश की षष्ठीपूर्ति  के अवसर पर ‘शीतल वाणी’ का अगला अंक केन्द्रित होगा। इस अंक हेतु उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित रचनाएं आमंत्रित-


मंगलवार

कमला प्रसाद ने कहा था - साहित्य कला का मूल प्रायोजन उदात्त और सुसंस्कृत समाज की रचना है।

कमला प्रसाद के साथ अरविन्द श्रीवास्तव

बाजार में क्या नहीं है? बाजार में सब है, धन है, कीर्ति, धर्म-कर्म, अर्थ- काम, मोक्ष सब है। ऐसे में साहित्य क्या कर सकता है। निश्चय ही संवेदना की रक्षा विखण्डन में से संश्लेषणात्मक विचारों और भावों के नये रचनात्मक रूपाकारों को मानवीय गरिमा प्रदान करना उसका लक्ष्य रहा है। इसी उद्देश की प्रतिबद्धता उसे लाभ-लोभ से बाहर रखने का दबाव देती थी। रचनाकार को विपक्ष में होने को मजबूर करती थी। मार्क्स के शब्दों में कहें ‘पूंजीवाद युग में साहित्य को साहित्य मात्र बने रहने और कला को कला बने रहने के लिए पूंजीवाद का विरोध करना पड़ता है।’ मार्क्स ने सौन्दर्यशास्त्र पर कोई स्वतंत्र पुस्तक नहीं लिखी पर व्यक्ति, समाज, जीवन, सृष्टि और प्रकृति के सार्वभौमिक स्वरूप पर विचार करते हुए इस अपरिहार्य मानवीय कर्म की व्याख्या की है। उन्होंने लेखकों को आगाह किया है कि वे रचनाकर्म को लोभ का साधन न बनाएं। यह काम जिन्दा रहने की जरूरतों के लिए नहीं है। साहित्य कला में मूलतः रचनाकार का इंद्रियबोध-भावबोध व्यक्त होता है जिसमें मनुष्य स्वतंत्र होकर अपने पैरों पर खड़ा हो सके। इन्द्रियों को निर्बन्ध बना सके, विचारों का मानवीयकरण-समाजीकरण हो सके और मनुष्यता के दायरे में कृत्रिम रूप से निर्मित विभेदों की समाप्ति हो सके। साहित्य कला का मूल प्रायोजन उदात्त और सुसंस्कृत समाज की रचना है। मनुष्य को अपनी मनुष्यता इन्हीं रूपाकारों में अर्जित कर विकसित करनी पड़ती है। - बिहार प्रलेस संवाद

शुक्रवार

राजेन्द्र यादव की दिक्कत यह है कि वे गंभीर बातों के कारण चर्चा में रहना नहीं चाहते ... ‘एक और अन्तरीप’ में हेतु भारद्वाज ।


राजस्थान की साहित्यिक परंपरा में ‘एक और अन्तरीप’ (संपादक- डा. अजय अनुरागी एवं डा. रजनीश संपर्क- 1.न्यू कालोनी, झोटवाड़ा, पंखा, जयपुर- 302012. राज., मोबाइल- 09468791896) का लंबे अंतराल के बाद साहित्य जगत में सुखद व साथर्क हस्तक्षेप हुआ। पत्रिका के प्रधान संपादक प्रेमकृष्ण शर्मा का मानना है कि लधु पत्रिका निकालना या साहित्य रचना करना कोई विलासिता नहीं है, बल्कि अपने रक्त से उस हथियार को निर्माण करना है जो मानव-मुक्ति की लड़ाई में कारगर होकर मानव को शोषण चक्र से मुक्त करेगा। ‘एक और अन्तरीप’ उन्हीं लोगों के साथ है जो मानव मुक्ति के संग्राम में सक्रिय रहे हैं...। अंक में ‘जटिल समय के सहज कविः गोविन्द माथुर’ शीर्षक से संपादक अजय अनुरागी ने कवि गोविन्द माथुर के कविता कर्म का सहृदयता से मूल्यांकण किया है, उनका मानना है कि गोविन्द माथुर की कविताएँ दुरूहताओं और भयावहताओं से परे है। इन्हें पढ़ने के लिए अतिरिक्त तैयारी या विशेष मानसिक योग्यता की जरूरत नही है। ये कविताएँ हलचल रहित शालीन शैली में लिखी गई है। गोविन्द माथुर की कविताओं की गंभीरता व समय की विद्रुपता पर व्यंग्य को मुक्तस़र में देखें-
कौन पूछता है कवियों को /अच्छे पद पर हों तो बात और है।
एक और बानगी
‘हम उन्हें कवि नहीं मानते / क्योंकि वे हमारे गुट में नहीं है।’
गोविन्द माथुर युवा कवियों के आचरण को भी गहराई में जाकर झकझोरते हैं -
युवा कवि होने के लिए/लबादे की तरह विद्रोह ओढ़े रहना चाहिए/सुविधा भोगते हुए भी/हमेशा असन्तुष्ट और नाराज दिखते रहना चाहिए/हर समय होठों पर/टिकाए रखना चाहिए किंग साइज सिगरेट/हर शाम शराब पीते हुए/अपने वरिष्ठ कवियों को गाली देते रहना चाहिए।
गोविन्द माथुर की कविताएँ अपने कथ्य व शिल्प की जहजता के साथ पाठकों को उद्वेलित करती हैं। अंक में वरिष्ठ साहित्यकार हेतु भारद्वज से डा. नरेन्द्र इष्टवाल से बातचीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इधर साहित्य में चले विभिन्न विमर्शों यथा- स्त्री, दलित जैसे मुद्दों पर हेतु भारद्वाज ने खुल कर विचार व्यक्त किए हैं। राजेन्द्र यादव के स्टैण्ड को व्यख्यायित करते हुए वे कहते हैं - ‘राजेन्द्र यादव की दिक्कत यह है कि वे गंभीर बातों के कारण चर्चा में रहना नहीं चाहते बल्कि हल्की बातों को लेकर चर्चा में बने रहने का प्रयास करते हैं। उन्होंने प्रयास यही किया कि वे ‘हंस’ को अपने नेतृत्व के लिए इस्तमाल करें और उन्होंने स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के झण्डे बुलन्द किए। उन्होंने स्त्री और दलित को पूरे समाज से अलग करके देखा। उसका नतीजा यह हुआ कि दलित विमर्श उनकी साहित्यिक राजनीति का हिस्सा बन गया और स्त्री विमर्श उनका व्यक्तिगत मामला।’ अंक में कवि शताब्दी के अंतर्गत फैज अहमद फैज की जन्मशती वर्ष पर रामनिहाल गुंजन का आलेख - जब तख्त गिराये जाएँगे,जब ताज उछाले जायेंगे’ रोचकता से पूर्ण है। चार कहानियाँ सहित कविता की एक मुकम्मल दुनिया अंक की सार्थकाता पर मुहर लगाती है। विमर्श में डा. रंजना जायसवाल का आलेख ‘सैक्स का पाखण्ड’ कई मिथकों को खारिज करती है। रंजना का मानना है कि -सेक्स शिक्षा इसलिए जरूरी है कि सेक्स के मनोविज्ञानिक पहलू को भी समझा जा सके वरना सेक्स का सेंसेक्स कभी भी इतना गिर सकता है कि स्त्री-पुरुष का स्वभाविक प्रेम खत्म हो जाएगा। ‘एक और अन्तरीप’ का सिलसिला आगे भी चलता रहे ऐसी सुखद कामना की जाय।

सोमवार

गीतांजलि के हिन्‍दी अनुवाद : रेवती रमण



विश्‍वकवि गुरुदेव रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर की एक सौ पचासवीं जयंती के अवसर पर अनेक आयोजन हुए हैं। भारत की सभी प्रमुख भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं में उनके जीवन और साहित्‍य से संबद्ध लेख आदि प्रकाशित हुए हैं। उनकी रचनाओं के अनुवाद तो उन्‍नीसवीं सदी क अंतिम दशक में ही प्रकाशित होने लगे थे। डॉ. देवेन्‍द्र कुमार देवेश की पुस्‍तक ‘गीतांजलि के हिन्‍दी अनुवाद’ को इसी परिप्रेक्ष्‍य में एक हिन्‍दी कवि-लेखक का अनोखा उपहार समझना चाहिए। इससे बेहतर विश्‍वकवि को दी गई कोई श्रद्धांजलि नहीं हो सकती। देवेश की यह किताब इसलिए भी खास तौर पर पठनीय है कि इससे अनेक भ्रमों को निवारण होता है। कम लोग जानते हैं कि पुरस्‍कृत ‘गीतांजलि’ की अंग्रेजी रचनाऍं गद्यात्‍मक हैं, पद्यात्‍मक नहीं। उनका प्रभाव भले काव्‍यात्‍मक हो। एक बड़ा भ्रम यह है कि बांग्‍ला ‘गीतांजलि’ के अनुवादक डब्‍ल्‍यू. बी. येट्स हैं। इस भ्रम को प्रचारित करने में कुछ पश्‍चिमी लेखकों की भी विवादास्‍पद भूमिका है। इस विडंबना से हिन्‍दी के लेखक भी नहीं बचे। मसलन गजानन माधव मुक्‍तिबोध ने अपनी प्रतिबंधित कृति ‘भारत : इतिहास और संस्‍कृति’ में लिखा है, ‘’आयरलैण्‍ड के विश्‍वविख्‍यात कवि डब्‍ल्‍यू. बी; येट्स ने उनकी (रवीन्‍द्रनाथ की) गीतांजलि का अंग्रेजी में अनुवाद किया।‘’ यही बात अमृतलाल नागर और त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी ने भी शब्‍द-भेद से कही। देवेश ने गहरी छानबीन के उपरांत स्‍पष्‍ट कर दिया है कि अंग्रेजी गीतांजलि विश्‍वकवि की स्‍व-रचित सामग्री है। उन्‍होंने शब्‍द गिनकर दिखाया है। मुश्‍किल से तीस-पैंतीस ऐसे शब्‍द हैं, जो येट्स के संशोधन के साक्ष्‍य देते हैं। येट्स के साथ ऐण्‍ड्रूज का नाम भी इस परिप्रेक्ष्‍य में लिया जाता है। लेकिन देवेश ने इस भ्रांति को भी निर्मूल सिद्ध किया है। प्रस्‍तुत शोधालोचना का मुख्‍य प्रतिपाद्य ‘गीतांजलि’ के हिन्‍दी अनुवादों से संबद्ध है। इसके लिए दो पूरे अध्‍याय हैं। पद्यात्‍मक और गद्यात्‍मक अनुवादों के विवेचन-विश्‍लेषण के लिए अलग-अलग अध्‍याय। भिन्‍न अनुवादकों की रचनाओं को आमने-सामने रखकर सतर्क और सटीक विवेचन प्रभावित करता है। ‘गीतांजलि’ का हिन्‍दी में पहले देवनागरी लिप्‍यंतरण हुआ, अगले वर्ष 1915 में काशीनाथ जी ने उसका गद्यानुवाद किया। हिन्‍दी से पहले डेनिश, स्‍वीडिश और रूसी में। देवेश ने अपने अध्‍ययन के लिए अनुवादों की चार कोटियॉं बनाई हैं : 1) देवनागरी लिप्‍यंतर, 2) गद्यानुवाद, 3) पद्यानुवाद, और 4) व्‍याख्‍यानुवाद। हिन्‍दी में पहला छंदोबद्ध पद्यानुवाद द्विवेदीयुग के गिरधर शर्मा ‘नवरत्‍न’ ने किया। इस प्रबंध-कार्य में देवेश ने कितना श्रम किया है, यह समझने के लिए इसके दो बड़े अध्‍याय ही पर्याप्‍त है—गद्यानुवाद और पद्यानुवाद के। स्रोत और लक्ष्‍य भाषाओं की प्रकृति को समझते हुए, हर पंक्‍ति का विशद विवेचन। बल्‍कि इसका परिशिष्‍ट भी अत्‍यंत उपयोगी है। ‘गीतांजलि’ के अनुवादकों का संक्षिप्‍त परिचय देकर उन्‍होंने अनुवाद-कर्म की गरिमा बढ़ाई है। उपलब्‍ध अनुवादों की मीमांसा में उनकी उपलब्‍धियों और सीमाओं का स्‍पष्‍ट उल्‍लेख हुआ है तो अगले अनुवादकों की चुनौतियॉं भी उजागर हुई हैं।

समीक्षित पुस्‍तक – गीतांजलि के हिन्‍दी अनुवाद, लेखक – देवेन्‍द्र कुमार देवेश प्रथम संस्‍करण – 2011, मूल्‍य – 295 रुपये, पृष्‍ठ – 220 (सजिल्‍द) प्रकाशक – विजया बुक्‍स, 1/10753, सुभाष पार्क, गली नं. 8, नवीन शाहदरा, दिल्‍ली, मोबाइल : 9910189445 (राजीव शर्मा)

(प्रख्‍यात आलोचक डॉ. रेवती रमण, मो. 09006885907, की विस्‍तृत समीक्षा ‘समकालीन भारतीय साहित्‍य’, मई-जून 2011 के अंक में प्रकाशित हुई है। यहॉं उसी का अंश प्रस्‍तुत किया गया है।)


गुरुवार

मेहनतकशों के पक्ष में लिखी जा रही हैं कविताएं - शंकर, संपादक-’परिकथा’


      काव्य-यात्रा  : 04 सितंबर , 2011

जमशेदपुर वीमेंस कॉलेज के सभागार में प्रगतिशील लेखक संघ और  ‘परिकथा ‘ के तत्वावधान में काव्य –विमर्श और काव्य–पाठ का एक विशिष्ट कार्यक्रम आयोजित किया गया | नगर के साहित्य –प्रेमियों का कहना है कि पिछले दो दशकों के अंतराल में इस लौह – नगरी में इस स्तर का अनूठा कार्यक्रम सम्पन्न नहीं हुआ था | बड़ी बात यह है कि बाजारवाद के इस आंधी दौड़ मे व्यस्त नगर के शिरकत करने वाले लोगों में लगभग 150 आगंतुक साहित्य से सरोकार रखने वाले थे और सब के सब  कार्यक्रम के अंत तक सभागार में मन से बने रहे | उनके चहरे पर खुशी की कौंध थी और उन्होंने   कार्यक्रम के आयोजकों के प्रति इसके लिए तहेदिल से आभारी व्यक्त किया | यही नहीं , कई टी.वी. चैनलों और प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों के संपादक और संवाददाता भी अंत तक वहाँ जमे रहे |  उक्त कार्यक्रम में प्रगतिशील लेखक संघ के उपाध्यक्ष और प्रतिष्ठित समालोचक श्री डा. खगेन्द्र ठाकुर (पटना ) और वरिष्ठ लोकधर्मी कवि शंभु बादल के अतिरिक्त चर्चित साहित्यकार रणेन्द्र , युवा कवि शहंशाह आलम (पटना)  , कहानीकार अभय (सासाराम ), पंकज मित्र ( रांची),   अशोक सिंह (दुमका ) , अरविंद श्रीवास्तव (मधेपुरा ,बिहार ) और सुशील कुमार ( दुमका) विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित हुए थे | नगर के गणमान्य साहित्यकार और  “परिकथा” के संपादक शंकर , कथाकार जयनंदन और कमल , शायर अहमद बद्र और मंजर कलींम, कवयित्री ज्योत्सना अस्थाना के साथ संध्या सिन्हा , गीता नूर, उदय प्रताप हयात, मुकेश रंजन और शशि कुमार भी मौजूद थे |    पूरा कार्यक्रम दो सत्रों में संयोजित था | प्रथम सत्र 3.30 बजे अपराहन से आरंभ हुआ जो कवि सुशील कुमार की कविताओं का संग्रह ‘तुम्हारे शब्दों से अलग ‘ के काव्य-विमर्श पर केन्द्रित था और दूसरा सत्र (जो 6.00 बजे अप. से प्रारम्भ हुआ ) अतिथि-साहित्यकार और  नगर के चुनिंदों कवियों के काव्य-संध्या का |                   
  कार्यक्रम का शुभारंभ चर्चित युवा कवि और अनुवादक ( चर्चित काव्य संग्रह ‘नगाड़े की तरह बजते शब्द’ –निर्मला पुतुल ) के काव्य-विमर्श से हुआ जिन्होंने कहा कि सुशील कुमार का काव्य –संग्रह ‘तुम्हारे शब्दों से अलग ‘ बाजार के बढ़ते आतंक और शब्दों की बाजीगरी करते शब्द तशकरों के खिलाफ एक वैचारिक जंग का एलान है | इस संग्रह की कविताओं में न तो किसी बौद्धिक अभेद्यता का आतंक है और न ही किसी कौशल को चमत्कृत कर देने का उपक्रम और न ही अनुभवों को सरलीकरण करने वाली भावुकता | दूसरे वक्ता कवि अरविन्द श्रीवास्तव ने बताया कि  सांस्कृतिक बंजरपन के विरुद्ध उंम्मीद की कुछ कोमल –मुलायम पंक्तियों के साथ सुशील कुमार की प्रस्तुत संग्रह की कवितायें समय की आहट को बखूबी पहचानती है | युवा  कवि शहंशाह आलम ने रचनाओं को आम आदमी के काफी निकट बताया जिसमें सामाजिक चेतना का स्वर मुखर है जबकि वरिष्ठ लोकधर्मी कवि शंभु बादल ने कविता-पुस्तक को जन प्रगतिशील विचार का प्रतिबद्ध वैचारिक दस्तावेज़ कहा | शंकर ने सूक्ष्मता से संग्रह की कविताओं की चर्चा कराते हुए उसे जन-भावनाओं से ओत–प्रोत  और जीवन में आशा जगाने वाली बताया उन्होंने मेहनतकशों के पक्ष में लिखी जा रही कविताओं पर भी प्रकाश डाला | कथाकार जयनंदन ने इसे आदिवासी जन –जीवन की गाथा कहकर इसकी सराहना की और अहमद बद्र ने पुस्तक के आमुख पर विस्तार से प्रकाश डाला | प्रथम सत्र के अध्यक्षीय संभाषण में सुशील कुमार की कविताओं की रचना –प्रक्रिया पर बारीकी से चर्चा कर इसे संप्रति लिखी जा रही कविताओं की कड़ी में राजनीतीक चेतना का महत्वपूर्ण काव्य –संग्रह कहा और उसके संभावनाओं पर विमर्श करते हुए ऐसे ही लिखते रहने की कामना की  | दूसरे सत्र में सभी मंचासीन अतिथियों और नगर के प्रमुख कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ कर श्रोताओं को सम्मोहित कर लिया | शहर के जाने –माने व्यक्तित्व मार्क्सवादी साहित्यकार शशि कुमार धन्यवाद–ज्ञापन से कार्यक्रम का समापन हुआ |

शनिवार

जमशेदपुर में प्रगतिशील लेखक संघ और साहित्यिक पत्रिका ‘परिकथा’ द्वारा संयोजित काव्य विमर्श और काव्य-पाठ










      
 आमंत्रण                                                               


  






 मान्यवर,
    4 सितम्बर,2011 को अपराह्न 3 बजे जमशेदपुर वीमेन्स कालेज  (Faculty of Education) के हाल में काव्य-विमर्श और काव्य-पाठ का एक विशिष्ठ कार्यक्रम संयोजित है
    उक्त कार्यक्रम में सर्वश्री डा. खगेन्द्र ठाकुर, अरुण कमल, डा. शंभु बादल, अभय, शहंशाह आलम, अशोक सिंह और अरविन्द श्रीवास्तव विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे
    कार्यक्रम में आपकी उपस्थिति सादर प्रार्थित है।
                                                            निवेदक
                                                               शंकर
                                                        संपादक: परिकथा


अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान एवं पद्मानंद साहित्य सम्मान 2011 पर ज़ारी स्मारिका।


लेखक आत्मा के कॊफी हाउस का परिचारक ही होता है - विकास कुमार झा 

इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट के मुख्य न्यासी तेजेन्द्र शर्मा के लंदन में आप्रवासी भारतीय के रूप में बस जाने के बाद कथा यू के के बैनर तले यह संस्था कार्य करने लगी। कथा यू के यूनाइटेड में बसे दक्षिण एशियाई मूल के लेखकों के समूदाय की संस्था है और भारत के मुंबई शहर से जुड़ी साहित्यिक, सामाजिक संस्था इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट इसकी मूल इकाई है। नई शताब्दी यानि 2000 से इंदु शर्मा कथा सम्मान को अंतराष्ट्रीय स्वरूप दिया गया साथ ही उम्र सीमा हटा दी गई तथा उपन्यास विधा को भी सम्मान हेतु शामिल किया गया। भारत से आनेवाले सम्मानित लेखक को भारत-लंदन/लंदन-भारत का हवाई जहाज का टिकट, लंदन में एक सप्ताह रहने व आसपास के दर्शनीय स्थानों का भ्रमण करवाया जाता है। अब तक यह अंतराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान चित्रा मुद्गल, संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, विभूतिनारायण राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असगर वजाहत, महुआ माजी, नासिरा शर्मा, भगवानदास मोरवाल और विकास कुमार झा को प्रदान किया जा चुका है।
    इंग्लैण्ड के हिन्दी साहित्यकारों को सम्मानित करने हेतु पद्मानंद साहित्य सम्मान पाने वालों में डाक्टर सत्येन्द्र श्रीवास्तव, दिव्या माथूर, नरेश भारतीय, भारतेन्दु विमल, अचला शर्मा, उषा राजे सक्सेना, गोविन्द शर्मा, गौतम सचदेव, उषा वर्मा, मोहन दवेसर दीपक, कादम्बरी मेहरा और नीना पाल को प्रदान किया जा चुका है।
    लंदन में आयोजित इस सम्मान समारोह में भारत के उच्चायुक्त श्री नलिन सूरी ने ब्रिटिश संसद के हाउस आफ कामन्स में हिन्दी लेखक विकास कुमार झा को उनके कथा उपन्यास ‘मैकलुस्कीगंज’ के लिए ‘सतरहवां अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान’ तथा लेस्टर निवासी ब्रिटिश हिन्दी लेखिका श्रीमती नीना पॊल को बारहवां पद्मानंद साहित्य सम्मान प्रदान करते हुए कहा कि ‘ हिन्दी अब आहिस्ता-आहिस्ता विश्व भाषा का रूप ग्रहण कर रही है। बाजार को इस बात की खबर लग चुकी है कि यदि भारत में पांव जमाने हैं तो हिन्दी का ज्ञान जरूरी है।
विकास कुमार झा ने कहा कि ‘एक कवि या लेखक आत्मा के कॊफी हाउस  का परिचारक ही होता है। आत्मा के अदृश्य कॊफी हाउस का मैं एक अनुशासित वेटर (परिचारक) हूँ और अगला आदेश लेने के लिए प्रतीक्षा में हूँ।’ अपने उपन्यास पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा- ‘मैकलुस्कीगंज’ मेरे लिए जागी आंखों का सपना है।’ .....
यह महज संयोग ही है कि जिस वक्त इस स्मारिका का पैकेट विकास दा को मिला, मैं उनके साथ आवास पर था और उनके हाथों से इस स्मारिका को पाने वाला मैं (अरविन्द श्रीवास्तव) पहला व्यक्ति बना !! विकास कुमार झा को पुनः बधाई, अशेष शुभकामनाएं। 



सोमवार

‘अघोषित युद्ध की भूमिका’ से अजित कुमार आजाद की दो कविताएँ

 मैथिली कविता में नव्यतम पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले अजित कुमार आजाद  की कविताओं का बहुरंगी फलक समकालीन काव्य परिदृश्य में नवीनता का अहसास कराती है। इनकी कविताएँ समय से सीधा-सीधा संवाद और मुठभेड़ करती है। मैथिली कविता संग्रह ‘युद्धक विराधमे बुद्धक प्रतिहिंसा’ का हिन्दी अनुवाद ‘अघोषित युद्ध की भूमिका’ इनकी महत्वपूर्ण कृति आयी है। अजित की दो कविताएँ मित्रों के लिए:
पृथ्वी की कोख में सुरक्षित है भ्रूण 

सुरक्षित है पृथ्वी की कोख में भ्रूण
जन्म देने के लिए जगह
सुरक्षित है अभी भी
कास की फुनगी पर आस की हरियाली
सूर्य के चारों ओर नाचती है पृथ्वी
पृथ्वी के चारों ओर प्रक्षेपास्त्र
मनुष्य ने किया प्रत्यारोपित
पृथ्वी की कोख में बारूद
बावजूद इसके
सुरक्षित है नींद में सोये बच्चे का भविष्य
और स्वप्न देखने का उसका अधिकार

धरती का ताप बढ़ता जा रहा
अबाह-घबाह पैरों से नापता है इतिहास
जबकि लिप्त हैं लोग
भ्रूण हत्या के आदिम षड्यंत्र में
अपनी सम्पूर्ण आस्था के साथ रखा है सुरक्षित
नवसृष्टि का भ्रूण पृथ्वी ने अपनी कोख में...

अखबार में प्रेम

एक सनसनीखेज समाचार की
सभी शर्तें पूरा करने के बावजूद
प्रथम पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक
भटकता रह जाता है प्रेम

महानगर के पृष्ठ पर
कभी-कभी झाँकने वाला प्रेम
अंचल के पृष्ठों पर घिसटते हुए
बलात्कार के खबर में बदलकर
अर्थ-व्यापार के पन्ने में गायब हो जाता है

खेल पृष्ठ पर खिलवाड़-सा लगता है प्रेम
एक विज्ञापनी मुद्रा से बढ़कर
और कुछ भी नहीं
अखबार को बाजार दिलाती है प्रेम
लेकिन प्रेम को थोड़ी भी जगह
नहीं देता अखबार

प्रेम यदि आ भी जाए
समाचार डेस्क तक
तो संपादक से
बिना बलत्कृत हुए नहीं छपता है
आश्चर्य कि
अखबार भी तभी बिकता है...!
संपर्कः 21, एम.आई.जी., हनुमान नगर, पटना-20
मोबाइल- 09234942661.

मंगलवार

वन्दना राग को पहला कृष्ण प्रताप कथा सम्मान / केदार सम्मान वर्ष 2011 हेतु प्रविष्टियां आमंत्रित


       समकालीन हिन्दी  कहानी के चर्चित कथाकार कृष्ण प्रताप की स्मृति में वर्ष 2010 का  कृष्ण प्रताप कथा सम्मान  युवा एवं चर्चित कहानी कार वन्दना राग को पहला कृष्ण प्रताप  कथा सम्मान उनके वर्ष 2010 में प्रकाशित  प्रथम कहानी संग्रह यूटोपिया को प्रदान किया जाता है । यह निर्णय श्री विभूति नारायण राय, ममता कालिया एवं श्री दिनेश कुमार शुक्ल निर्णायक समिति के सदस्यों के व्दारा लिया गया । यह कथा सम्मान आगामी  अक्टूबर माह में  प्रदान किया जायेगा जिसमें कथाकार को 11000/- ग्यारह हजार की धनराशि ,प्रशस्ति पत्र ,पदक एवं शाल आदि भेंट किये जायेंगे । निर्णय की प्रशस्ति में कहा गया है कि युटोपिया की कहानियों  में कहानी के स्थापित ढ़ाचों  को तोड़ कर  कहानी कार  ने अपनी  कहानियों के लिए रचना की नई जमीन तैयार की है । बन्दना की कहानियों की संवेदना दृष्टि अति सूक्ष्म होने के साथ - साथ दृष्टि प्रदान करती है । जो भीतर तक जाकर टोहती है। इन कहांनियों में बन्दनाराग कुशल किस्सागो नजर आती हैं।

समकालीन हिन्दी  कविता का महत्वपूर्ण  सम्मान केदार सम्मान, वर्ष 2011 हेतु प्रकाशकों, कविता के शुभचिन्तकों  एवं कवियों  से प्रवृष्टियां आमंत्रित की जाती हैं ।  वर्ष 2006 से 2011 के मध्य प्रकाशित  कविता संकलन दो प्रतियों में आमत्रित किये जाते हैं । इस महत्वपूर्ण सम्मान में आजादी के बाद जन्में  रचना कार ही शामिल हो सकतें हैं । इसमें वहीं प्रवृष्टियां स्वीकार होगी जिनकी रचनाधर्मिता केदारनाथ अग्रवाल की  परम्परा में  वैज्ञानिक चेतना के हिमायती  हो । प्रविष्टियां  30 नवम्बर 2011 तक शामिल की जायेंगी । 
संयोजक:
नरेन्द्र पुण्डरीक
कृष्ण प्रताप कथा सम्मान / केदार सम्मान 
डी0 एम0 कालोनी ,सिविल लाइन
बांदा - 210001 उ0 प्र0,  मो0 9450169568


     

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