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सोमवार

एक अवांछित अ-पाठकीय प्रतिक्रिया / प्रसंग विभूति नारायण राय....

अशोक गुप्ता / कथाकार एवं आलोचक
रअसल हिन्दी साहित्य की दुनिया में लोग अपना मत अभिमत स्थितियों की स्वंतंत्र मेरिट पर, यथा समय  व्यक्त नहीं करते बल्कि उसे शातिराना ढंग से खुद का दामन बचाते हुए, किन्ही भी अप्रत्यक्ष  मुद्दे पर हो-हल्ले के  बीच व्यक्त करते हैं जिसमें सही मुद्दा लगभग लोप हो जाता है.
  कालिया जी का विरोध यहाँ उनकी बहुत सी किन्हीं दीगर वज़हों से हो रहा हो सकता है, जो संभवतः सही भी हों लेकिन तब लोग अपने निजी स्वार्थ के कारण चुप रहे, अब विभूति के बहाने जब एक शोर मचा तो सब इस उस समय की कसर एक साथ निकालने लगे. यह केवल एक शामिल बाजे में अपनी आवाज़ मिलाना हुआ. मैं इसे न रचनात्मक मानता हूँ, न साहसिक.।

शनिवार

पटना में फ़ैज अहमद फ़ैज का जन्मशताब्दी समारोह

चित्र में बायें से - अरविन्द श्रीवास्तव, शहंशाह आलम, राजेन्द्र राजन, डा. इम्तियाज अहमद, डा. खगेन्द्र ठाकुर, डा. अली जावेद, शकीलसिद्दिकी, अरुण कमल,कर्मेन्दु शिशिर.....डा. व्रज कुमार पाण्डेय
 बिहार प्रगतिशील लेखक संध के तत्चावधान में माध्यमिक शिक्षक संध, पटना के सभागार में फ़ैज अहमद फ़ैज की जन्मशती समारोह  का आयोजन किया गया । समारोह की अध्यक्षता डा. इम्तियाज अहमद , निदेशक खुदाबख्श आरियंटल उर्दू लाइब्रेरी ,पटना ने की । मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार शकील सिद्दिकी, लखनऊ के साथ-साथ प्रलेस के राष्ट्रीय उपमहासचिव डा. अली जावेद थे कार्यक्रम का संचालन युवा कवि शहंशाह आलम ने किया।
कहा जाता है कि गालिब के बाद उर्दू का सबसे बड़ा लोकप्रिय शायर फैज़ हैं। इतनी लोकप्रियता उन्हें उनकी शायरी के कारण मिली। जुल्म, अन्याय, बर्बरता एवं शोषण के विरूद्ध समर्पित होकर लिखने वाले फ़ैज़ को इस कारण से सितम कम नहीं उठानी पड़ी। जेल जाना पड़ा । फांसी के फंदे उनके लिए पाकिस्तान हुकूमत ने तैयार कराई थी। तब भी समाज और दुनिया को बदलने की लड़ाई वह अपनी कलम और जेहन से लड़ते रहे । तभी तो लिखा -
‘ बोल, कि थोड़ा वक्त बहुत है
जिस्म-ओ जबाँ की मौत के पहले
बोल, कि सच जिन्दा है अबतक
बोल, जो कुछ कहना है कह ले।’
फ़ैज ने प्रगतिशील कविता के साथ-साथ प्रगतिशील आन्दोलन को व्यापकत्म अर्थ दिए। फ़ैज के साहित्यिक योगदान को देखते हुए बिहार प्रगतिशील लेखक संध ने फ़ैज़ का जन्मशताब्दी समारोह मनाने का निर्णय लिया ।
इस अवसर पर बिहार प्रलेस के महासचिव राजेन्द्र राजन, चर्चित कवि अरुण कमल, वरिष्ठ आलोचक डा. खगेन्द्र ठाकुर, डा. व्रज कुमार पाण्डेय आदि ने अपने महत्वपूर्ण विचार उपस्थित श्रोताओं के समक्ष रखे। समारोह में कर्मेन्दु शिशिर, डा. संतोष दीक्षित, अनीश अंकुर, डा. रामलोचन सिंह, वद्रीनारायण लाल, डा. विजय प्रकाश, परमानन्द राम एवं अरविन्द श्रीवास्तव आदि की उपस्थिति रही।
‘हम महकूमों के पाँव तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी.....
....सब ताज उछाले जायेंगे
सब तख्त गिराये जायेंगे।’
-फ़ैज

शुक्रवार

....... तुम ही सो गये दास्ताँ कहते कहते। गज़लकार वसन्त नहीं रहे....


गीत एवं गज़ल के चर्चित हस्ताक्षर - वसन्त (मुरलीगंज) इस दुनिया में अब  नहीं रहे- यह कहते ही जुबान लड़खड़ा जाती है....अपने गज़ल और गीतों से मंच पर छा जाने वाले वसंत इस तरह अचानक लुप्त हो जायेगा, अविश्वसनीय लगता है। कोसी क्षेत्र की पहचान के रूप में वसन्त ने बिहार एवं अन्य प्रान्तो में अपने फन से बेहद शोहरत कमाया, देश की चर्वित पत्रिकाओं ने उनके गीत और गज़ल को ससम्मान प्रकाशित किया। कोसी क्षेत्र से प्रकाशित पहला साप्ताहिक ‘कोसी टाइम्स’ का उन्होंने प्रकाशन एवं संपादन किया।
वरिष्ठ कवि व गीतकार सत्यनारायण (पटना) का मानना है कि - वसन्त की गज़लों में अहसास की तपिश है, एक मासूम-सा मिज़ाज है और वे धड़कते  भी हैं.......।  उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए वरिष्ठ साहित्यकार तथा कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्षय श्री हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ ने कहा कि वसन्त नवगीत से गज़ल के क्षेत्र में आये थे, यही कारण है कि नवगीत की रागचेतना और उसकी विम्बधर्मिता समग्र रूप में इनकी गज़लों में दिखती है। डा. भूपेन्द्र’ मधेपुरी का मानना है कि वसन्त के गजलों में नवगीत के मुहावरे, उसकी शब्दावली और उनकी आन्तरिक बुनावट बहुत ही आकर्षक है कवि धीर प्रशांत का मानना हे कि बसन्त की गज़लों में उर्जा’ है और अंतरंगता । चर्चित कवि शहंशाह आलम ने वसन्त को कोसी का खिला हुआ एक अलौकिक पुष्प कहा। गजलकार अनिरूद्ध सिन्हा  एव अरविन्द श्रीवास्तव ने अपने अश्रुपूरित नयनों से उन्हें नमन किया।   उनकी चर्चित कृति ‘एक गज़ल बनजारन’ और ‘कुर्सियों का व्याकरण’ एक धरोहर है हमारे बीच।
पिछले दिनों दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ में प्रकाशित उनकी एक गज़ल को देखें -

लगने लगा है बिस्तर बाहर दलान में 
बूढ़े के लिए अब नहीं कमरा मकान में।

प्रस्तुत है उनकी पुस्तक ‘एक गज़ल बंजारन’ की पहली गज़ल-

पहले पन्ने में राजा का हाथ खून से सना लिखा है
मनमानी की इस किताब में आगे दुख दुगुना लिखा है

इससे भी पहले अंधों ने अपनों को बांटी रेवड़ियां
भैया तेरी मेरी किस्मत में केवल झुनझुना लिखा है

अपनी कुदरत को बचपन से फाकामस्ती की आदत है
कई दिनों से चौके  की पेशानी पर बस चना लिखा है

इस सियासती बाजीगर को शायद यह मालूम नहीं कि
टूट गया शहजोर फैलकर जब भी हद से तना लिखा है

ज़र्द धूप का टुकड़ा आकर बोल गया कल पत्तों से यूं
चन्द रोज है और कुहासा इसको होना फना लिखा है

एक रोज नेकी ने सोचा मिलें जरा फिर इन्सानों से
देखा हर धर के दरवाजे अन्दर आना मना लिखा है

पत्थर फेंक रहे लोगों का सुनते हैं तू सरपरस्त है
तेरा धर तो खास तौर से शीशे का बना लिखा है । 

‘जनशब्द’ एवं ‘कोसी खबर’ परिवार कवि वसन्त की निम्न पंक्तियों को स्मरण कर उन्हें श्रद्धा निवेदित करता है -
थे नहीं उतने बुरे दिल के वसन्त जी
उठी जब मैयत कहा सबने वसन्त जी
क्या गये जो रूठ कर हमसे वसन्त जी
फिर नहीं हमको दिये रब ने वसन्त जी

तस्वीर में (दायें से बाये) काव्यपाठ करते वसन्त, अरविन्द श्रीवास्तव, हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’, आदित्य, डा. मनमोहन सिंह (पंजाबी शायर एवं आरक्षी अधीक्षक ) .डा भूपेन्द्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’ एवं दशरथ सिंह।

रवीन्द्र कालिया को ज्ञानपीठ से बाहर किया जाय -उद्भ्रांत


हिन्दी के वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत ने विभूति नारायण राय और रवीन्द्र कालिया प्रकरण के संदर्भ’ में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इन दोनों व्यक्तियों की मानसिकता अपने लेखन और व्यवहार में प्रारम्भ से ही स्त्री विरोधी रही है और इन दोनों की मिलीभगत ने मौजूदा समय में एक ऐसा गर्हित उदाहरण प्रस्तुत कर दिया है जिसकी मिसाल सौ साल मे इतिहास में नहीं मिलेगी । और पहली बार ऐसा हुआ है कि समूचा हिन्दी समाज इनकी अश्लील जुगलबंदी के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है। अगर ज्ञानपीठ के प्रबंधकों ने कालिया को तत्काल प्रभाव से वर्खास्त नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं जब ज्ञानपीठ को हिन्दी के एक भी सुरूचि सम्पन्न पाठक की कमी महसूस होगी । जहाँ तक विभूति नारायण की बात है उनका तो मूल चरित्र पुलिसिया मानसिकता वाला ही है, भले ही सरकारी दवाब में अपनी नौकरी बचाने के लिए उन्होंने माफी अभी मांगी हो लेकिन उनका जाना भी निश्चित है। यह भी विश्वास है कि भविष्य में कोई भी हीन मानसिकता से ग्रस्त रचनाकार या व्यक्ति इस तरह के अश्लील शब्द को सार्वजनिक मंच से प्रयोग करने से पहले हजार बार सोचेंगे । मैं विष्णु खरे के जनसत्ता में दो अंको में प्रकाशित लेख का शत प्रतिशत समर्थन करता हूँ अगर कालिया को ज्ञानपीठ से तुरत बाहर नहीं किया गया तो भारतीय ज्ञानपीठ जिसका गौरवशाली इतिहास है आनेवाले पीढियों की नजरों में एक पतनशील संस्था के रूप में पहचानी जायेगी।
                  
- उद्भ्रांत
वरिष्ट कवि, दूरदर्शन के पूर्व उप महानिदेशक
मो- 09818854678.

बुधवार

कालिया और उनकी ‘टीम’ को ज्ञानपीठ से बाहर किया जाय.... - शहंशाह आलम


इनदिनों हिन्दी साहित्य परिदृश्य में जो कुछ अरोचक, अवैचारिक तथा असाहित्यिक घट रहा है। दुखद है। उत्तेजित करने वाला है।
वरिष्ठ कथाकार तथा महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविधालय के कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ बेवफाई सुपर विशेषांक के लिए ली गयी अपनी बातचीत में लेखिकाओं के प्रति आपत्तिजनक शब्द और उनके लेखन पर अपनी राय देते हुए जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं नाकाविल-ए-वर्दाश्त है।
मेरी दृष्टि में, विभूति नारायण राय से अधिक दोषी ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक होने के नाते रवीन्द्र कालिया जी हैं, जिन्होंने उनकी ऐसी टिप्पणी को बिल्कुल गैर जिम्मेदाराना ढंग से छापा दरअसल, रवीन्द्र कालीया जी जबसे ज्ञानपीठ के निदेशक बने हैं, ज्ञानपीठ की गरिमा धूमिल हुई है। ‘नया ज्ञानोदय’ के जैसे-जैसे असाहित्यिक और बाजारू अंक उनके संपादन में आ रहे हैं, वेहद अफसोसनाक हैं । 
रवीन्द्र’ कालिया जी ‘ज्ञानपीठ’ जैसी गरिमामयी संस्था की शीर्ष पर बैठ कर न्याय नहीं कर पा रहे हैं । इसलिए मेरी मांग है कि रवीन्द्र कालिया जी को तुरत ज्ञानपीठ के निदेशक पद से इस्तीफा  दे देना चाहिए तथा ऐसे कृत्यो मे शामिल उनके सहयोगियों को भी ज्ञानपीठ से निकाल-बाहर करना चाहिए।
     
- शहंशाह आलम, युवा कवि

मो.- 09835417537

रविवार

आज के साहित्य में शोषितों यानी गरीबों की आवाज मद्धिम पड़ी है...... वरिष्ठ कवि अरुण कमल से अरविन्द श्रीवास्तव की बातचीतः-

ज के साहित्य में शोषितों यानी गरीबों की आवाज मद्धिम पड़ी है......
वरिष्ठ कवि अरुण कमल से अरविन्द श्रीवास्तव की बातचीतः-

अरविन्द श्रीवास्तव- भूमंडलीयकरण और बाजारवाद में आप युवा कवियों से क्या-क्या अपेक्षाएँ रखते हैं ?
अरुण कमल- मुझे कभी किसी कवि से कोई अपेक्षा नहीं होती । कवि जो भी कहता है मैं उसे सुनता हूँ। अगर उसकी धुन मेरी धुन से , मेरे दिल की धड.कन से , मिल गयी तो उसे बार-बार पढ.ता हूँ।दूसरी बात यह कि युवा कवि कहने से आजकल प्रायः किसी ‘कमतर’ या ‘विकासशील’ कवि का बोध होता है जो गलत है। दुनिया के अनेक महान कवियों न अपनी श्रेष्ठतम रचनाएँ तब रचीं जब वे युवा
थे। इसलिए हिन्दी के युवा कवि जो लिख रहे हैं मैं उसे हृदयंगम करने की योग्यता पा सकूँ, मेरा प्रयत्न यही होगा। अपेक्षा कवि से नहीें पाठक से है।
अरविन्द श्रीवास्तवः आप युवा कवियों के प्रेरणास्रोत रहे हैं अपने लेखन के आरम्भिक दिनों आपने किन से और कहाँ से प्रेरणा ग्रहण की ?
अरुण कमलः मैं कभी किसी का प्रेरणास्रोत नहीं रहा। अपने पहले के कवियों एवं बाद के कवियों - दोनों तरफ से मैने प्रायः प्रहार झेले हैं, जिसका मुझे कोई गम नहीं है। मेरे प्रेरणास्रोत शुरू में धूमिल भी थे, फिर नागार्जुन-त्रिलोचन और निराला। मैं विस्तार से इस बारे में पहले कह चुका हूँ जो मेरी पुस्तक - ‘कथोपकथन’ में संकलित हैं। अभी मेरे प्रिय कवि निराला तो है हीं तुलसी, कबीर, गालिब, नजीर और शेक्सपीयर हैं। और सबसे प्रिय ग्रंथ ‘महाभारत’।
अरविन्द श्रीवास्तवः ‘अपनी केवल धार’ सहित आपके चारों कविता संग्रह में आपका सर्वाेतम काव्य कर्म किसे माना जाएगा ?
अरुण कमलः मैंने जो कुछ लिखा वो उत्तम भी नहीं है। अधिक से अधिक वह अधम कोटि का है। मैं अच्छा लिखना चाहता हूँ लेकिन वह मेरे वस में नहीं है। देखें क्या होता है।
अरविन्द श्रीवास्तव- इधर के पन्द्रह-बीस वर्षों में विशेषकर सोवियत संध के विघटन के पश्चात समकालीन कविता लेखन में अगर कुछ विचारधारात्मक बदलाव आया है, तो उसे आप किस रूप में लेते हैं ?
अरुण कमल-  आज कविता , साहित्य मात्र तथा कला और यहाँ तक कि राजनीति मेें भी राजनीति कम हुई है । माक्र्स के अनुसार राजनीति का अर्थ है वर्ग- संघर्ष   और सत्ता पर अधिकार के लिए दो वर्गों के बीच का संघर्ष । वर्ग-संधर्ष का स्थान अब जाति, क्षेत्र, लिंग, सम्प्रदाय आदि ने ले लिया है जो पूँजीवाद प्रेरित उत्तर आधुनिक दर्शन तथा व्यवहार का केन्द्र है । समाज में अनेक अन्तर्विरोध या अंतःसंघर्ष होते हैंं, किसी को झुठाया नहीं जा सकता ।  लेकिन एक मुख्य अंतर्विरोध होता है जो मेरी समझ से आर्थिक है और इसलिए वर्ग-आधारित। आज के साहित्य में शोषितों यानी गरीबों की आवाज मद्धिम पड.ी है। मनुष्य को नष्ट करने वाले पूँजीवाद तथा साम्राज्यवाद का विरोध कम पड.ा है।  इसका असर यह भी हुआ है कि किसी भी सामाजिक-आर्थिक प्रश्न पर यहाँ तक कि शुद्ध कलागत प्रश्नों पर भी, अब कोई पक्ष लेने और कहने से परहेज करता है। अगर आप सर्वेक्षण करके आज के लेखकों से पूछें कि उन्हें कौन से कवि पसंद हैं तो वे प्रायः खामोश रहेंगे । आप पिटते रहें पर वे तमाशा  देखते रहेंगे । मुझे ब्रेख्त की कविता याद आती है जिसमें भाषण के अंत में वह आदमी मजमेंं में एक पुर्जा घुमाता है कि आप दस्तखत कर दो, लेकिन भीड. छँट जाती है, कोई दस्तखत नहीं करता । पुर्जे पर लिखा था ः ‘दो जोड. दो बराबर चार’। आज बहुत कम लोग ऐसे हैं जो निडर होकर यह भी कह सकें कि उन्हें उड.हुल  का फूल सुंदर लगता है।  
अरविन्द श्रीवास्तव समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में कविता समाज से कटती जा रही है आलोचकों ने ‘कविता के बुरे दिन’ की धोषणा कर दी है, जब कि बडी आबादी कविता से उम्मीद लगाये हुई है? इस कसौटी पर नये कवि कहाँ खडे. उतर रहे हैं ?
अरुण कमल ः मैं नहीं समझता कि कविता कटती जा रही है। बल्कि समाज ही कविता से कटता जा रहा है। समाज को ऐसा बनाया जा रहा है, बनाया गया है कि वह सभी  विकल्पों, प्रतिरोध करने वाली शक्तियों से कट कर केवल ‘आइ पी एल’ की शरण में चला जाए। जो भी रचना या शक्ति मुनाफे का विरोध करेगी उसे बाहर कर दिया जाएगा। अगर करोड.ों लोग भूखे सो रहे हैं तो यह मत कहिए कि अन्न उनसे कट गया है, कहिए कि पूँजीवादी सरकार और व्यवस्था ने उनसे अन्न छीन लिया है। यही बात कविता और कला और विज्ञान के साथ भी है।
अरविन्द श्रीवास्तवः  साहित्यिक जगत खेमेबाजियों से ग्रसित होते जा रहे हंै क्या इससे ‘नवलेखन’ प्रभावित होते नहीं दिख रहा ?
अरुण कमल ः मुझे सबसे ज्यादा कोफ्त ऐसी ही बातों से होती है। साहित्य में, जैसे कि दर्शन और विज्ञान में, मूल्यों के बीच संधर्ष होता हैै। यह गुटबाजी नहीं हैै। यह खेमेबाजी  नहीं हैै। मान लीजिए मुझे निराला प्रिय हैै। रामविलास शर्मा को भी। नामवर सिंह को ै। विश्वनाथ त्रिपाठी, नंद किशोर नवल, खगेन्द्र ठाकुर जी एवं परमानन्द जी को भी। शमशेर, त्रिलोचन, नागार्जुन को भीै। तो क्या इसे गुटबाजी कहेंगे ? दूसरी तरफ आप लाख माथा पटकेंगे, फिर भी न तो मैं फलाँ जी को न अमुक जी को अच्छा कवि मानूँगा।  आप कहेंगे यह तो जातिवाद है, यह तो विचार धारावाद है, यह तो गुटबाजी हैै। कहते रहिए लेकिन ‘तजिए ताहि कोटि बैरी सम.......जाके प्रिय न राम बैदेहि। साहित्य में खेमेबाजी नहीं होती। एक जैसा सोचने, पसंद करने, विश्वास करने वाले लोग एक साथ होते हैं, फिर भी लड.ते झगड.ते रहते हैं - यही होता।
अरविन्द श्रीवास्तवः अभी युवा कवियों की भावधारा से आप कितना आशान्वित हैं ? कौन से युवा कवि आपको आकर्षित कर रहे हैंं ?
अरुण कमलः मैं शुरू में इस प्रश्न का उत्तर दे चुका हूँ। आपका पहला प्रश्न इस बारे में ही तो है। जबतक मैं किसी कविता को बार-बार न पढूँ तबतक प्रभावित नहीं होता। बहुत से प्रतिभाशाली कवि हैं उन्हें ‘काँटों की बाड.ी’ में अपना रास्ता ढूंढने दीजिए जो सबसे ज्यादा लहूलुहान होकर आएगा वही मेरा प्रिय होगा; जो ‘कागद की पुडि.या’  भर होगा वह गल जाएगा।
 अरविन्द श्रीवास्तवः इधर नई कविताओं में नये-नये प्रयोग हो रहे हैं, इसे रंगमंच पर खेला जा रहा है, पेंटिंग, पाठ और संगीत के माध्यम से आमजन तक पहुँचाया जा रहा है इसे आप किस रूप में लेते हैं? क्या इससे मूल कविता की गरिमा का अवमूल्यन तो नहीं हो रहा है  ?
अरुण कमलः मूल कविता अपनी जगह अक्षत होती है। बाकी उसके अनेक पाठ या रूपांतर होते हैं; जितने पाठक उतने पाठ - ठीक ही तो है फिर भी वह मूल पात्र ज्यों का त्यों दूध से भरा होता है, सबके छकने के बाद भी।
अरविन्द श्रीवास्तवः आज युवा कवियों द्वारा कविताएँ लिखी जा रही है उसे ‘उत्कृष्ठता की विश्व मानक कसौटी’ पर कितना खड.ा पाते हैं ? हिन्दी कविताओं का अनुवाद विश्व की अन्य भाषाओं मे हो, इस दिशा में हो रहे कार्य से आप कितना संतुष्ट दिखते हैं ?
अरुण कमलः अभी तक तो निराला के भी अनुवाद नहीं हुए। मुझको नहीं मालूम कि प्रसाद, पंत, महादेवी या मुक्तिबोध, नागार्जुन, शमशेर का ही कितना अंग्रेजी में भी अनुदित है, दूसरी भाषाओं को यदि छोड. भी दें। हिन्दी क्षेत्र के अंग्रेजी विभागों का पहला काम यही होना चाहिए तथा अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय लेखकों को भी हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं से अंग्रेजी में अनुवाद करना चाहिए। हर महान कविता पहले अपनी भाषा में महान होती है।
अरविन्द श्रीवास्तव ः. पुरस्कार पाने की ललक नये कवियों में दिखने लगी है, इससे उसकी रचनाधर्मिता प्रभावित होती है, वे शार्ट-कार्ट रास्ता अपनाने लगे हैं। किसी कवि की कविता का उचित मूल्यांकन हो इस दिशा में किस पहल की जरूरत है ?
अरुण कमल ः पुरस्कार -पद -सम्मान, या निरन्तर विरोध, या उपेक्षा- ये सब इस कविता के भव के भाग हैं। जो सच्चा कवि है उसके लिए पुरस्कार और प्रहार दोनों बराबर हैं। जो पिटा नहीं, जो लगातार पिटा नहीं वह कवि कैसा?, जिसका अर्थी - जुलूस जितना ज्यादा निकले उसकी आयु उतनी ही ज्यादा होगी। कोई मूल्यांकन अंतिम नहीं होता।
अरविन्द श्रीवास्तवः गांव-कस्बे एवं छोटे शहरो के कवियों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने के लिए राजधानियों के चक्कर लगाने पड.ते है ? वे राष्ट्रीय क्षितिज पर उपेक्षित महसूसते हैं ?
अरुण कमलः जो पहचान बनाने के लिए व्यग्र हंंैंं वह कवि नहीं हैं जो कवि होगा वो केवल कविता रचेगा।
अरविन्द श्रीवास्तवः युवा कवियों की कविताएँ ब्लॉग पर आ रही हैं। डा. नामवर सिंह और विभूतिनारायण राय आदि ने ब्लॉग को सहित्य का हिस्सा माना है। युवा ब्लॉगरों से आपकी अपेक्षाएँ ?
अरूण कमलः मैं साधारण आदमी हूँ और कम्प्यूटर का ज्ञान मुझको नहींे है, दुनिया का सबसे सस्ता माध्यम लेखन है यानी कागज और कलम। मेरी दुनिया कागज कलम तक ही सीमित है।
अरविन्द श्रीवास्तवः  केदारनाथ सिंह, अरुण कमल, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी आदि की परम्परा में आगे आप किन युवा कवियों को देखते हैंं ?
अरुण कमलः आपने जिन कवियों की सूची देकर परम्परा बनाने का प्रयत्न किया है उनमें से कम से कम एक मेरा नाम हटा दें । मैं उस पंक्ति का, उस पद का अधिकारी नहीं हूँ। इसे विनम्रता नहीं वास्तविकता माना जाए। दूसरी बात यह कि ये सारे कवि अभी भी सौभाग्य से सक्रिय हैं। परम्परा पीछे से बनती है। जो लोग बाद मेंं लिख रहे हैं उन्हें अभी थोड.ा लिखने दीजिए। अंधड.-तुफान के बाद भी जो लौ बची रहेगी वह पंक्ति में स्थान पा लेगी।
अरविन्द श्रीवास्तवः आपने साहित्य में कई मुकाम हासिल किये, कुछ ऐसा लगता है जो आप करना चाहते थे वह नहीं कर पाए ?
अरुण कमलः हाँ, जैसा मैनें अभी कहा मैं अभी भी बस लिखने की कोशिश में हूँ। जो चाहा वह नहीं हुआ।
अरविन्द श्रीवास्तवः गत दिनों विष्णु खरे साहब ने कुछ कवियों की कविताओं पर  प्रश्न चिन्ह लगाया था, सवाल खडे. किये थे.....
अरुण कमलः एक पंक्ति है मीर की- ‘कुफ्र कुछ चाहिए इस्लाम की रौनक के लिए’। और कबीर की पंक्ति है- ‘श्वान रूप संसार है भूकन दे झकमार’। मुझे ‘मीर’ और ‘कबीर’ प्रिय हैं मैं उन्ही की आवाज के पर्दे में अपना काम करता हूँ।

       -कला कुटीर, अशेष मार्ग
         मधेपुरा-852 113. बिहार
                                                  मो.- 09431080862.

परिकथा- मई-जून, १० में प्रकाशित

बुधवार

शहंशाह आलम का ‘वितान’




मकालीन कविता के सशक्त कवि शहंशाह आलम की नयी कृति ‘वितान’ उनके काव्य फलक का वितान है, पगडंडियों से महानगर की यात्रा का महाभियान है। यह पुस्तक विपुल संभावनाओं का सामुच्य है, पुस्तक की कविताओं में कवि की  अदम्य जिजीविषा, विचारोत्तेजक भावधारा, नवीन शिल्प एवं कला  सुदृढ़ रूप में दिखती है। वैचारिकता और सम्वेदनाओं से बुनी गयी वितान की तमान कविताएँ समकालीन काव्य परिदृश्य में नवीनता का अहसास कराती है। डा. रमाकांत शर्मा के अनुसार ‘डिप्रेशन के इस महादौर में शहंशाह आलम की कविताएं विश्वास को टूटने नहीं देती, बल्कि खूबसूरत दुनिया का ख़्वाब बनाए रखती है।’ बतौर बानगी प्रस्तुत है वितान से ‘स्त्रियां’ शीर्षक कविता  -

स्त्रियां हैं इसलिए
फूटता है हरा रंग वृक्षों से
उड़ रहे सुग्गे से

स्त्रियां हैं इसलिए
शब्द हैं वाक्य हैं छन्द हैं
विधियां हैं सिद्धियां हैं
भाद्रपद हैं चैत्र है

इसलिए अचरज है
अंकुर हैं फूटने को आतुर।

प्रकाशकः समीक्षा प्रकाशन
डा. राजीव कुमार
मोबाइल- 09471884999/09334279957.

सोमवार

‘देशज’ के देश में....




'देशज' पत्रिका का यह अंक शाहाबाद प्रक्षेत्र पर केन्द्रित है। शाहाबाद के अन्तर्गत चार जिले हैं जिनमें भोजपुर (आरा) बक्सर , रोहतास और कैमूर आते हैं, इन चार जिलों के रचनाकार वर्तमान समय में राष्ट्रीय फलक पर बेहद सक्रिय हैं मसलन् अरुण कमल, बद्रीनारायण, निलय उपाध्याय, विमल कुमार, कुमार मुकुल, हरे प्रकाश उपाध्याय, सुधीर सुमन, राम निहाल गुंजन, जनार्दन मिश्र, प्रेम किरण आदि कई नाम हैं जो ‘देशज’ के इस अंक में अपनी उपस्थिति दर्ज करा कर अंक की महत्ता सार्थक कर रहे हैं। अंक में प्रकाशित तमाम कविताएँ समय के खुरदरे चहरे को उजागर करती है, प्रेम और प्रतिरोध का समवेत स्वर प्रकाशित कविताओं में दिख रहा है। कोमल व कठोर अनुभूतियों का यह शाहाबादी एलबम काव्य परिदृश्य में नवीनता का अहसास कराता है। संवेदनाओं और वैचारिकता के द्वंद से बुनी गयी गायत्री सहाय, डा. आर. के. दूबे, मीरा श्रीवास्तव, संतोष श्रेयांस, जगतनन्दन सहाय, ओमप्रकाश मिश्र आदि की कविताएँ भी देशज को महत्वपूर्ण दस्तावेज की शक्ल देता है। संपादक अरुण शीतांश ‘अपनी धार’ के माध्यम से ‘देशज’ का प्रेम पाठकों में बांटते हैं हौसले और एक नए उम्मीद के साथ । देखें, अंक में प्रकाशित कविताओं की कुछ बानगी-
इस बाजार में 
मेरे पिता का खून 
और पसीना मिला हुआ है
मैं इस मकान को बेच नहीं सकता
क्योंकि मैं यह देख नहीं सकता 
इस बाजार में 
कोई खरीद ले
मेरे पिता का पसीना
और खून भी!
इस बाजार में / विमल कुमार

पहाड़ों के पीछे से 
आई बाध की हुंकार ऽ ऽ ऽ 
मैं काँप गया
डर मत
कहा रामदाना बेचने वाले बूढ़े ने
पहाड़ों के पीछे बाघ-बाघिन कर रहे हैं प्यार ।
मेरा डर / बद्री नारायण

देशज
संपादक: अरुण शीतांश
मणि भवन, संकट मोचन नगर,
आरा-802301. बिहार
मोबाइल - 09431685589.

शुक्रवार

हकार.... बाबा नागार्जुन के गांव से -




साहित्य की प्रगतिशील धारा के प्रतीक पुरुष बाबा नागार्जुन आज नहीं हैं लेकिन उनकी महान विरासत हमारे साथ है। बिहार के मिथिलांचल का एक गांव तरौनी इसलिए धन्य है कि वहीं नागार्जुन जैसे दुर्धर्ष कवि का जन्म हुआ था। उसकी रचनाओं में वहाँ की मिट्टी, पानी और हवा के सुवास हैं। मैथिली के इस महान रचनाकार ‘यात्री’ को वहाँ अत्याधिक सम्मान प्राप्त है।
बिहार प्रगतिशील लेखक संध ने अपने परमप्रिय कवि बाबा नागार्जुन की जन्मशताब्दी के अवसर पर 25 जून, 2010 को 2 बजे जन्मभूमि तरौनी में उनके अवदान को सम्मान देने हेतु राष्ट्रीय समारोह का आयोजन किया है।
मुख्यवक्ताः- डॉ. नामवर सिंह, 
डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, 
डॉ. कमला प्रसाद, 
डॉ. खगेन्द्र ठाकुर, 
डॉ. चैथी राम यादव, 
प्रो. अरुण कमल, 
प्रो. वेदप्रकाश, 
गीतेश शर्मा आदि हैं।

बिहार प्रलेस इकाई प्रबुद्ध साहित्यकारों-साहित्यप्रेमियों एवं प्रलेस सदस्यों को तरौनी आने का आमंत्रण देती है।
-महासचिव-सह-स्वागताध्यक्ष
राजेन्द्र राजन
मो.- 09471456304, 07631520875.  

देश व समाज के प्रति लेखकों की चिंता घटीः अरुण कमल



समकालीन साहित्यिक तथा सामाजिक परिदृश्य विषय पर विचार-गोष्ठी

 देश और समाज के प्रति लेखकों की चिंता घटी है। पहले लेखक सांप्रदायिकता, हत्या, बलात्कार, मंहगाई, बेरोजगारी के खिलाफ सड़क पर उतरते थे लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। वहीं ऐसे विषयों पर लेखकों के बयान भी कम आ रहे हैं।  ये बातें वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने पटना स्थित जनशक्ति भवन सभागार में बिहार प्रगतिशील लेखक संध द्वारा आयोजित ‘समकालीन साहित्यिक तथा सामाजिक परिदृश्य’ विषयक विचार गोष्ठी के दौरान कही। 
उन्होंने कहा कि आज आदिवासियों को बेदखल किया जा रहा है।  ग्रीन हंट के नाम पर अपने ही लोगों के विरुद्ध कार्रवाई हो रही है। उन्होंने कहा कि लेखकों को चाहिए कि वे जनआंदोलन का समर्थन करें आज की सत्ता सिर्फ पूँजीपतियों और विदेशियों को खुश करने में लगी है। विचार गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्ध आलोचक डा. खगेन्द्र ठाकुर ने कह कि आज युवा शक्ति को पूरे साल क्रिकेट के उन्माद में फंसाकर रखा जा रहा है। क्रिकेट ने युवा शक्ति को इस कदर भरमा दिया है कि वह भूख और बेरोजगारी के बारे में न सोचकर चीयर्स लीडर के बारे में अधिक सोच रहे हैं । उन्होंने कहा कि सरकार परिर्वतन हुआ, सत्ता परिर्वतन नहीं हुऔ। योगेन्द्र कृष्णा ने लेखक की इमानदारी को सबसे अहम बताया। अरविन्द श्रीवास्तव ने साहित्य के विस्तृत दायरे को बताते हुए कविता को संघर्ष का हथियार बताया तथा इंटरनेट पर कविता की विस्तृत दुनिया से अवगत कराया। इस अवसर पर डॉ. मुसाफिर बैठा, परमानन्द राम और हृदयनारायण झा आदि लेखकों ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन चर्चित कवि शहंशाह आलम ने किया।   

शनिवार

तुम इतने समीप आओगे मैंन कभी नहीं सोचा था......- डा. बुद्धिनाथ मिश्र मधेपुरा में।




धेपुरा की ऐतिहासिक साहित्यिक परम्परा को सम्वर्द्धित करते हुए बी. एन मंडल विश्वविधालय, मधेपुरा के वर्तमान कुलपति डा. आर. पी. श्रीवास्तव के सद्प्रयास से विश्वविधालय के सभागार में काव्य संध्या का एक महत्वपूर्ण आयोजन किया गया। विश्वविधालय स्थापना के 17 वर्षों में यह पहला मौका था जब साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा (कविता)  पर रचनाकारों का इस तरह भव्य समागम हुआ। विशिष्ठ अतिथि एवं गीतकाव्य के शिखर पुरुष डा. बुद्धिनाथ मिश्र (देहरादून)  सहित अन्य कवियों को श्रोताओं ने जी भर सुना। कवियों में डा. रवीन्द्र कुमार ‘रवि’, डा. कविता वर्मा, डा.पूनम सिंह, रमेश ऋतंभर (मुजफ्फरपुर) डा. रेणु सिंह, डा. एहसान शाम, रेयाज बानो फातमी, (सहरसा)  डा. विनय चौधरी, अरविन्द श्रीवास्तव (मधेपुरा) ने काव्य पाठ किया। डा. बुद्धिनाथ मिश्र ने एक मुक्तक से काव्य पाठ आरम्भ किया - राग लाया हूँ, रंग लाया हूँ, गीत गाती उमंग लाया हूँ। मन के मंदिर मे आपकी खातिर, प्यार का जलतरंग लाया हूँ।  

डा. मिश्र ने अपने कई गीतों का सस्वर पाठ किया, देखें कुछ की बानगी-

नदिया के पार जब दिया टिमटिमाए
अपनी कसम मुझे तुम्हारी याद आये.....

मोर के पाँव ही न देख तू
मोर के पंख भी तो देख 
शूल भी फूल हैं बस इक नजर
गौर से जिन्दगी तो देख.....

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे 
जाने किस मछली में बंधन की चाह हो.......

तुम इतने समीप आओगे मैंन कभी नहीं सोचा था......

काव्य संध्या की अध्यक्षता करते हुए डा. रिपुसूदन श्रीवास्तव ने कविता को मानव हृदय का स्पंदन कहा। उन्होंने अपनी कविता कुछ इस तरह सुनायी-

जंग, धुआं, गम के साये में जैसे-तैसे रात ढ.ली
एक कली चटकी गुलाब की, सुबह जो तेरी बात चली........।

इस अवसर पर प्रकृति भी मेहरबान दिखी, बारिश की हल्की फुहार के साथ इस यादगार काव्य संध्या का समापन हुआ।

डा.बुद्धिनाथ मिश्र की कविताओं के लिए यहाँ क्लिक करें

गुरुवार

आलोक श्रीवास्तव और प्रेम भारद्वाज को लाला जगतज्योति प्रसाद सम्मान











र्चित युवा ग़ज़लकार आलोक श्रीवास्तव और मासिक पत्रिका ‘पाखी’ के संपादक प्रेम भारद्वाज को वर्ष 2010 का लाला जगतज्योति प्रसाद सम्मान दिया जाएगा। साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय युवाओं को दिया जाने का यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रतिवर्ष 4 अप्रैल को लाला जगत ज्योति प्रसाद की पुण्य तिथि पर दिया जाता है। इस सालउनकी बारवीं पुण्यतिथि पर समकालीन साहित्य मंच, मुंगेर की ओर से यह सम्मान, कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और 'वागर्थ' पत्रिका के संपादक व आलोचक डॉ. विजय बहादुर सिंह देंगे। पेशे से टीवी पत्रकार आलोक श्रीवास्तव अपने पहले ही ग़ज़ल संग्रह 'आमीन' से इन दिनों ख़ूब चर्चा में हैं और हाल ही में उनकी ग़ज़लों को मशहूर गायक जगजीत सिंह व प्रख्यात शास्त्रीय गायिका शुभा मुदगल ने अपने एलबम्स में गाया है साथ ही प्रेम भारद्वाज द्वारा संपादित मासिक पत्रिका 'पाखी' ने बहुत ही कम समय में साहित्य जगत में अपनी एक विशिष्ठ जगह बनाली है। जिसे देखते हुए सम्मान समिति ने इस वर्ष के सम्मान हेतु इन दोनों युवाओं को चुना है। समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में डा. राम लखन सिंह यादव, डा. प्रेम कुमार ‘मणि’ डा. कुणाल कुमार एवं डा. भगवान सिंह मौजूद रहेंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र करेंगे। 4 अप्रैल 2010 को शाम 6.30 बजे मुंगेर के शिक्षक संघ में आयोजित होने वाले इस समारोह के संयोजक वरिष्ठ गजलकार अनिरूद्ध सिन्हा हैं।

अदब की अग्नि आभा है हिन्दी की अनन्य रचनाकार नासिरा शर्मा




नासिरा शर्मा का साहित्य जहाँ इलाहाबाद से ईरान तक फैला है, वहीं इनकी शख्सि़यत का दायरा भी अगम अपार है। पटना से प्रकाशित ‘राष्ट्रीय प्रसंग’ के ताजा अंक का विशिष्ट आकर्षण है समकालीन कथा साहित्य के चर्चित हस्ताक्षर नासिरा शर्मा। वह एक साथ -‘मरजीना का देश -इराक’ से लेकर ‘झाँसी का वह बूढ़ा किला और वेतवा का वह हरियाला जोवन’ के किस्से बुन और सुना सकती है। नासिरा की जन्मजात विद्रोही अन्तर्व्यक्तित्व से लबरेज है उनकी कथा शैली। ‘राष्ट्रीय प्रसंग’ का यह अंक हिन्दी में विश्वभाव की लेखिका नासिरा शर्मा के सम्बन्ध में भरपूर सामग्रियों से भरा है।
इसके अतिरिक्त चर्चित कवि सुधीर सक्सेना की चार कविताएँ ‘हरित बांस की बाँसुरी इन्द्रधनुष दुति होति’ को स्मरण करा देती है। प्रस्तुत है उनकी ’नियति’ कविता-

मैंने तुम्हें चाहा
तुम धरती हो गयी
तुमने मुझे चाहा 
मैं आकाश हो गया
और फिर 
हम कभी नहीं मिले , 
वसुंधरा!

‘राष्ट्रीय प्रसंग’
संपादकः 
विकास कुमार झा, पटना.
मोबाइल- 09835209149,  09891243926.

रविवार

आज ‘हिन्दुस्तान’ दैनिक (रविवार रीमिक्स) में प्रकाशित अपनी तीन कविताएँ ब्लॉगर मित्रों के लिएः-




विरासत

अर्सा गुजर गया
जमींदोज हो गये जमींदार साहब

बहरहाल सब्जी बेच रही है 
साहब की एक माशूका

उसके हिस्से 
स्मृतियों को छोड. 
कोई दूसरा दस्तावेज नहीं है

                                                फिलवक्त, साहबजादों की निगाहें
                                               उनके दांतों पर टिकी है
                                               जिनके एक दांत में
                                               सोना मढ़ा है।

                             -अरविन्द श्रीवास्तव, मधेपुरा 

गुरुवार

सआदत हसन मंटो की लघुकथाएं


कम्युनिज्म

वह अपने घर का तमाम जरूरी सामान एक ट्रक में लदवाकर दूसरे शहर जा रहा था कि रास्ते में लोगों ने उसे रोक लिया । एक ने ट्रक के सामान पर नजर डालते हुए कहा, ‘‘देखो यार, किस मजे से इतना माल अकेला उड़ाये चला जा रहा है।’’
समान के मालिक ने कहा, ‘‘जनाब माल मेरा है।’’
दो तीन आदमी हंसे, ‘‘हम सब जानते हैं।’’

एक आदमी चिल्लाया, ‘‘लूट लो! यह अमीर आदमी है, ट्रक लेकर चोरियां करता है।’’ 


पेशकश

पहली धटना नाके के होटल के पास हुयी फौरन ही वहां एक सिपाही का पहरा लगा दिया गया। दूसरी घटना दूसरे ही रोज शाम को स्टोर के सामने हुयी, सिपाही को पहली जगह से हटाकर दूसरी घटना की जगह भेज दिया गया। तीसरा केस रात बारह बजे लांडरी के पास हुआ, जब इंस्पेकटर ने सिपाही को इस नयी जगह पर पहरा देने का हुक्म दिया तो उसने कुछ देर सोचने के बाद कहा, ‘‘मुझे वहां खड़ा कीजिये जहां नयी घटना होने वाली है!’’ 
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