आज ही के दिन १८ अगस्त २००८ को कोसी के कहर ने हजारों लोगों की जानें ली, लाखों बेघर, तवाह और बर्बाद हुए , क्षण भर में राजा रंक बन गए | उत्तर बिहार के मधेपुरा, अररिया, पुर्णिया, सुपौल, कटिहार, सहरसा जिले में महज एक वर्ष पहले बरबादी का जो मंजर दिखा वह किसी भी सभ्य प्राणी के लिए रूह कंपा देने वाला था। बाढ़, भूख, बेरोजगारी सहित इस वर्ष सुखाड़ से पीड़ित लाखों लोग पलायन कर दिल्ली, पंजाब और महाराष्ट्र सदृश्य राज्यों को आबाद करने में जुटे है, क्षेत्र की बदहाली पर चंद घोषणाओं के साथ हर तरफ चुप्पी है...। कोसी की यह विभीषिका मानवीय त्रासदी थी या कुदरत का कहर ...... बहरहाल केंद्र सरकार द्वारा इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाना और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिले राहत - सहयोग पर आभार प्रकट किया जा रहा है वाबजूद इसके यह क्षेत्र सुरक्षित है इस बात की पक्की गारंटी नहीं दी जा सकती... इसमें कई पेंच है...|
आज इस खंड प्रलय के एक वर्ष बीत गए | जनशब्द इस प्रलय की वेदी पर दिवंगत हुए प्राणों को श्रद्धाश्रु निवेदित करता है | कोसी और इसके 'व्यवस्थापक' इस विशाल भूभाग को फिर से हराभरा करने में पुरजोर ताकत से जुटे रहेंगे, इसी उम्मीद के साथ .....|
-अरविन्द श्रीवास्तव, मधेपुरा
3 टिप्पणियां:
जानकारी के लिये धन्यवाद। मेरी संवेदना कोसी-पीडी़तों के साथ है।
आपने ऎतिहासिक जलप्रलय की याद ताजा कर दी...
आप लोग साहित्यकार टाइप के आदमी हैं। इस कदर शब्दों की हत्या क्यों करते हैं? जल प्रलय आया-- क्या मतलब है इस शब्द का। पूरे इलाके में मैं भी घूमा था। नुकसान हुआ है, कुछ एक मरे भी हैं। उन्हें संकट से उबरने में पीढ़ी लग सकती है, जिन्हें ज्यादा नुकसान हुआ। लेकिन प्रलय... ऐसा तो नहीं है कि सृष्टि को बचाने के लिए वहां मनु को फिर से जन्म लेना पड़े???
बहरहाल... प्रलय प्रलय कहते, टीवी और अखबार वालों ने ऐसी स्थिति ला दी कि ३ महीने बाद ही पूरा देश उस कथित प्रलय को भूल गया। आपने याद किया, अच्छा लगा।
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