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शनिवार

पूर्णिया में सतीनाथ भादुड़ी के साहित्य पर विमर्श..




-सौ बांग्ला लेखकों में तीस प्रतिशत बिहार के लेखक हैं..
-‘ढोढाइ चरित्रमानस’ कोसी अंचल के सामाजिक जीवन का आईना है..

    बांग्ला के प्रसिद्ध साहित्यकार सतीनाथ भादुड़ी द्वारा स्थापित पूर्णिया जिला मुख्यालय का ऐतिहासिक पुस्तकालय ‘इंदु भूषण पब्लिक लाईब्रेरी’ में 7 फरवरी को आयोजित साहित्यिक विमर्श में हिन्दी एवं बांग्ला के साहित्यकारों की भागीदारी रही। इस विमर्श में इस पुस्तकालय के सचिव शंभुनाथ गांगुली, मनोज मुखर्जी, तपन बनर्जी, रोमेन चौधरी, आलो राय, विश्वंभर नियोगी, अजय कुमार एवं मधेपुरा से आये कवि अरविन्द श्रीवास्तव मौजूद थे। इस विमर्श का संचालन कथाकार एवं आलोचक अरुण अभिषेक कर रहे थे।
बांग्ला कवि आलो राय ने कहा कि सतीनाथ भादुड़ी ने 1938 में इस लाइब्ररी की स्थापना की थी, उस वक्त से लेकर आजतक की महत्वपूर्ण बांग्ला साहित्य को बतौर धरोहर इस पुस्तकालय में संजोया गया है तथा बांग्ला की समृद्ध साहित्यिक परंपरा को बिहार, विशेषकर पूर्णिया के साहित्यकारों ने विशेष रूप से संवर्द्धित किया है। 
संवाद को आगे बढ़ाते हुए तपन बनर्जी ने गौरवान्वित हो कर कहा कि सौ बांग्ला लेखकों में तीस प्रतिशत बिहार के लेखक हैं। उनमें सतीनाथ भादुड़ी, विभूति भूषण वन्धोपाध्याय, वनफूल, केदारनाथ वन्धोपाध्याय, श्रीमती लिली रे आदि मुख्य हैं । 
मनोज मुखर्जी का मानना था कि यह पूर्णिया शहर पहले कटिहार भूखण्ड से सहरसा कोसी प्रमंडल तक पूरा क्षेत्र पूर्णिया जिलान्तर्गत था। फनीश्वरनाथ रेणु, लक्ष्मीनारायण सुधांशु, जनार्दन झा द्विज, वफा मलिकपुरी, अनुपलाल मंडल व गंगानाथ सिंह जैसे विद्वान राष्ट्रीय फलक पर चर्चित रहे। 
रोमेन चौधरी ने कहा कि सतीनाथ भादुड़ी की चर्चित रचना ‘जागरी’ रही है। उपन्यास जागरी के लिए उन्हे ‘रवीन्द्र पुरस्कार’ मिला था। इनका उपन्यास ‘ढोढाइ चरित्रमानस’ कोसी अंचल के सामाजिक जीवन का आईना है। इसके अतिरिक्त इनके उपन्यास ‘चित्रगुप्तेर फाईल’, ‘अचिन रागिनी’ ‘दिग्भ्रान्त’ आदि चर्चित हैं। 
विश्वंभर नियोगी ने सतीनाथ भादुड़ी की  परिचिता, रथेर तले, कृष्ण कली, पंक तालिका आदि कहानियों की भी चर्चा की। 
कथाकार अरुण अभिषेक ने कहा कि ‘कर दातार संघ जिन्दाबाद’ नामक कहानी में भादुड़ी जी ने हास्य के माध्यम से मनुष्य के मन की विकृति जो झूठ और बेईमानी से उपजती है, उसे उजागर किये हैं जो आज भी वर्तमान में हम महसूस करते हैं।
     मधेपुरा से आये अरविन्द श्रीवास्तव ने अभिभूत होकर हिन्दी व बांग्ला के संयुक्त साहित्यिक पहल को सार्थक माना तथा पूर्णिया के साहित्यक अवदान को नमन किया। 
धन्यवाद ज्ञापन अजय कुमार ने किया।

2 टिप्‍पणियां:

शालिनी कौशिक ने कहा…

.सराहनीय अभिव्यक्ति ये क्या कर रहे हैं दामिनी के पिता जी ? आप भी जाने अफ़रोज़ ,कसाब-कॉंग्रेस के गले की फांस

Blogvarta ने कहा…

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