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बुधवार

जनकवि हूँ मैं क्यों चाटूँ थूक तुम्हारी.. नागार्जुन











जनता मुझसे पूछ रही है, क्या बतलाऊँ
जनकवि हूँ सच कहूँगा, क्यों हकलाऊँ,
जनकवि हूँ मैं क्यों चाटूँ थूक तुम्हारी
श्रमिकों पर क्यों चलने दूँ बंदूक तुम्हारी                                                                                                                                             - नागार्जुन
        

4 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति !

संजीव ने कहा…

बाबा की हर बात निराली थी.. पर थी मेरे दिल की बात.
टंकण अशुद्धियां ठीक कर लेवें.

shivs ने कहा…

भाइ ! नागार्जुन मेरे प्यारे कवि है ,उनकी सभी कविताओ को पहले दिखावे ,आज भी कोइ नागार्जुन सा लिख नही पाता । अच्छी लिन्क है । धन्यवाद ।

shivs ने कहा…

भाइ ! नागार्जुन मेरे प्यारे कवि है ,उनकी सभी कविताओ को पहले दिखावे ,आज भी कोइ नागार्जुन सा लिख नही पाता । अच्छी लिन्क है । धन्यवाद ।

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