Kostenlose Uhr fur die Seite website clocks

शनिवार

बिहार प्रगतिशील लेखक संघ, पटना इकाई द्वारा एकल काव्य-पाठ का आयोजन







17 जनवरी 10 को राज्य प्रलेस कार्यालय- केदार भवन, पटना में काव्य-पाठ का अवसर मिला, जिसकी चर्चा दैनिक जागरण, पंजाब केसरी एवं आज आदि समचार पत्रों में की गयी। कवि शहंशाह आलम एवं योगेन्द्र कृष्णा की उपस्थिति तथा कड़ाके की ठंढ. में श्रोताओं की मौजुदगी ने पटना की साहित्यिक गर्मी का बेहतरीन एहसास कराया.....प्रस्तुत है ‘जब मारे जायेंगेशीर्षक कविता की कुछ पंक्तियाँ-

.....हम किसी कोमल और
मुलायम स्वप्न देखने के जुर्म में
मारे जायेंगे

जब हम मारे जायेंगे
तब शायद हमारे लिए
सबसे अधिक रोयेगा
वह बच्चा
जो हमारे खतों को
पहुँचाने के एवज में
टाफी पाता था।

रविवार

आज ‘हिन्दुस्तान’ दैनिक में प्रकाशित कविता की कुछ पंक्तियाँ ब्लोगर मित्रों को सप्रेम....







आज 20 दिसम्बर’09 को हिन्दुस्तान दैनिक (रीमिक्स) पटना, मुजफ्फरपुर एवं भागलपुर संस्करण  में प्रकाशित अपनी कविता ‘अफसोस के लिए कुछ शब्द’ की कुछ पंक्तियाँ ब्लोगर मित्रों को सादर भेंट कर रहा हूँ.... प्रतिक्रिया अपेक्षित ।

...... हमें बातें करनी थी पत्तियों से 
और इकट्ठा करना था तितलियों के लिए
ढेर सारा पराग
..... ........
हमें रहना था अनार में दाने की तरह 
मेंहदी में रंग 
और गन्ने में रस बनकर


हमें यादों में बसना था लोगों के
मटरगश्ती भरे दिनों सा
और दौड़ना था लहू बनकर
  सबों की नब्ज में


अफसोस कि हम ऐसा
कुछ नहीं कर पाये...


जैसा करना था हमें..।

 -अरविन्द श्रीवास्तव,अशेष मार्ग, मधेपुरा,मो-०९४३१० ८०८६२.

‘जनपथ’ ने जारी किए पाब्लो नेरूदा, लैंग्स्टन ह्यूज, सनन्त तांती और के. सच्चिदानंदन की अनुवादित कविताओं के चार अंक




समय चेतना की मासिक पत्रिका ‘जनपथ’ ने अपने चार अंक- अगस्त से नवम्बर 09 के लिए समकालीन कविता जगत से विश्व प्रसिद्ध हस्तियों यथा पाब्लो नेरूदा की - जब मैं जडों के बीच रहता हूँ, लैंग्स्टन ह्यूज की- आँखें दुनिया की तरफ देखती हैं, सनन्त तांती की - नींद में भी कभी बारिश होती है और के.सच्चिदानंदन की- कविता का गिरना शीर्षक से अनुदित कविताओं के अंक जारी किये हैं। इन अनुदित कविताओं में समकालीन प्रखर भावधारा का जीवंत स्वरूप दृष्टिगोचर होता है। ये अंक पठनीय मननीय एवं संग्रहनीय हैं। संपादक: अनन्त कुमार सिंह,सेन्ट्रल को-आपरेटिव बैंक, मंगल पाण्डेय पथ, भोजपुर, आरा-८०२३०१ e.mail: janpathpatrika@gmail.com  मो.- 09431847568.
‘जब मैं जड़ों के बीच रहता हूँ’ पाब्लो नेरूदा की कविताएँ-

-पाब्लो नेरूदा सही माने में एक अंतर्राष्ट्रीय कवि थे। उन्होंने अपने देश और समाज के आम आदमी और उसके संघर्षों से जिस तरह से अपने को जोडा और जिस तरह से उसकी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी, उसी ने उसे दुनिया भर की मुक्तिकामी जनता की प्रेरणा का स्रोत बना दिया। उनका जन्म 1904 में चीली में हुआ था। एक कवि कके रूप में उनके महत्व को हम इस बात से भी समझ सकते हैं कि 1964 में जब सात्र्र को नोबल पुरस्कार देने की घोषणा हुई तो उन्होंने उसे ठुकरा दिया और इसके लिए जो कारण बताए, उसमें से एक यह था कि यह नेरूदा को मिलना चाहिए था। बाद में नेरूदा को 1971 में यह पुरस्कार मिला। वे दो बार भारत आये थे। प्रसिद्ध आलोचका डाॅ. नामवर सिंह ने नेरूदा को सच्चा लोकहृदय कवि कहा है और लिखा है कि उन्होंने ‘ कविता को सही मायनो में लोकहृदय और लोककंठ में प्रतिष्ठित किया’। 1973 में नेरूदा का निधन हो गया। प्रस्तुत है उनकी ‘और कुछ नहीं’ कविता-
मैंने सच के साथ यह करार किया था
कि दुनिया में फिर भर दूँगा रौशनी

मैं दूसरों की तरह बनना चाहता था
ऐसा कभी नहीं हुआ था कि संघर्षों में मैं नहीं रहा

और अब मैं वहाँ हूँ जहाँ चाहता था
अपनी खोई निर्जनता के बीच
इस पथरीले आगोश में मुझे नींद नहीं आती

मेरी नीरवता के बीच धुसता चला आता है समुद्र

- अनुवाद: राम कृष्ण पाण्डेय

'आँखें दुनिया की तरफ देखती है' - लैंग्स्टन ह्यूज 

लैग्स्टन ह्यूज का अश्वेत अमरीकी कवियों में महत्वपूर्ण स्थान है। वे कथाकार और नाटककार भी थे। अपनी रचनाओं में उन्होंने अमरीका की अश्वेत जनता के दुःखों, संघर्षों और उनकी आशाओं-आकांक्षाओं को आवाज दी और उसके जीवन की सच्ची तस्वीर पेश की। उनकी कविताओं का मुख्य विषय मेहनतकश आदमी रहा है, उनकी कविताओं में अमरीका की सारी शोषित-पीडि.त और श्रमजीवी जनता की कथा-व्यथा का अनुभव किया जा सकता है। प्रस्तुत है उनकी ‘दमन’ शीर्षक कविता-

अब सपने उपलब्ध नहीं हैं
स्वप्नदर्शियों के लिए
न ही गीत गायकों को
कहीं-कहीं अंधेरी रात
और ठंडे लोहे का ही शासन है
पर सपनों की वापसी होगी
और गीतों की भी
तोड. दो
इनके कैदखानों को

- अनुवादः राम कृष्ण पाण्डेय

’नींद में भी कभी बारिश होती है

सनन्त तांती का जन्म 4 नव.,1952 को कालीनगर, असम के एक निर्धण चाय श्रमिक परिवार में हुआ, इन्होंने शिलांग में पढ.ाई की । मूलरूप से उडि.या कवि फिर बंगला माध्ययम से शिक्षा प्राप्त की फिर असमिया भाषा में कविताई कर असमिया के लोकप्रिय कवि का सम्मान प्राप्त किया उनकी ‘वह’ शीर्षक कविता-

वह अब मेरे सीने में सोया रहता है चैबीस
घंटों मुझ पर शासन करता है। मेरे श्रम की फसल
बाँटता है।  मेरी रक्तनली से स्नायुतंत्र तक
उसका अबाध विचरण। मेरे फेफडे. के बीच-बीच में
शून्य में उछाल वह मग्न होता है खेल में। मेरा
हृदय कुरेद कुरेदकर वह एक यंत्रणा की नदी को
तरफ मुझे खदेड.कर ले जाता है।

निरंतर मेरा लहू चूस रहा वह मेरे भीतर का
प्रेम बाहर का करुण आवरण।
अनुवादः दिनकर कुमार
कविता का गिरनाः

मलयालम में यात्रा कविता लिखे जाने की परमपरा रही है।  पणिक्कर के बाद के. सच्चिदानंदन ने काफी संख्या में यात्रा कविताएँ लिखी है।  इनके दो संकलन ‘पल कोलम, पल कालम’(कई दुनिया, कई समयद्ध और ‘मुनू यात्रा’(तीन यात्राएँ) प्रकाशित हैं। ‘कवियों की भाषा’ शीर्षक कविता की बानगी देखें-

दुनिया भर में
कवियों की एक ही भाषा है
पत्ते तोते व
छिपकिलियों-सा
वे एक ही घोड़े पर सवार हैं
एक ही सपने की रोटी को बाँट रहे हैं
एक ही चषक से खट्टा पी रहे हैं
खुद की जनता को प्यार करने के कारण वह
सभी जनता से प्यार करते हैं
खुद की जमीन में जड़ें गाड.कर
सभी आकाश में पुष्पित हो रहे हैं

एक ही वेद में न टिकने के कारण
सभी का सच जानते हैं
अनुवाद-संतोष अलेक्स

मंगलवार

मैथिली कथा गोष्ठी ‘सगर राति दीप जरय’ का 68 वाँ आयोजन




 मैथिली की त्रैमासिक कथा गोष्ठी ‘सगर राति दीप जरय’ का 68 वाँ आयोजन ‘कथा विप्लव-2’ के नाम से 5 दिसम्बर 09 को सुपौल के व्यपार संध में होगा । इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्तर के मैथिली कथाकार अपनी-अपनी कहानियों का पाठ करेंगे एवं विद्वान समीक्षकों द्वारा इनकी कहानियों पर चर्चा-परिचर्चा की जायेगी।
‘विप्लव फाउण्डेशन’ एवं प्रलेस सुपौल के संयुक्त बैनर तले आयोजित यह कथा गोष्ठी रात भर चलेगी। ज्ञातव्य है कि प्रत्येक तीन माह पर आयोजित होने वाली यह गोष्ठी 1990 से प्रारम्भ हो कर पिछले 19 वर्षों से अनवरत आयोजित हो रही है और इस प्रकार यह आयोजन भारतीय भाषा साहित्य में एक इतिहास रच रही है। इस आयोजन में भारत एवं दूसरे देशों के रचनाकारों की भी सहभागिता होती है। 68 वें आयोजन के संयोजक - अरविन्द ठाकुर ने बताया कि सुपौल में इस कथा गोष्ठी का तीसरा आयोजन है इसमें सम्मलित होने वाले संभावित कथाकारों में - साहित्य अकादमी से पुरस्कृत  विभूति आनन्द एवं प्रदीप बिहारी, सहित रामानंद झा रमण , अजित कुमार आजाद, अरविन्द अक्कु राजाराम राठौर, रामाकान्त राय ‘रमा’ एवं परमानन्द प्रभाकर आदि होंगे, इस अवसर पर पुस्तक-पत्रिकाओं की प्रदर्शनी एवं लाकार्पण का भी आयोजन है। कार्यक्रम संयोजक- अरविन्द ठाकुर, सुपौल, मोबाइल- 09431091548

शुक्रवार

साहित्य से क्यों ओझल होता जा रहा ग्राम्यांचल? साहिती सारिका का ताजा अंक




साहिती सारिका का ताजा अंक (जुलाई-दिसम्बर)

यह इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि गीतकार मार्कण्डेय प्रवासी और नवगीतकार सत्यनारायण के कविता और आलोचना पर बेवाक विचार पाठकों को सोचने पर विवश कर देते हैं । सत्यनारायण ने आलोचना के दायित्वों को रेखांकित करते हुए उनकी, कवि और पाठकों को लांछित करने की मानसिकता पर प्रहार किया है। उनके विचार  हैं कि आखिर आलोचक के राजतन्त्र में पाठक का लोकतन्त्र कोई मायने रखता है या नहीं ? अंक में कथाओं का चयन अच्छा है। कविताएं सधी हुई। कृष्ण मोहन मिश्र की ‘कालिदास की पर्यावरण दृष्टि’ एवं प्रफुल्ल कुमार ‘मौन’ के लोकदेवी देवताओं का संसार’ ज्ञानवर्द्धन से पूर्ण हैं। अनिरूद्ध सिन्हा ने गजल के सौन्दर्यात्मक यथार्थ के बहाने, दुष्यंत कुमार के बाद रूप-रस की परिधि से बाहर आये गजलकारों की बानगी पेश कर समकालीन यर्थाथ से रूबरू कराया है। प्रभावपूर्ण है अशोक आलोक की दो पंक्तियां-
किसी का जिस्म किसी का लिबास रखता है
अजीब शख्स है जीने की आस रखता है

अंक में प्रकाशित रामदरश मिश्र की डायरी, कुमार विमल के संस्मरण, से. रा. यात्री एवं संतोष दीक्षित की कहानी पठनीय एवं रोचकता से पूर्ण हैं।
साहिती सारिका, सम्पादकः अजय कुमार मिश्र, समकालीन जनमत परिसर, सिन्हा लाइब्रेरी रोड, पटना-1 मोबाइल- 09431012792.

रविवार

कविता कभी मरेगी नहीं, अपनी भूमिका खुद तय करेगी- अरुण कमल



’अफसोस के लिए कुछ शब्द’ का लोकार्पण समारोह



प्रगतिशील लेखक संध, पटना इकाई द्वारा आयोजित लोकार्पण सह कवि-सम्मेलन समारोह में बहुचर्चित कवि अरुण कमल ने कहा कि पुस्तक के लेखक अरविन्द श्रीवास्तव ने इस समय हो रहे हर बुरे कार्यों की आलोचना की है । अरविन्द ने कई नए तथा अछूते विषयों पर कविताएँ लिखी हैं। इनकी कविताएँ अद्भुत, अनुठी तथा मार्मिक होती है। अरुण कमल ने आगे कहा कि अरविन्द श्रीवास्तव छोटी तथा मामूली चीजों पर लिखते हुए इन चीजों को महत्वपूर्ण बना देते हैं। संग्रह की कविता जातिवादी और साम्प्रदायिक हिंसा का जोरदार मुखालफत करती है। बाजार आज हमारे जीवन को खोखला बनाता जा रहा है । इसका विरोध भी अरविन्द श्रीवास्तव ने अपनी कविताओं मे जरिये किया है। कवि शहंशाह आलम ने कहा कि संग्रह की कविताएं हमारे जटिल और कुटिल समय का बयान है। ये कविताएं ऐसे वक्तव्य की तरह है, जो सीधे अंदर तक जाकर वार करती है।
अध्यक्षीय भाषण में डा. व्रजकुमार पाण्डेय ने कहा कि हम जो लिखते हैं राजनीति और सामाजिक विज्ञान पर  तो गद्य में लिखते हैं। कवि ने अपने विचार को कविता के जरिये ढाला है। जीवन में आ रहे बदलावों पर अरविन्द की कविताएं सार्थक बयान करती है। बिहार विधान परिषद् के सदस्य वासुदेव सिंह ने अपने विचारों को रखते हुए कहा कि ‘अफसोस के लिए कुछ शब्द’ की कविताएं हमारे जीवन की कविताएं हैं। राजेन्द्र राजन ने कहा कि अरविन्द श्रीवास्तव की कविताएं जिस तरह से हस्तक्षेप करती है, काबिले तारीफ है।इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन में कवि अरुण शीतांश, अरविन्द ठाकुर, राजकिशोर राजन, रामलोचन सिंह, मुसाफिर बैठा सहित अन्य कवियों ने कविता पाठ किया। प्रस्तुत हैं पुस्तक में प्रकाशित एक कविता के अंश
          
हमे सभी के लिए बनना था और
शामिल होना था सभी में

हमें बातें करनी थीं पत्तियों से
और तितलियों के लिए इकट्ठा करना था
ढेर सारा पराग

हमें रहना था अनार में दाने की तरह
मेंहदी में रंग
और गन्ने में रस बनकर

हमें यादों में बसना था लोगों के
मटरगश्ती भरे दिनों सा
और दौड.ना था लहू बनकर
सबों की नब्ज में

लेकिन अफसोस कि हम ऐसा
कुछ नहीं कर पाये
जैसा करना था हमें ।
              
                     - तस्वीर सह समाचार- ’प्रभात खबर’ पटना २ नव. ०९

सोमवार

पटना में प्रलेस का लोकार्पण सह कवि-सम्मेलन कार्यक्रम















हकार...








प्रगतिशील लेखक संघ
पटना इकाई
कविवर कन्हैया कक्ष, केदार भवन (जनशक्ति परिसर), अमरनाथ रोड, पटना-800 001
लोकार्पण सह कवि-सम्मेलन
 लोकार्पणः    पुस्तक ‘अफसोस के लिए कुछ शब्द‘ 
लेखक- अरविन्द श्रीवास्तव       
लोकार्पणकर्ता: अरुण कमल 
अध्यक्षताः डा.खगेन्द्र ठाकुर
मुख्य अतिथिः  व्रजकुमार पाण्डेय,        
                 राजेन्द्र राजन,राजीव कुमार                                                                                                             
आमंत्रित कविः योगेन्द्र कृष्णा, शहंशाह आलम, पूनम सिंह, रश्मि रेखा, राकेश रंजन,सैयद जावेद हसन, अरूण  शीतांश, प्रमोद कुमार सिंह, अरविन्द ठाकुर, उपेन्द्र चैहान, मनोज कुमार झा, सतीश नूतन, अरुण हरलीवाल, मुसाफिर बैठा, श्यामल श्रीवास्तव, राहुल झा।

दिनांक: 1 नवम्बर, 2009 / समय: 2 बजे अपराहन (रविवार)
स्थान:  माध्यमिक शिक्षक संघ भवन, जमाल रोड, पटना

आप सादर आमंत्रित हैं -
निवेदक
प्रगतिशील लेखक संध, पटना
मोबाइल- 9835417537

गुरुवार

सोवियत साम्यवादी सत्ता दरकने के दंश कहाँ है प्रगति प्रकाशन! रादुगा प्रकाशन!



सोवियत साम्यवादी सत्ता दरकने के लगभग बीस वर्ष हो चुके हैं। इस अन्तराल में जो सांस्कृतिक रिक्तता भारत और भारत सदृश्य विकासशील राष्ट्रों में आयी है, उसे खुलकर नहीं तो अन्दर ही अन्दर एक मुकम्मल पीढ़ी महसूस रही है। कहाँ है सस्ते साहित्य का जखीरा! साहित्य ही क्यों अध्ययन की तमाम विधाओं मसलन् इतिहास, राजनीति और दर्शन सहित भौतिकी, रसायन और बनस्पिति शास्त्र की, बच्चों के लिए चटकदार रंगीन पुस्तकें, सामयिक पत्रिकाएं आदि आदि। ये सारी सामग्री महज वैचारिक खुराक ही नहीं थी, वरन् मानव जीवन के सहज विकास के सहायक तत्व थे। प्रगति प्रकाशन, रादुगा प्रकाशन, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, रेडियो मास्को, इस्कस और प्राव्दा, इजवेस्तिया व नोवस्ती प्रेस एजेंसी जैसे, सोवियत साम्यवादी व्यवस्था के सहयोगी अंग क्यों न रहे हों, धरती पर अन्य ‘व्यवस्था’ मे जन जागरण का यह माद्दा, उत्साह और जुनून नहीं रहा है। थोड़ी देर के लिए यदि हम अलेक्सान्द्र पुश्किल और लियो तालस्तोय को मात्र रूस का ही लेखक माने तो कौन सा देश अपने लेखकों के लिए उनकी रचनाओं को प्रकाशित व अनुवाद कर विश्व के जन जन तक पहुँचाने का बीडा़ उठाता है, निःशुल्क या बिल्कुल अल्पमूल्य में। धरती को कचड़ा घर बनाने के अलावे सम्पन्न मुल्कों ने और क्या किया है इस पृथ्वी के लिए ? संहार के नये इल्म तलाशने, सभ्यता की सुरक्षा, सुख और विलासिता के लिए मोबाइल.........मैट्रो, मिसाइल......., बौद्धिक-वैचारिक, सांस्कृतिक  शून्यता और खोखले मस्तिष्क पर समृद्धि व कथित सुरक्षा का मुलम्मा।
दुनिया के तमाम लेखक और लेखक संगठनों को अपनी सरकार और हुक्काम पर दबाव बनानी चाहिए कि जिस तरह हवा, पानी, धूप और चांदनी पर सभी का हक है, ठीक वैसे ही साहित्य पर!

-अरविन्द श्रीवास्तव, मधेपुरा
मोबाइल- 09431080862.

मंगलवार

’राइफल’ एक छोटी कविता







राइफलें
जो किसी पत्ते की खड़खड़ाहट
कि दिशा में
तड़-तड़ा उठी थीं
और किसी संकट को टाल देने की
विजय मुद्रा में
चाहता था राइफलधारी मुस्कुराना

जिसे बड़े ही ध्यान से
देख रहा था
पत्ते की ओट से
एक चूहा !

-अरविन्द श्रीवास्तव, मधेपुरा

गुरुवार

एक खामोश कवि की अग्नि-ऋचाएँ





नई पीढ़ी. के कवियों में राकेश प्रियदर्शी ने अपनी काव्यात्मक सोच और धार की बदौलत समकालीन कविता जगत में अपनी पहचान कायम की है। उनकी नवीनतम कृति ‘इच्छाओं की पृथ्वी के रंग’ में एक संवेदनशील दृष्टि के साथ मानवीय चिंताओं के प्रति बेचैनी और छटपटाहट स्पष्ट दिखती है। सभ्यता के पैर में पड़ी हजारों वर्षों की बेड़ी वह आनन फानन में खोलना चाहते हैं। पुस्तक में प्रकाशित इनकी कविताओं के बिंव-चित्र, जीवंत काव्य विन्यास, काव्य विधा पर इनकी पकड. को आश्वस्त प्रदान करते हैं। गहन सूक्ष्मता संजोए इनकी कविताओं का बहुरंगी फलक पाठकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करते हैं। प्रस्तुत है उनकी पुस्तक ‘इच्छाओ की पृथ्वी के रंग’ की कुछ बानगी-

लिहाजा मुझे फांसी दी जानी चाहिए,
कि मेरी रूह से सच की बू आती है
लिहाजा मुझे काल कोठरी में कैद
कर देना चाहिए
कि मेरे शब्द गर्म होकर आग उगलते हैं
लिहाजा मुझे रस्सी से बांधकर पथरीली
सड.कों पर घसीटा जाना चाहिए
कि आज भी मै उतना ही वफादार हूँ
जितना एक पालतू कुत्ता
.......
                                   ‘गुलाम हाजिर है’ शीर्षक कविता

 वह नदी की आँखों में डूबकर
सागर की गहराई नापना चाहता था
और आसमान की अतल ऊंचाईयों में
कल्पना के परों से उड़ान भरना चाहता था,
पर वह नदी तो कब से सूखी पड़ी थी,
बालू, पत्थर और रेत से भरी थी
2.

वह कैसी नदी थी जिसमें स्वच्छ जल न था,
न धाराएं थी, न प्रवाह दिखता था,
वहां सिर्फ आग ही आग थी
....
                                              ‘नदी’ शीर्षक कविता

लेखक सम्पर्कः पटना, मोबाइल-09835465634

शनिवार

नामवर सिंह ने किया बिहार प्रलेस कार्यालय का उद्‍घाटन




25.09.2009 बिहार प्रगतिशील लेखक संध के लिए एक महत्वपूर्ण दिवस रहा जब वरिष्ठ आलोचक व प्रलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष नामवर सिंह ने पटना स्थित केदार भवन, जनशक्ति परिसर, अमरनाथ रोड में प्रलेस कार्यालय का उद्‍घाटन किया । कार्यालय कक्ष का नाम ‘कविवर कन्हैया कक्ष’ रखा गया। इस अवसर पर प्रलेस से जुड़े पदाधिकारी , साहित्यकार-लेखकों में - खगेन्द्र ठाकुर, ब्रज कुमार पाण्डेय, राजेन्द्र राजन, अरुण कमल, कर्मेन्दु शिशिर, हृषिकेश सुलभ, संतोष दीक्षित, शहंशाह आलम, अरविन्द श्रीवास्तव सहित अनेक रचनाकर्मियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी। नामवर सिंह ने कहा कि 
यह कार्यालय होने से बिहार की रचनात्मक सक्रियता बढेगी

बुधवार

डा.नामवर सिंह करेंगे बिहार प्रलेस राज्य कार्यालय का उद्‍घाटन









बिहार प्रगतिशील लेखक संध का राज्य कार्यालय ( अमरनाथ रोड, जनशक्ति भवन के पीछे, पटना ) का उद्‍घाटन प्रसिद्ध आलोचक एवं प्रगतिशील लेखक संध के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा.नामवर सिंह 25 सितम्बर 09 को 12 बजे करेंगे। स्मरणीय है कि अबतक बिहार प्रलेस का राज्य कार्यालय पटना में बी. एम. दास रोड स्थित मैत्री शांति भवन में चल रहा था।

‘‘ हम हर एक सूबे में, हर एक जवान मे, ऐसी परिषदें स्थापित करना चाहते हैं, जिसमें हर एक भाषा में हम अपना संदेश पहुँचा सकें। यह समझना भूल होगी कि यह हमारी कोई नयी कल्पना है। नहीं, देश के साहित्य-सेवियों के हृदयों में सामुदायिक भावनाएँ विद्यमान हैं। भारत की हर एक भाषा में इस विचार के बीज प्रकृति और परिस्थिति ने पहले से बो रखे हैं, जगह-जगह उसके अंकुए भी निकलने लगे हैं। उसको सींचना एवं उसके लक्ष्य को पुष्ट करना हमारा उदेश्य है।’’

- प्रलेस के प्रथम सम्मेलन (1936) में सभापति आसन से दिये गये प्रेमचंद के भाषण का अंश ।

तस्वीर में डा.नामवर सिंह के साथ अरविन्द श्रीवास्तव, मधेपुरा

शनिवार

चर्चा में..

वक्त बूँदों के उत्सव का था
बूँदें इठला रही थी
गा रही थीं बूँदें झूम - झूम कर
थिरक रही थीं
पूरे सवाब में

दरख्तों के पोर - पोर को
छुआ बूँदों ने
माटी ने छक कर स्वाद चखा
बूँदों का

रात कहर बन आयी थी बूँदे

सबेरे चर्चा में बारिश थीं

बूँदें नहीं !


- अरविन्द श्रीवास्तव.

जनपथ के कुछ शब्द





’जनपथ’ समय-चेतना का मासिक आयोजन. संपादक- अनंत कुमार सिंह. मो.-09431847568


यीशु व
सोक्रेटेस
भले लोग थे
फिर भी मारे गये

मुझे भला नहीं बनना।
- मलयालम कविता


तुम्हारी आग के खिलाफ हमने पानी का खासा इंतजाम किया है.....
- शीन हयात, कथाकार

मुझे यह भी लगा कि दिल्ली सारी रचनाषीलता को सोख लेने वाली जगह है। आपका सारा समय दौड.-भाग में खत्म हो जाता हैं और यदि आप संपादन या पत्रिका से जु़डे हैं तो दूसरे की रचनाओं में ही खप जाते हैं । आप अपना खुद का कोई भी क्रिएटिव काम नहीं कर सकते । सभा-गोष्ठियों में मिलते हैं तो औपचारिक भेंट से आगे बात नहीं बढ. पाती। यहाँ बड़े-बड़े प्रकाशक हैं या बल्कि कहिए कि प्रकाशक-व्यवसाय ही केंद्रित है। यहाँ से ही सारे पद - पीठ, पुरस्कार, .फेलोशिप, विदेश यात्राएँ आदि तय होते हैं। लेकिन यहीं सारे घपलों की जड. है। इसलिए यहाँ के लोगों की जिन्दगी जुगाड. करने में ही जाया हो जाती है। मुझे बार-बार जाने क्यों लगता है कि सृजन -कर्म तो सुदूर अँचलों में ही संभव है।
- संजीव, कार्यकारी संपादक:’हंस’
कवि बार-बार जन्म लेता है कविता में। पुनर्जन्म पर विश्वास न करने वाले भी कविता में जन्म लेना चाहते हैं।कोई कवि सृष्टि को पूरी तरह पा न सका कभी। इसलिए हमें लौटना है उस ठिए पर,जो हर बार नया जन्म लेता है ,नए लोगों के साथ । उसके गर्भ में पलता है नित नया विचार। हमें वहाँ तक पहूँचना है। हम पहूँचेंगे साथी !
-लीलाधर मंडलोई, वरिष्ठ कवि

प्रस्तुति: अरविन्द श्रीवास्तव, अशेष मार्ग, मधेपुरा

रविवार

पश्चिम से-


लाये थे वे
पश्चिम से
एच-1, एन-1 (स्वाइन फ़्लू) वायरस

फिर लायेंगे वे ही
पश्चिम से इसकी दवा

तब
फर्क सिर्फ यही रहेगा
दवा के बदले
वसूलेगा पश्चिम
मोटी-मोटी रकम !

-अरविन्द श्रीवास्तव, मधेपुरा
Related Posts with Thumbnails