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शुक्रवार

समय के खुरदरे चेहरे को बेनकाव करती ‘और अंत में एक बारीक-सा परदा’



‘और अंत में एक बारीक-सा परदा’ कथा लेखिका उषा ओझा की पन्द्रह कहानियों का समुच्य है, ये कहानियाँ भाषिक चमत्कार से बचते हुए पतझड़ का प्रतिरोध करती है। संवेदनाओं एवं वैचारिकता के द्वन्द से बुने गये इस ‘परदे’ में कई रंग-बदरंग शेड्स हैं जो समय के कैनवस को कोमल-कठोर अनुभूतियों का एलबम-सा बनाते हैं। ये कथाएँ समकालीन कथा परिदृश्य में नवीनता का अहसास कराती है। कहानियों में विषयगत वैविध्य है तो कला-शिल्पगत वैविध्य भी। संग्रह की तमान कहानियों का कथ्य-शिल्प अंततः जड़ व्यवस्था के विरूद्ध मुख़ालफत का परचम लिए खड़ा दिखता है। उषा ओझा की कथाएँ कथा क्षितिज पर अपना मुकम्मल स्थान बनाती है। 
समकालीन कथा लेखन में उषा ओझा का हस्तक्षेप अक्सर दिख जाता है- हंस, कथादेश, कथाक्रम, जनपथ  आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित इनकी कहानियाँ पठनीय हैं। ‘जूही की बेल’ कहानी संग्रह एवं ‘बहाव’ उपन्यास के बाद ‘और अंत में एक बारीक-सा परदा’ से इन्होंने कथा-जगत में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज की है, जो स्वागतेय है।

- उषा ओझा
फ्लैट नं. 3, ब्लाक नं. 15
अदालतगंज, पटना- 1.
मो. 09835217799.

1 टिप्पणी:

alka sarwat ने कहा…

अर्थात उषा जी को पढ़ना पड़ेगा

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