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Wednesday
Friday
‘शीतल वाणी’ ने दिया एक करामाती कमाण्डर को सेल्यूट !
यह डा. वीरेन्द्र ‘आज़म’ और उनके टीम की इच्छा शक्ति, संकल्प और समर्पण का ही परिणाम रहा कि ‘शीतल वाणी’ का ’कमला प्रसाद स्मृति अंक’ सामने आ सका। यह अंक उस महान शख्सि़यत को समर्पित है जिनके योगदान को साहित्यिक व सांस्कृतिक जगत आसानी से भुला नहीं सकता। कमला प्रसाद जी ने एक संपादक, लेखक व संगठनकर्ता के रूप में जो उदाहरण रखे थे वे बेमिसाल हैं। स्वयं संपादक के अनुसार - प्रोफेसर कमला प्रसाद! आलोचक कमला प्रसाद! विचारक कमला प्रसाद! कमाण्डर कमला प्रसाद! वसुधा के संपादक कमला प्रसाद! प्रलेस के रष्ट्रीय महासचिव कमला प्रसाद! व्यक्ति एक संबोधन अनेक! यानी बहुआयामी व्यक्तित्व। वस्तुतः स्नेहिल स्वभाव के धनी, लोकप्रिय अध्यापक, आलोचक और संगठनकर्ता डा. कमला प्रसाद के लिए प्रगतिशील लेखक संध एक परिवार था। वे सुख-दुख के के साथी थे। सही मायने में वे एक लेखक से बढ़कर व्यवहार कुशल व्यक्तित्व थे। उनमें प्रतिवद्धता के साथ-साथ सहिष्णुता का समभाव था, सहजता और व्यस्तता उनकी फितरत थी। ऐसे शख्स की स्मृति को ‘शीतल वाणी’ ने सहेज कर साहित्य जगत का बड़ा उपकार किया है। पत्रिका के इस अंक में दिनेश कुशवाहा का ‘उनके आगे मिसालों की आबरू क्या है’ शीर्षक से महत्वपूर्ण संस्मरण है। अरुण आदित्य, विष्णु नागर, राजेश जोशी, पूनम सिंह, डा. सुधेश, अरुण शीतांश, नरेन्द्र पुण्डरीक, प्रदीप मिश्र, जितेन्द्र विसारिया, राजेन्द्र लहरिया, उषा प्रारब्ध ने अपने संस्मरणों में कमला जी के व्यक्तित्व व कृतित्व के साथ उनके साथ अपने संस्मरण को रेखांकित किया है। डा. कपिलेश भोज, प्रदीप सक्सेना, कुमार अंबुज, ज़ाहिद खान, अरविन्द श्रीवास्तव, योगेन्द्र कुमार, सिद्धार्थ राय, सेवाराम त्रिपाठी और विशाल विक्रम सिंह के आलेख तथा शैलेन्द्र शैली का साक्षात्कार अंक को एक ऐतिहासिक दस्तवेज़ की शक्ल प्रदान करता है। साथ ही कई कविताओं ने ‘शीतल वाणी’ के इस अंक को मूल्यवान बना दिया है।
शीतल वाणी (कमला प्रसाद स्मृति अंक), संपादक- डा. वीरेन्द्र ‘आज़म’, 2 सी/755, पत्रकार लेन, प्रद्युमन नगर, मल्हीपुर रोड, सहारनपुर (उ.प्र.) मोबाइल- 09412131404.
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समीक्षा
Thursday
बाज़ारवाद के बढ़ते प्रभाव में ‘मड़ई’ की महत्ता !
बाज़ारवाद की अपसंस्कृति ने हमारी लोक परंपरा व संस्कृति को जिस तरह से मर्माहत करना प्रारंभ किया है यह भविष्य के भयावह दृश्य का रिहर्सल-मात्र है। साजिशें रची जा रही है, आततायी लुभावने शब्दों के साथ सुंदर, सम्मोहक खिलौने लिए खड़े हैं दरवाजे पर। हमारी लोक परंपराओं को बाज़ार का रास्ता दिखाया जा रहा है। सुमधुर भोजपुरी गीत बाजार की भाषा बन अपसंस्कृति व उदंडता की परवान चढ़ रहे हैं, उदाहरण अनेक हैं। भाषा-संस्कृति और परम्परा सभी कुछ बाजार से मिल रही चुनौतियों के समक्ष पराजित मुद्रा में असहाय दिख रही हैं। वक्त बाजार की इन विकृतियों से बचने का है। वक्त सांस्कृतिक प्रदूषण के प्रतिरोध का है। लिहाजा ‘मड़ई’ सदृश्य स्वस्थ-सुरूचि समपन्न साहित्य व लोक संस्कृति पर एकाग्र पत्रिका की भूमिका और अधिक बढ़ जाती है। ‘मड़ई’, रजत जयंती अंक के संपादकीय में संपादक- डा. कालीचरण यादव ने बाजारवाद की विकृतियों से उत्पन्न खतरे से आमजन को अगाह करने का विनम्र प्रयास किया है। संपादक ने लोक संस्कृति पर केन्द्रित उत्कृष्ट शोधपरक रचनाओं का इस अंक में समावेश कर अंक को सार्थक बनाया, संपादक का यह श्रमसाध्य कार्य स्तुत्य है।
‘मड़ई’, संपादकः डा. कालीचरण यादव, बनियापारा, जूना बिलासपुर(छ.ग.) फोन- 07752 223206., पृ.- 268, निःशुल्क वितरण !
‘मड़ई’, संपादकः डा. कालीचरण यादव, बनियापारा, जूना बिलासपुर(छ.ग.) फोन- 07752 223206., पृ.- 268, निःशुल्क वितरण !
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समीक्षा
Monday
रचनाकार अपने आसपास घट रही घटनाएँ निरंतर देखें... (प्रमोद वर्मा संस्थान का तीसरा युवा रचना शिविर सम्पन्न)
नये रचनाकारों को लिखने से अधिक पढ़ना चाहिए। वरिष्ठ साहित्यकारों की रचनाओं को पढ़ना, आत्मसात करना फिर लिखना ही एक मंत्र है। अधिकांश नया लेखक हड़बड़ी में रहता है जबकि साहित्य की कोई भी विधा मुकम्मल समय मांगती है। प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के अध्यक्ष विश्वरंजन ने रायगढ़ में पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय स्मृति युवा रचना शिविर को संबोधित करते हुए कहा कि नये समय की अदृश्य चुनौतियों पर गंभीरता से विचार करना आज सभी युवा लेखकों का कर्तव्य होना चाहिए । उद्घाटन अवसर के मुख्य अतिथि प्रो. रोहिताश्व ने कहा कि वे संस्थान के हर शिविर में आते रहे हैं । छत्तीसगढ़ में जिस तरह यह संस्थान राग-द्वेष से मुक्त होकर नवागत लेखकों के लिए उद्यम कर रहा है वह देश के बड़े बड़े प्रतिष्ठानों के वश की बात नहीं । संस्थान द्वारा आयोजित यह तीसरा रचना शिविर था जो 7 से 9 जनवरी तक चला । शिविर की शुरूआत रायगढ़ के युवा संगीतकार श्री मनहरण सिंह ठाकुर व चंद्रा देवांगन द्वारा महाकवि निराला के गीत गायन से हुई । उद्घाटन सत्र का संचालन करते हुये युवा लेखक श्याम नारायण श्रीवास्तव ने सर्वप्रथम आमंत्रित वरिष्ठ साहित्यकारों का परिचय कराया । स्वागत भाषण दिया सुपरिचित आलोचक डॉ. बलदेव ने ।
ज्ञातव्य है कि संस्थान द्वारा देश के युवा एवं संभावनाशील रचनाकारों विशिष्ट और वरिष्ठ साहित्यकारों के माध्यम से साहित्य के मूलभूत सिद्धान्तों, विधागत विषेशताओं, परंपरां व समकालीन प्रवृत्तियों से परिचित कराने, उनमें संवेदना और अभिव्यक्ति कौशल को¨ विकसित करने, प्रजातांत्रिक और शाश्वत जीवन मूल्यों के प्रति उन्मुखीकरण तथा स्थापित लेखक और उनकी रचनाधर्मिता से परिचित कराने की महत्वाकांक्षी योजना के अन्तर्गत छत्तीसगढ़ की विभिन्न जनपदों में निःशुल्क रचना शिविर आयोजित किया जा रहा है।
12 से अधिक कृतियों का विमोचन
शिविर के उद्घाटन अवसर पर कुछ प्रमुख कृतियों का विमोचन हुआ । जिसमें - फ़िराक़ गोरखपुरी पर केंद्रित एकाग्र कुछ ग़में जाना कुछ ग़में दौरा (विश्वरंजन ), आलोचनात्मक कृति “साहित्य की सदाशयता ( जयप्रकाश मानस ), ललित निबन्ध संग्रह परम्परा का पुनराख्यान ( डॉ. श्रीराम परिहार ) छंद प्रभाकर ( डॅा. सुशील त्रिवेदी ) छंद प्रभाकर ( आचार्य जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' रचित कृति - डॉ. सुशील त्रिवेदी),बाल कविता संग्रह- मैना की दूकान (शंभु लाल शर्मा वसंत), व्यंग्य संग्रह- कार्यालय तेरी अकथ कहानी (वीरेन्द्र सरल ) हिंदी के प्रथम साहित्य-शास्त्री- जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' ( डॉ. सुशील त्रिवेदी ) , छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह (शिव कुमार पाण्डेय), गीत संग्रह (गीता विश्वकर्मा), संग्रह संस्थान की त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका पाण्डुलिपि का पांचवा अंक, कविता संग्रह टूटते सितारों की उड़ान (लक्ष्मी नारायण लहरे) कविता संग्रह सुगीत कलश (भागवत कश्यप) आदि प्रमुख कृतियाँ हैं ।
12 से अधिक कृतियों का विमोचन
शिविर के उद्घाटन अवसर पर कुछ प्रमुख कृतियों का विमोचन हुआ । जिसमें - फ़िराक़ गोरखपुरी पर केंद्रित एकाग्र कुछ ग़में जाना कुछ ग़में दौरा (विश्वरंजन ), आलोचनात्मक कृति “साहित्य की सदाशयता ( जयप्रकाश मानस ), ललित निबन्ध संग्रह परम्परा का पुनराख्यान ( डॉ. श्रीराम परिहार ) छंद प्रभाकर ( डॅा. सुशील त्रिवेदी ) छंद प्रभाकर ( आचार्य जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' रचित कृति - डॉ. सुशील त्रिवेदी),बाल कविता संग्रह- मैना की दूकान (शंभु लाल शर्मा वसंत), व्यंग्य संग्रह- कार्यालय तेरी अकथ कहानी (वीरेन्द्र सरल ) हिंदी के प्रथम साहित्य-शास्त्री- जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' ( डॉ. सुशील त्रिवेदी ) , छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह (शिव कुमार पाण्डेय), गीत संग्रह (गीता विश्वकर्मा), संग्रह संस्थान की त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका पाण्डुलिपि का पांचवा अंक, कविता संग्रह टूटते सितारों की उड़ान (लक्ष्मी नारायण लहरे) कविता संग्रह सुगीत कलश (भागवत कश्यप) आदि प्रमुख कृतियाँ हैं ।
इस रचना शिविर में समकालीन कविता : भाव, मूल्य और सरोकार व समकालीन कविता: शिल्प और संप्रेषणीयता सत्र की अध्यक्षता प्रतिष्ठित आलोचक व गोवा विश्वविद्यालय के प्रो.रोहिताश्व ने की और सत्र के प्रमुख वक्ता थे - बाँदा से पधारे कवि नरेन्द्र पुण्डरीक, कोलकाता के कवि व आलोचक प्रफुल्ल कोलख्यान व भिलाई के कवि नासिर अहमद सिकंदर । संचालन का दायित्व निभाया अशोक सिंघई ने । सत्र का निष्कर्ष था कि प्रत्येक रचनाकार को अपने आसपास घट रही घटनाओं को निरंतर देखना चाहिए, उनमें मानवीय संवेदनाओं को तलाशना चाहिये क्योंकि बिना भाव व संवेदना के कविता हो ही नहीं सकती, भाव के बिना कविता का कोई मूल्य नही है। निष्चय ही कविता का शिल्प भी उसकी संप्रेषणीयता में सहायक होता है ।
छांदस विधाओं पर तीन सत्र निर्धारित थे पहला गीत: भाव और शिल्प, दूसरा नवगीत: लघुक्षण में सघन भाव व्याकुलता तथा ग़ज़ल: हृदय का तनाव और भावाकृति । इस विषय पर अक्षत के संपादक और हिन्दी के प्रतिष्ठित ललित निबंधकार डॉ. श्री राम परिहार (खंडवा), रविशंकर विश्वविद्यालय के पूर्व रीडर और भाषाविद् डॉ. चितरंजन कर, वरिष्ठ गीतकार एवं आलोचक श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी (फतेहपुर), कवि रवि श्रीवास्तव (भिलाई) व वरिष्ठ शायर मुमताज (भिलाई) ने व्यापक मार्गदर्शन दिया व रचनाओं का परीक्षण कर सुझाव दिया । संचालन किया फैजाबाद के युवा रचनाकार अशोक कुमार प्रसाद ने ।
बालगीत: बाल मन की समझ और सहज संप्रेषणीयता जैसे नये विषय पर बाल साहित्य की तमाम बारीकियों पर एक सार्थक बहस हुई । जिसकी अध्यक्षता की वरिष्ठ दिल्ली से आमंत्रित बाल साहित्यकार रमेश तैलंग ने और प्रमुख वक्ता रहे शंभू लाल शर्मा बसंत, प्रफुल्ल कोलख्यान । रमेश तैलंग का मानना था कि बाल साहित्य की रचनाओं में उद्देश्यपूर्ण रूप से निहित होना चाहिए और हमें प्राचीन परम्परा से आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि आज के बच्चे विज्ञान और तकनीकी के परिवेश में पल रहे हैं । सत्र का कुशल संचालन डॉ. चितरंजन कर ने किया। कहानी विधा पर दो सत्र निर्धारित किये गये थे - कहानी कथा वस्तु और विविध शिल्प तथा कहानी मूल्य और सरोकार । इस महत्वपूर्ण विषयों पर डॉ. रोहिताश्व, प्रफूल्ल कोलख्यान, श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी, आदि ने कथाओं के शिल्प और कथ्य में हुए परिवर्तन और विकास पर सिलसिलेवार जानकारी देकर कई कहानियों का अनुशीलन किया ।
3 वरिष्ठ कवियों को साधना सम्मान
इस अवसर पर रायगढ़ के तीन वरिष्ठ कवियों जनकवि आनंदी सहाय शुक्ल, गुरुदेव काश्यप, ईश्वर शरण पांडेय को सुदीर्घ साहित्य साधना के लिए प्रमोद वर्मा साधना सम्मान से अंलकृत किया । उन्हें प्रशस्ति पत्र, शाल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह और संस्थान द्वारा प्रकाशित 2 हजार रुपयों की साहित्यिक कृतियां भेंट कर सम्मानित किया गया ।
कविता पाठ
कविता पाठ की बारीकियों से परिचित कराने के लिए आयोजन में वरिष्ठ और नवागत रचनाकारों के लिए दो दिन रचना पाठ का आयोजन भी किया गया जिसमें जनकवि आनन्दी सहाय शुक्ल, डॉ. रोहिताश्व, विश्वरंजन, प्रफुल्ल कोलख्यान, डॉ श्री राम परिहार, मुमताज, नरेन्द्र पुण्डीक, रमेश तैलंग, डॉ. सुशील त्रिवेदी, नरेन्द्र श्रीवास्तव, डॉ. चित्तरंजन कर, विजय राठौर, जयप्रकाश मानस, राम लाल निशाद, राम किशन डालमिया, शंभूलाल शर्मा आदि ने अपनी रचनाओं की माध्यम से नये रचनाकारों को शिल्प, भाव व सरोकार के प्रति सजग किया । एक अलग सत्र में 40 से अधिक युवा रचनाकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया जिसमें कुमार वरुण, रमेश कुमार सोनी, कन्दर्प कर्ष, कृष्णकुमार अजनबी, श्याम नारायण श्रीवास्तव, अंजनी कुमार अंकुर, अमित दूबे, ललित शर्मा, श्लेष चन्द्राकर, मो. शाहिद, कमल कुमार स्वर्णकार, गीता विश्वकर्मा, आशा मेहर किरण, वाशिल दानी, प्रमोद सोनवानी, देवकी डनसेना, बनवारी लाल देवांगन आदि प्रमुख हैं। इस आयोजन को सफल बनाने में स्थानीय युवा लेखक श्याम नारायण श्रीवास्तव, के. के. स्वर्णकार, अंजनी कुमार अंकुर के अलावा कमल बहिदार, कन्दर्पकर्ष, सुजीत कर, सनत चौहान, नील कमल वैष्णव, बसंत राघव, लक्ष्मी नारायण लहरे, शिवकुमार पांडेय, प्रभात त्रिपाठी, शिव शरण पाण्डेय, गिरिजा पांडेय, किशन कुमार कंकरवाल ने उल्लेखनीय भूमिका निभायी । समापन समारोह में संस्थान के अध्यक्ष व कार्यकारी निदेशक की ओर से सभी प्रतिभागियों को प्रतीक चिन्ह और प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया ।
रायगढ़ से श्याम नारायण श्रीवास्तव की रपट
मोबाइल नं --09827477442
छांदस विधाओं पर तीन सत्र निर्धारित थे पहला गीत: भाव और शिल्प, दूसरा नवगीत: लघुक्षण में सघन भाव व्याकुलता तथा ग़ज़ल: हृदय का तनाव और भावाकृति । इस विषय पर अक्षत के संपादक और हिन्दी के प्रतिष्ठित ललित निबंधकार डॉ. श्री राम परिहार (खंडवा), रविशंकर विश्वविद्यालय के पूर्व रीडर और भाषाविद् डॉ. चितरंजन कर, वरिष्ठ गीतकार एवं आलोचक श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी (फतेहपुर), कवि रवि श्रीवास्तव (भिलाई) व वरिष्ठ शायर मुमताज (भिलाई) ने व्यापक मार्गदर्शन दिया व रचनाओं का परीक्षण कर सुझाव दिया । संचालन किया फैजाबाद के युवा रचनाकार अशोक कुमार प्रसाद ने ।
बालगीत: बाल मन की समझ और सहज संप्रेषणीयता जैसे नये विषय पर बाल साहित्य की तमाम बारीकियों पर एक सार्थक बहस हुई । जिसकी अध्यक्षता की वरिष्ठ दिल्ली से आमंत्रित बाल साहित्यकार रमेश तैलंग ने और प्रमुख वक्ता रहे शंभू लाल शर्मा बसंत, प्रफुल्ल कोलख्यान । रमेश तैलंग का मानना था कि बाल साहित्य की रचनाओं में उद्देश्यपूर्ण रूप से निहित होना चाहिए और हमें प्राचीन परम्परा से आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि आज के बच्चे विज्ञान और तकनीकी के परिवेश में पल रहे हैं । सत्र का कुशल संचालन डॉ. चितरंजन कर ने किया। कहानी विधा पर दो सत्र निर्धारित किये गये थे - कहानी कथा वस्तु और विविध शिल्प तथा कहानी मूल्य और सरोकार । इस महत्वपूर्ण विषयों पर डॉ. रोहिताश्व, प्रफूल्ल कोलख्यान, श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी, आदि ने कथाओं के शिल्प और कथ्य में हुए परिवर्तन और विकास पर सिलसिलेवार जानकारी देकर कई कहानियों का अनुशीलन किया ।
3 वरिष्ठ कवियों को साधना सम्मान
इस अवसर पर रायगढ़ के तीन वरिष्ठ कवियों जनकवि आनंदी सहाय शुक्ल, गुरुदेव काश्यप, ईश्वर शरण पांडेय को सुदीर्घ साहित्य साधना के लिए प्रमोद वर्मा साधना सम्मान से अंलकृत किया । उन्हें प्रशस्ति पत्र, शाल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह और संस्थान द्वारा प्रकाशित 2 हजार रुपयों की साहित्यिक कृतियां भेंट कर सम्मानित किया गया ।
कविता पाठ
कविता पाठ की बारीकियों से परिचित कराने के लिए आयोजन में वरिष्ठ और नवागत रचनाकारों के लिए दो दिन रचना पाठ का आयोजन भी किया गया जिसमें जनकवि आनन्दी सहाय शुक्ल, डॉ. रोहिताश्व, विश्वरंजन, प्रफुल्ल कोलख्यान, डॉ श्री राम परिहार, मुमताज, नरेन्द्र पुण्डीक, रमेश तैलंग, डॉ. सुशील त्रिवेदी, नरेन्द्र श्रीवास्तव, डॉ. चित्तरंजन कर, विजय राठौर, जयप्रकाश मानस, राम लाल निशाद, राम किशन डालमिया, शंभूलाल शर्मा आदि ने अपनी रचनाओं की माध्यम से नये रचनाकारों को शिल्प, भाव व सरोकार के प्रति सजग किया । एक अलग सत्र में 40 से अधिक युवा रचनाकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया जिसमें कुमार वरुण, रमेश कुमार सोनी, कन्दर्प कर्ष, कृष्णकुमार अजनबी, श्याम नारायण श्रीवास्तव, अंजनी कुमार अंकुर, अमित दूबे, ललित शर्मा, श्लेष चन्द्राकर, मो. शाहिद, कमल कुमार स्वर्णकार, गीता विश्वकर्मा, आशा मेहर किरण, वाशिल दानी, प्रमोद सोनवानी, देवकी डनसेना, बनवारी लाल देवांगन आदि प्रमुख हैं। इस आयोजन को सफल बनाने में स्थानीय युवा लेखक श्याम नारायण श्रीवास्तव, के. के. स्वर्णकार, अंजनी कुमार अंकुर के अलावा कमल बहिदार, कन्दर्पकर्ष, सुजीत कर, सनत चौहान, नील कमल वैष्णव, बसंत राघव, लक्ष्मी नारायण लहरे, शिवकुमार पांडेय, प्रभात त्रिपाठी, शिव शरण पाण्डेय, गिरिजा पांडेय, किशन कुमार कंकरवाल ने उल्लेखनीय भूमिका निभायी । समापन समारोह में संस्थान के अध्यक्ष व कार्यकारी निदेशक की ओर से सभी प्रतिभागियों को प्रतीक चिन्ह और प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया ।
रायगढ़ से श्याम नारायण श्रीवास्तव की रपट
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आयोजन
Friday
युवा कवि राजकिशोर राजन को ‘जनकवि रामदेव भावुक स्मृति-सम्मान’
| कवि राजकिशोर राजन |
पटना, युवा कवि राजकिशोर राजन को वर्ष 2011 का ‘जनकवि रामदेव भावुक स्मृति-सम्मान’ दिए जाने की घोषणा ‘रचना’ (एक साहित्यिक मंच) की ओर से स्थानीय केदार भवन, अमरनाथ रोड, पटना के कविवर कन्हैया कक्ष में की गई। संस्था के अध्यक्ष तथा वरिष्ठ साहित्यकार छंदराज ने कहा कि युवा कवि राजकिशोर राजन के अबतक तीन कविता-संग्रह छपे हैं। इन्हें पूर्व में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद सहित अन्य महत्वपूर्ण संस्थाओं ने भी सम्मानित किया है। राजभाषा विभाग, पूर्व मध्य रेल, हाजीपुर में कार्यरत राजकिशोर राजन की कविताओं में मनुष्य की पक्षधरता धारदार रूप से दिखाई देती है।
पुरस्कार चयन समिति के सदस्यों में चर्चित कवि शहंशाह आलम तथा राज्यवर्द्धन भी थे।
राजन की कविताएं ‘वर्तमान साहित्य’ व ‘दस्तावेज’ के ताजे अंक में भी ...
पुरस्कार चयन समिति के सदस्यों में चर्चित कवि शहंशाह आलम तथा राज्यवर्द्धन भी थे।
राजन की कविताएं ‘वर्तमान साहित्य’ व ‘दस्तावेज’ के ताजे अंक में भी ...
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सम्मान
Tuesday
डॉ. देवसरे को साहित्य अकादेमी का बालसाहित्य पुरस्कार 2011
हिन्दी में साहित्य अकादेमी का बालसाहित्य पुरस्कार 2011 वरिष्ठ बालसाहित्यकार डॉ. हरिकृष्ण देवसरे को उनके आजीवन योगदान के लिए आज उनके आवास (ब्रजविहार, गाजियाबाद) पर साहित्य अकादेमी के उपसचिव श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी के हाथों प्रदान किया गया। पुरस्कार के अंतर्गत 50,000 रुपये की राशि का चेक और प्रतीक चिह्न शामिल हैं। इसके पहले उन्होंने पुष्पगुच्छ और शॉल ओढ़ाकर डॉ. देवसरे का अभिनंदन किया। उन्होंने प्रशस्ति-पाठ करते हुए डॉ. देवसरे के अमूल्य योगदान को रेखांकित किया। इस अवसर पर उनके पुत्र श्री शशांक, पुत्री श्रीमती शिप्रा, पत्नी श्रीमती विभा देवसरे तथा बालसाहित्य लेखक श्रीमती शांता ग्रोवर, श्रीमती मधुमालती जैन एवं देवेन्द्र कुमार देवेश (तीनों अकादेमी में कार्यरत) उपस्थित थे। ध्यातव्य है कि अकादेमी के बालसाहित्य पुरस्कार 24 भारतीय भाषाओं के लिए 14 नवंबर 2011 को अकादेमी के अध्यक्ष श्री सुनील गंगोपाध्याय के हाथों कोलकाता में समारोहपूर्वक प्रदान किए गए थे, जिसमें अपनी अस्वस्थता के कारण डॉ. देवसरे नहीं पहुँच पाए थे। पुरस्कार-प्राप्ित के बाद डॉ. देवसरे ने बालसाहित्य को प्रोत्साहित करने के लिए अकादेमी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि साहित्येतिहास के लोग अभी तक बालसाहित्य को साहित्य के इतिहास में सम्मिलित नहीं कर पाए, लेकिन अब निश्चित रूप से यह माना जाएगा कि बालसाहित्य साहित्य की एक ऐसी विधा है, जो निरंतर उन्नति कर रही है और अब वह ऐसे स्तर पर पहुँच गई है कि उसको इतिहास में भी महत्व मिलना चाहिए और मिलेगा, अवश्य मिलेगा। इस दिशा में काम भी हो रहा है और अच्छी बात ये है कि जो दृष्टिकोण है साहित्य अकादेमी का, वह नया है, आधुनिक है और वह समसामयिक है।
- देवेन्द्र कुमार देवेश
उपसंपादक
साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, मो.- 09868456153
उपसंपादक
साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, मो.- 09868456153
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सम्मान
Friday
बहुमुखी प्रतिभा के बेचैन कवि हैं उद्भ्रांत- शहंशाह आलम
‘समकालीन साहित्य मंच’ मुंगेर के तत्वावधान में स्थानीय बदरुन मंजि़ल, गुलज़ार पोखर, में वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत के सद्यः प्रकाशित कविता-संग्रह ‘अस्ति’ पर एक सारगर्भित विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता चर्चित शायर डा. अनिरुद्ध सिन्हा ने की तथा संचालन युवा कवि शहंशाह आलम ने किया। विषय प्रवर्तन करते हुए शहंशाह आलम ने कहा कि उद्भ्रांत बहुमुखी प्रतिभा के एक बेचैन कवि हैं। उनकी बेचैनी का मुख्य कारण समाज और उनके आस-पास की त्रासदियाँ हैं और इन त्रासदियों में उनकी रचनात्मकता छटपटाहट की शक्ल अखि़तयार करती नज़र आती है। ‘अस्ति’ की सारी कविताएँ इन्हीं त्रासदियों की अभिव्यक्ति के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत होती हैं। कवि के हृदय में विद्रोह की आग है, वह आग जब पाठक आत्मसात करता है तब स्वतः ही उसके समक्ष अपने समाज और देश का एक नया क्षितिज उद्घाटित होता है। स्पष्ट है कि कवि ने अपनी कविताओं में सिर्फ़ विद्रोह के रूप में विध्वंस को ही निमंत्रित नहीं किया है, बल्कि प्रगतिशीलता की डोर पकड़कर बेहतर भविष्य की कल्पना भी की है। संगोष्ठी के अध्यक्ष डा. अनिरुद्ध सिन्हा ने कहा कि ‘अस्ति’ की कविताओं के सुर हमें ख़ामोशी की दलदल की ओर नहीं ले जाते हैं, बल्कि हमें उठ खड़े होने तथा समाज की बेहतरी के लिए कुछ कर गुज़रने को विवश करते हैं। कवि उद्भ्रांत की कविताएँ सामाजिक परिप्रेक्ष्य की कसौटी पर खरी उतरती हैं। इसके साथ ही, कविताओं की सार्थकता उस समय और अधिक हो जाती है जब वे हमें स्वयं को और गहराई से पढ़ने के लिए विवश कर देती हैं। हिन्दी कविता के समक्ष जो पठनीयता का संकट है, ‘अस्ति’ की कविताएँ उसका प्रतिवाद करती हैं। यह कवि की सफलता है जिसमें अभिव्यक्ति और पठनीयता साथ-साथ चलती है। हिन्दी ग़ज़ल के समर्थ ग़ज़लकार अशोक आलोक ने कहा कि हिन्दी कविता कथ्य और बड़े कैनवस के लिए जानी जाती है। समकालीन कोई भी समर्थ कवि घटनाओं के घटने से पूर्व ही उसका आभास पाठकों को कराते हुए अपने यथासंभव विरोध की उपस्थिति दर्ज़ करवा देता है। इस दृष्टि से ‘अस्ति’ की कविताएँ हमें उद्भ्रांत की प्रगतिशीलता से आश्वस्त करवाती हैं।
उर्दू के समर्थ रचनाकार प्रो. इमाम अनीस ने ‘अस्ति’ की कविताओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि हिन्दी और उर्दू में समकालीन विचारधाराओं का एक मज़बूत स्वर सुनाई दे रहा है। उस स्वर में हम अपने जीवन की कई झाँकियों की व्याख्या सुनते हैं। कवि उद्भ्रांत की कविताओं में आगत के स्वर तो हैं ही, साथ ही सकारात्मक वैचारिक सोच की अभिव्यक्ति भी है। युवा ग़ज़लकार विकास ने कहा कि उद्भ्रांत की कविताओं में समकालीन विद्रूपताओं का रुदन ही नहीं है, एक बेहतर भविष्य की कल्पना भी है। इससे स्पष्ट होता है कि कवि आग पर चलते हुए शीतलता की खोज में गतिमान हैं। इससे आने वाली पीढ़ी उनकी इस रचनात्मकता से लाभ उठाएगी।
इसके अतिरिक्त समाजकर्मी हबीब-उर-रहमान, युवा कवयित्री यशस्वी, युवा कवि समीर कुमार, धीरज कुमार आदि ने भी ‘अस्ति’ पर अपने-अपने विचार प्रकट किए।
-अनिरुद्ध सिन्हा
इसके अतिरिक्त समाजकर्मी हबीब-उर-रहमान, युवा कवयित्री यशस्वी, युवा कवि समीर कुमार, धीरज कुमार आदि ने भी ‘अस्ति’ पर अपने-अपने विचार प्रकट किए।
-अनिरुद्ध सिन्हा
Wednesday
बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का 14 वाँ राज्य सम्मेलन ... जुटेंगे साहित्यकार ।
बिहार प्रगतिशील लेखक संघ की पूर्णिया इकाई के प्रस्ताव पर दिनांक 11 एवं 12 फरवरी (रविवार) को बिहार प्रगतिशील लेखक संघ का 14 वाँ राज्य सम्मेलन पूर्णिया में संयोजित होने जा रहा है। जिसमें प्रलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. नामवर सिंह, डा. खगेन्द्र ठाकुर, महासचिव प्रो. अली जावेद, समालोचक- चौथीराम यादव सहित अन्य प्रतिष्ठित साहित्यकार भाग लेंगे।
इस प्रान्तीय सम्मेलन की रूपरेखा निर्धारित करने हेतु राज्य कार्यसमिति की एक आवश्यक बैठक दिनांक - 11 दिसम्बर 2011. रविवार को 12 बजे से प्रान्तीय कार्यालय - केदार भवन (जनशक्ति परिसर, अमरनाथ रोड, पटना -1) में होगी। आप सादर आमंत्रित हैं।
संपर्क: महासचिव (बिहार प्रलेस) मो.- 09471456304.
संपर्क: महासचिव (बिहार प्रलेस) मो.- 09471456304.
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Tuesday
साझे सपनों को साकार करता ‘दोआबा’ का यह अंक
'दोआबा' अंक - 10 अपने आकर्षक कलेवर और संपादक के रूचिकर रचना-चयन जैसे श्रमसाध्य अनुष्ठान का प्रतिफल है। यही कारण है कि दोआबा अपनी उपादेयता को मूल्यवान बनाने के साथ-साथ यह साहित्य जगत की अनिवार्य पत्रिका भी बन जाती है।
'दोआबा' के इस अंक में सुचयनित कविता एवं कहानियों में सिएथल, मीरा कुमार, स्नेहमयी चैधरी, सोनिया सिरसाट, राजेन्द्र नागदेव, राजकुमार कुम्भज, रामकुमार आत्रेय, सुशील कुमार, अशोक गुप्त, भारत भूषण आर्य और ज्ञानप्रकाश विवेक सम्मलित हैं। मीरा कांत का एकल नाटक- गली दुल्हनवाली, आत्मगत में मधुरेश और मनमोहन सरल का आलेख - भारत की आत्मा के चितेरे थे हुसेन के साथ संवेदना व वैचारिकता से पूर्ण संपादक जाबिर हुसेन के संपादकीय- ... मैं तुम्हारे शहर आऊँगा, सोहा, फिर आऊँगा... गहन सूक्ष्मता संजोए यथार्थ व संवेदनाओं का खूबसूरत कोलाज है।
इस अंक में प्रकाशित मीरा कुमार की कविता ‘साझा सपने’ की एक बानगी-
है तुम्हारी पलकों पर इन्द्रधनुष
उसके रंग मेरी आंखों में तैर रहे
तुममें और मुझमें
ये सपनों की कैसी साझेदारी है
...........
........ - अध्यक्ष, लोक सभा, नई दिल्ली।
दोआबा / संपादकः जाबिर हुसेन
सी-703, स्वर्ण जयंती सदन, डा बी डी मार्ग, नई दिल्ली 110 001.
मोबाइल- 09868181042.
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Saturday
जन - बातों को समग्रता से समेटने की सार्थक पहल है ‘प्रसंग’ का संस्मरण अंक
‘प्रसंग’ के इस अंक में प्रतिष्ठित लेखकों ने विभिन्न तरह की स्मृतियों को रचनात्मक वाणी दी है। शताब्दी पूरा करने वाले अपने दिवंगत महान रचनाकारों में राधाकृष्ण, उपन्द्रनाथ अश्क, शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, फादर कामिल बुल्के और तेलगु के महाकवि श्री श्री के रचनात्मक व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत किया गया है। अंक में गोपाल सिंह नेपाली और फैज अहमद फैज़ की कविताए हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर की डेढ़ सौवीं जयन्ती के अवसर पर उनकी अति विशिष्ट कविता का शब्दान्तर प्रस्तुत है। साहित्य को नयी दृष्टि और दिशा देने वाले त्रिलोचन, अज्ञेय, राजकमल चैधरी, गोरख पाण्डेय, महेश्वर, भवानी प्रसाद मिश्र, कुँवरपाल सिंह और मार्कण्डेय जैसे कई शख्सियतों का मूल्यांकन एवं संस्मरण साहित्य पर आलेख हैं साथ ही मरुधर मृदंल, विजय बहादुर सिंह और वीर भारत तलवार से समकालीन रचनाधर्मिता पर बातचीत से अंक समृद्ध है। प्रसंग, पृ. 418. मूल्य- 50/ संपादक- शम्भू बादल, सूरज-घर, जबरा रोड, कोर्रा, हजारीबाग- 825301. झारखंड, मोबाइल- 09931182570.
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Tuesday
कमला प्रसाद ने कहा था - साहित्य कला का मूल प्रायोजन उदात्त और सुसंस्कृत समाज की रचना है।
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| कमला प्रसाद के साथ अरविन्द श्रीवास्तव |
बाजार में क्या नहीं है? बाजार में सब है, धन है, कीर्ति, धर्म-कर्म, अर्थ- काम, मोक्ष सब है। ऐसे में साहित्य क्या कर सकता है। निश्चय ही संवेदना की रक्षा विखण्डन में से संश्लेषणात्मक विचारों और भावों के नये रचनात्मक रूपाकारों को मानवीय गरिमा प्रदान करना उसका लक्ष्य रहा है। इसी उद्देश की प्रतिबद्धता उसे लाभ-लोभ से बाहर रखने का दबाव देती थी। रचनाकार को विपक्ष में होने को मजबूर करती थी। मार्क्स के शब्दों में कहें ‘पूंजीवाद युग में साहित्य को साहित्य मात्र बने रहने और कला को कला बने रहने के लिए पूंजीवाद का विरोध करना पड़ता है।’ मार्क्स ने सौन्दर्यशास्त्र पर कोई स्वतंत्र पुस्तक नहीं लिखी पर व्यक्ति, समाज, जीवन, सृष्टि और प्रकृति के सार्वभौमिक स्वरूप पर विचार करते हुए इस अपरिहार्य मानवीय कर्म की व्याख्या की है। उन्होंने लेखकों को आगाह किया है कि वे रचनाकर्म को लोभ का साधन न बनाएं। यह काम जिन्दा रहने की जरूरतों के लिए नहीं है। साहित्य कला में मूलतः रचनाकार का इंद्रियबोध-भावबोध व्यक्त होता है जिसमें मनुष्य स्वतंत्र होकर अपने पैरों पर खड़ा हो सके। इन्द्रियों को निर्बन्ध बना सके, विचारों का मानवीयकरण-समाजीकरण हो सके और मनुष्यता के दायरे में कृत्रिम रूप से निर्मित विभेदों की समाप्ति हो सके। साहित्य कला का मूल प्रायोजन उदात्त और सुसंस्कृत समाज की रचना है। मनुष्य को अपनी मनुष्यता इन्हीं रूपाकारों में अर्जित कर विकसित करनी पड़ती है। - बिहार प्रलेस संवाद
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प्रलेस
Friday
राजेन्द्र यादव की दिक्कत यह है कि वे गंभीर बातों के कारण चर्चा में रहना नहीं चाहते ... ‘एक और अन्तरीप’ में हेतु भारद्वाज ।
राजस्थान की साहित्यिक परंपरा में ‘एक और अन्तरीप’ (संपादक- डा. अजय अनुरागी एवं डा. रजनीश संपर्क- 1.न्यू कालोनी, झोटवाड़ा, पंखा, जयपुर- 302012. राज., मोबाइल- 09468791896) का लंबे अंतराल के बाद साहित्य जगत में सुखद व साथर्क हस्तक्षेप हुआ। पत्रिका के प्रधान संपादक प्रेमकृष्ण शर्मा का मानना है कि लधु पत्रिका निकालना या साहित्य रचना करना कोई विलासिता नहीं है, बल्कि अपने रक्त से उस हथियार को निर्माण करना है जो मानव-मुक्ति की लड़ाई में कारगर होकर मानव को शोषण चक्र से मुक्त करेगा। ‘एक और अन्तरीप’ उन्हीं लोगों के साथ है जो मानव मुक्ति के संग्राम में सक्रिय रहे हैं...। अंक में ‘जटिल समय के सहज कविः गोविन्द माथुर’ शीर्षक से संपादक अजय अनुरागी ने कवि गोविन्द माथुर के कविता कर्म का सहृदयता से मूल्यांकण किया है, उनका मानना है कि गोविन्द माथुर की कविताएँ दुरूहताओं और भयावहताओं से परे है। इन्हें पढ़ने के लिए अतिरिक्त तैयारी या विशेष मानसिक योग्यता की जरूरत नही है। ये कविताएँ हलचल रहित शालीन शैली में लिखी गई है। गोविन्द माथुर की कविताओं की गंभीरता व समय की विद्रुपता पर व्यंग्य को मुक्तस़र में देखें-
कौन पूछता है कवियों को /अच्छे पद पर हों तो बात और है।
एक और बानगी
‘हम उन्हें कवि नहीं मानते / क्योंकि वे हमारे गुट में नहीं है।’
गोविन्द माथुर युवा कवियों के आचरण को भी गहराई में जाकर झकझोरते हैं -
युवा कवि होने के लिए/लबादे की तरह विद्रोह ओढ़े रहना चाहिए/सुविधा भोगते हुए भी/हमेशा असन्तुष्ट और नाराज दिखते रहना चाहिए/हर समय होठों पर/टिकाए रखना चाहिए किंग साइज सिगरेट/हर शाम शराब पीते हुए/अपने वरिष्ठ कवियों को गाली देते रहना चाहिए।
गोविन्द माथुर की कविताएँ अपने कथ्य व शिल्प की जहजता के साथ पाठकों को उद्वेलित करती हैं। अंक में वरिष्ठ साहित्यकार हेतु भारद्वज से डा. नरेन्द्र इष्टवाल से बातचीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इधर साहित्य में चले विभिन्न विमर्शों यथा- स्त्री, दलित जैसे मुद्दों पर हेतु भारद्वाज ने खुल कर विचार व्यक्त किए हैं। राजेन्द्र यादव के स्टैण्ड को व्यख्यायित करते हुए वे कहते हैं - ‘राजेन्द्र यादव की दिक्कत यह है कि वे गंभीर बातों के कारण चर्चा में रहना नहीं चाहते बल्कि हल्की बातों को लेकर चर्चा में बने रहने का प्रयास करते हैं। उन्होंने प्रयास यही किया कि वे ‘हंस’ को अपने नेतृत्व के लिए इस्तमाल करें और उन्होंने स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के झण्डे बुलन्द किए। उन्होंने स्त्री और दलित को पूरे समाज से अलग करके देखा। उसका नतीजा यह हुआ कि दलित विमर्श उनकी साहित्यिक राजनीति का हिस्सा बन गया और स्त्री विमर्श उनका व्यक्तिगत मामला।’ अंक में कवि शताब्दी के अंतर्गत फैज अहमद फैज की जन्मशती वर्ष पर रामनिहाल गुंजन का आलेख - जब तख्त गिराये जाएँगे,जब ताज उछाले जायेंगे’ रोचकता से पूर्ण है। चार कहानियाँ सहित कविता की एक मुकम्मल दुनिया अंक की सार्थकाता पर मुहर लगाती है। विमर्श में डा. रंजना जायसवाल का आलेख ‘सैक्स का पाखण्ड’ कई मिथकों को खारिज करती है। रंजना का मानना है कि -सेक्स शिक्षा इसलिए जरूरी है कि सेक्स के मनोविज्ञानिक पहलू को भी समझा जा सके वरना सेक्स का सेंसेक्स कभी भी इतना गिर सकता है कि स्त्री-पुरुष का स्वभाविक प्रेम खत्म हो जाएगा। ‘एक और अन्तरीप’ का सिलसिला आगे भी चलता रहे ऐसी सुखद कामना की जाय।
कौन पूछता है कवियों को /अच्छे पद पर हों तो बात और है।
एक और बानगी
‘हम उन्हें कवि नहीं मानते / क्योंकि वे हमारे गुट में नहीं है।’
गोविन्द माथुर युवा कवियों के आचरण को भी गहराई में जाकर झकझोरते हैं -
युवा कवि होने के लिए/लबादे की तरह विद्रोह ओढ़े रहना चाहिए/सुविधा भोगते हुए भी/हमेशा असन्तुष्ट और नाराज दिखते रहना चाहिए/हर समय होठों पर/टिकाए रखना चाहिए किंग साइज सिगरेट/हर शाम शराब पीते हुए/अपने वरिष्ठ कवियों को गाली देते रहना चाहिए।
गोविन्द माथुर की कविताएँ अपने कथ्य व शिल्प की जहजता के साथ पाठकों को उद्वेलित करती हैं। अंक में वरिष्ठ साहित्यकार हेतु भारद्वज से डा. नरेन्द्र इष्टवाल से बातचीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इधर साहित्य में चले विभिन्न विमर्शों यथा- स्त्री, दलित जैसे मुद्दों पर हेतु भारद्वाज ने खुल कर विचार व्यक्त किए हैं। राजेन्द्र यादव के स्टैण्ड को व्यख्यायित करते हुए वे कहते हैं - ‘राजेन्द्र यादव की दिक्कत यह है कि वे गंभीर बातों के कारण चर्चा में रहना नहीं चाहते बल्कि हल्की बातों को लेकर चर्चा में बने रहने का प्रयास करते हैं। उन्होंने प्रयास यही किया कि वे ‘हंस’ को अपने नेतृत्व के लिए इस्तमाल करें और उन्होंने स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के झण्डे बुलन्द किए। उन्होंने स्त्री और दलित को पूरे समाज से अलग करके देखा। उसका नतीजा यह हुआ कि दलित विमर्श उनकी साहित्यिक राजनीति का हिस्सा बन गया और स्त्री विमर्श उनका व्यक्तिगत मामला।’ अंक में कवि शताब्दी के अंतर्गत फैज अहमद फैज की जन्मशती वर्ष पर रामनिहाल गुंजन का आलेख - जब तख्त गिराये जाएँगे,जब ताज उछाले जायेंगे’ रोचकता से पूर्ण है। चार कहानियाँ सहित कविता की एक मुकम्मल दुनिया अंक की सार्थकाता पर मुहर लगाती है। विमर्श में डा. रंजना जायसवाल का आलेख ‘सैक्स का पाखण्ड’ कई मिथकों को खारिज करती है। रंजना का मानना है कि -सेक्स शिक्षा इसलिए जरूरी है कि सेक्स के मनोविज्ञानिक पहलू को भी समझा जा सके वरना सेक्स का सेंसेक्स कभी भी इतना गिर सकता है कि स्त्री-पुरुष का स्वभाविक प्रेम खत्म हो जाएगा। ‘एक और अन्तरीप’ का सिलसिला आगे भी चलता रहे ऐसी सुखद कामना की जाय।
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Monday
गीतांजलि के हिन्दी अनुवाद : रेवती रमण
विश्वकवि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक सौ पचासवीं जयंती के अवसर पर अनेक आयोजन हुए हैं। भारत की सभी प्रमुख भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं में उनके जीवन और साहित्य से संबद्ध लेख आदि प्रकाशित हुए हैं। उनकी रचनाओं के अनुवाद तो उन्नीसवीं सदी क अंतिम दशक में ही प्रकाशित होने लगे थे। डॉ. देवेन्द्र कुमार देवेश की पुस्तक ‘गीतांजलि के हिन्दी अनुवाद’ को इसी परिप्रेक्ष्य में एक हिन्दी कवि-लेखक का अनोखा उपहार समझना चाहिए। इससे बेहतर विश्वकवि को दी गई कोई श्रद्धांजलि नहीं हो सकती। देवेश की यह किताब इसलिए भी खास तौर पर पठनीय है कि इससे अनेक भ्रमों को निवारण होता है। कम लोग जानते हैं कि पुरस्कृत ‘गीतांजलि’ की अंग्रेजी रचनाऍं गद्यात्मक हैं, पद्यात्मक नहीं। उनका प्रभाव भले काव्यात्मक हो। एक बड़ा भ्रम यह है कि बांग्ला ‘गीतांजलि’ के अनुवादक डब्ल्यू. बी. येट्स हैं। इस भ्रम को प्रचारित करने में कुछ पश्चिमी लेखकों की भी विवादास्पद भूमिका है। इस विडंबना से हिन्दी के लेखक भी नहीं बचे। मसलन गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपनी प्रतिबंधित कृति ‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ में लिखा है, ‘’आयरलैण्ड के विश्वविख्यात कवि डब्ल्यू. बी; येट्स ने उनकी (रवीन्द्रनाथ की) गीतांजलि का अंग्रेजी में अनुवाद किया।‘’ यही बात अमृतलाल नागर और त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी ने भी शब्द-भेद से कही। देवेश ने गहरी छानबीन के उपरांत स्पष्ट कर दिया है कि अंग्रेजी गीतांजलि विश्वकवि की स्व-रचित सामग्री है। उन्होंने शब्द गिनकर दिखाया है। मुश्किल से तीस-पैंतीस ऐसे शब्द हैं, जो येट्स के संशोधन के साक्ष्य देते हैं। येट्स के साथ ऐण्ड्रूज का नाम भी इस परिप्रेक्ष्य में लिया जाता है। लेकिन देवेश ने इस भ्रांति को भी निर्मूल सिद्ध किया है। प्रस्तुत शोधालोचना का मुख्य प्रतिपाद्य ‘गीतांजलि’ के हिन्दी अनुवादों से संबद्ध है। इसके लिए दो पूरे अध्याय हैं। पद्यात्मक और गद्यात्मक अनुवादों के विवेचन-विश्लेषण के लिए अलग-अलग अध्याय। भिन्न अनुवादकों की रचनाओं को आमने-सामने रखकर सतर्क और सटीक विवेचन प्रभावित करता है। ‘गीतांजलि’ का हिन्दी में पहले देवनागरी लिप्यंतरण हुआ, अगले वर्ष 1915 में काशीनाथ जी ने उसका गद्यानुवाद किया। हिन्दी से पहले डेनिश, स्वीडिश और रूसी में। देवेश ने अपने अध्ययन के लिए अनुवादों की चार कोटियॉं बनाई हैं : 1) देवनागरी लिप्यंतर, 2) गद्यानुवाद, 3) पद्यानुवाद, और 4) व्याख्यानुवाद। हिन्दी में पहला छंदोबद्ध पद्यानुवाद द्विवेदीयुग के गिरधर शर्मा ‘नवरत्न’ ने किया। इस प्रबंध-कार्य में देवेश ने कितना श्रम किया है, यह समझने के लिए इसके दो बड़े अध्याय ही पर्याप्त है—गद्यानुवाद और पद्यानुवाद के। स्रोत और लक्ष्य भाषाओं की प्रकृति को समझते हुए, हर पंक्ति का विशद विवेचन। बल्कि इसका परिशिष्ट भी अत्यंत उपयोगी है। ‘गीतांजलि’ के अनुवादकों का संक्षिप्त परिचय देकर उन्होंने अनुवाद-कर्म की गरिमा बढ़ाई है। उपलब्ध अनुवादों की मीमांसा में उनकी उपलब्धियों और सीमाओं का स्पष्ट उल्लेख हुआ है तो अगले अनुवादकों की चुनौतियॉं भी उजागर हुई हैं।
समीक्षित पुस्तक – गीतांजलि के हिन्दी अनुवाद, लेखक – देवेन्द्र कुमार देवेश प्रथम संस्करण – 2011, मूल्य – 295 रुपये, पृष्ठ – 220 (सजिल्द) प्रकाशक – विजया बुक्स, 1/10753, सुभाष पार्क, गली नं. 8, नवीन शाहदरा, दिल्ली, मोबाइल : 9910189445 (राजीव शर्मा)
(प्रख्यात आलोचक डॉ. रेवती रमण, मो. 09006885907, की विस्तृत समीक्षा ‘समकालीन भारतीय साहित्य’, मई-जून 2011 के अंक में प्रकाशित हुई है। यहॉं उसी का अंश प्रस्तुत किया गया है।)
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Thursday
मेहनतकशों के पक्ष में लिखी जा रही हैं कविताएं - शंकर, संपादक-’परिकथा’
काव्य-यात्रा : 04 सितंबर , 2011
जमशेदपुर वीमेंस कॉलेज के सभागार में प्रगतिशील लेखक संघ और ‘परिकथा ‘ के तत्वावधान में काव्य –विमर्श और काव्य–पाठ का एक विशिष्ट कार्यक्रम आयोजित किया गया | नगर के साहित्य –प्रेमियों का कहना है कि पिछले दो दशकों के अंतराल में इस लौह – नगरी में इस स्तर का अनूठा कार्यक्रम सम्पन्न नहीं हुआ था | बड़ी बात यह है कि बाजारवाद के इस आंधी दौड़ मे व्यस्त नगर के शिरकत करने वाले लोगों में लगभग 150 आगंतुक साहित्य से सरोकार रखने वाले थे और सब के सब कार्यक्रम के अंत तक सभागार में मन से बने रहे | उनके चहरे पर खुशी की कौंध थी और उन्होंने कार्यक्रम के आयोजकों के प्रति इसके लिए तहेदिल से आभारी व्यक्त किया | यही नहीं , कई टी.वी. चैनलों और प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों के संपादक और संवाददाता भी अंत तक वहाँ जमे रहे | उक्त कार्यक्रम में प्रगतिशील लेखक संघ के उपाध्यक्ष और प्रतिष्ठित समालोचक श्री डा. खगेन्द्र ठाकुर (पटना ) और वरिष्ठ लोकधर्मी कवि शंभु बादल के अतिरिक्त चर्चित साहित्यकार रणेन्द्र , युवा कवि शहंशाह आलम (पटना) , कहानीकार अभय (सासाराम ), पंकज मित्र ( रांची), अशोक सिंह (दुमका ) , अरविंद श्रीवास्तव (मधेपुरा ,बिहार ) और सुशील कुमार ( दुमका) विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित हुए थे | नगर के गणमान्य साहित्यकार और “परिकथा” के संपादक शंकर , कथाकार जयनंदन और कमल , शायर अहमद बद्र और मंजर कलींम, कवयित्री ज्योत्सना अस्थाना के साथ संध्या सिन्हा , गीता नूर, उदय प्रताप हयात, मुकेश रंजन और शशि कुमार भी मौजूद थे | पूरा कार्यक्रम दो सत्रों में संयोजित था | प्रथम सत्र 3.30 बजे अपराहन से आरंभ हुआ जो कवि सुशील कुमार की कविताओं का संग्रह ‘तुम्हारे शब्दों से अलग ‘ के काव्य-विमर्श पर केन्द्रित था और दूसरा सत्र (जो 6.00 बजे अप. से प्रारम्भ हुआ ) अतिथि-साहित्यकार और नगर के चुनिंदों कवियों के काव्य-संध्या का |
कार्यक्रम का शुभारंभ चर्चित युवा कवि और अनुवादक ( चर्चित काव्य संग्रह ‘नगाड़े की तरह बजते शब्द’ –निर्मला पुतुल ) के काव्य-विमर्श से हुआ जिन्होंने कहा कि सुशील कुमार का काव्य –संग्रह ‘तुम्हारे शब्दों से अलग ‘ बाजार के बढ़ते आतंक और शब्दों की बाजीगरी करते शब्द तशकरों के खिलाफ एक वैचारिक जंग का एलान है | इस संग्रह की कविताओं में न तो किसी बौद्धिक अभेद्यता का आतंक है और न ही किसी कौशल को चमत्कृत कर देने का उपक्रम और न ही अनुभवों को सरलीकरण करने वाली भावुकता | दूसरे वक्ता कवि अरविन्द श्रीवास्तव ने बताया कि सांस्कृतिक बंजरपन के विरुद्ध उंम्मीद की कुछ कोमल –मुलायम पंक्तियों के साथ सुशील कुमार की प्रस्तुत संग्रह की कवितायें समय की आहट को बखूबी पहचानती है | युवा कवि शहंशाह आलम ने रचनाओं को आम आदमी के काफी निकट बताया जिसमें सामाजिक चेतना का स्वर मुखर है जबकि वरिष्ठ लोकधर्मी कवि शंभु बादल ने कविता-पुस्तक को जन प्रगतिशील विचार का प्रतिबद्ध वैचारिक दस्तावेज़ कहा | शंकर ने सूक्ष्मता से संग्रह की कविताओं की चर्चा कराते हुए उसे जन-भावनाओं से ओत–प्रोत और जीवन में आशा जगाने वाली बताया उन्होंने मेहनतकशों के पक्ष में लिखी जा रही कविताओं पर भी प्रकाश डाला | कथाकार जयनंदन ने इसे आदिवासी जन –जीवन की गाथा कहकर इसकी सराहना की और अहमद बद्र ने पुस्तक के आमुख पर विस्तार से प्रकाश डाला | प्रथम सत्र के अध्यक्षीय संभाषण में सुशील कुमार की कविताओं की रचना –प्रक्रिया पर बारीकी से चर्चा कर इसे संप्रति लिखी जा रही कविताओं की कड़ी में राजनीतीक चेतना का महत्वपूर्ण काव्य –संग्रह कहा और उसके संभावनाओं पर विमर्श करते हुए ऐसे ही लिखते रहने की कामना की | दूसरे सत्र में सभी मंचासीन अतिथियों और नगर के प्रमुख कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ कर श्रोताओं को सम्मोहित कर लिया | शहर के जाने –माने व्यक्तित्व मार्क्सवादी साहित्यकार शशि कुमार धन्यवाद–ज्ञापन से कार्यक्रम का समापन हुआ |
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